रेपो रेट के जरिये मंहगाई को नियंत्रित करने की जुगत

कृष्णमोहन झा

देश में खुदरा महंगाई दर को नियंत्रित करने की मंशा से रिज़र्व बैंक ने दो महीने के अंदर दूसरी बार रेपो रेट में इजाफा कर दिया है। जून में जितनी बढ़ोतरी की गई थी ,उतनी ही बढ़ोतरी इस बार भी की गई है। गौरतलब है कि जून में आरबीआई ने रेपो रेट 6 प्रतिशत से बढ़ाकर सवा छै प्रतिशत कर दी है। जाहिर सी बात है कि इससे बैंकों की कास्ट ऑफ फंडिंग में इजाफा होगा और अब बैंकों को रिज़र्व बैंक वाले कर्ज पर पहले से अधिक ब्याज देना होगा। बैंक इसकी भरपाई लिए उपभोक्ताओं से अधिक ब्याज वसूलेंगे। होम लोन, कार लोन एजुकेशन लोन आदि की किश्तें इससे बढ़ जाएगी।

आरबीआई के फैसले से आम आदमी की जेबे जरूर ढीली होगी परन्तु उसका मानना है कि इस फैसले के आलावा उसके पास कोई विकल्प नहीं था।रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति की द्वैमासिक बैठक में देश की अर्थव्यवस्था पर भी विचार किया गया तथा विकास दर तथा मंहगाई दर में संतुलन बनाए रखने रेपो रेट में बढ़ोतरी के कदम को अपरिहार्य माना गया। आरबीआई का मानना है कि यदि उसने यह अप्रिय फैसला नहीं लिया तो मंहगाई दर के बारे में उसका अनुमान गड़बड़ा सकता है ,जिसका असर महंगाई दर पर पड़ना तय था।

उल्लेखनीय है कि जून में जब रेपो रेट बढ़ाने का फैसला किया गया था तब मौद्रिक नीति समिति के सभी 6 सदस्यों ने इसका समर्थन किया था ,लेकिन इस बार रेपो रेट में बढ़ोतरी का फैसला सर्वसम्मति से नहीं हुआ है। एक सदस्य ने इसके विरोध में मतदान किया है। वैसे तो रेपो रेट में इतनी जल्दी वृद्धि का आमतौर पर स्वागत किया जा रहा है ,किन्तु कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि आरबीआई ने खुदरा महंगाई दर को अनुमानित सीमा में बनाए रखने के लिए ही यह फैसला किया है। अर्थशास्त्री मानते है कि मंहगाई दर 5 प्रतिशत से कम ही रखने की संभावनाए धूमिल होने के कोई विशिष्ट कारण नहीं है।

गौरतलब है कि रिज़र्व बैंक ने अगले वित्त वर्ष में मंहगाई दर इसी सीमा के अंदर रखने अनुमान लगाया है। आरबीआई का मानना है कि इस साल जुलाई सितम्बर- तिमाही में खुदरा मंहगाई दर 4.6 प्रतिशत तथा अक्टूम्बर से अगले साल मार्च तक की छमाही में यह 4.8 प्रतिशत रहेगी। बैंक ने अगले साल अप्रैल -जून में तिमाही में मंहगाई दर 5 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है।

मौद्रिक नीति समिति की समीक्षा बैठक में देश की अर्थव्यवस्था पर भी विचार किया गया और इसे मौजूदा हालातों में संतोषजनक माना गया। रिज़र्व बैंक ने 2018-19 की अवधि में विकास दर 7.4 प्रतिशत के आसपास रहने का जो अनुमान लगाया है, वह उस पर अभी भी कायम है। रिज़र्व बैंक के अनुसार उसने विकास दर और मंहगाई में संतुलन बनाए रखने के लिए ही रेपो रेट में दुबारा बढ़ोतरी का विकल्प चुना है।

रिज़र्व बैंक ने रेपो रेट में दुबारा बढ़ोतरी करने का फैसला अपनी मौद्रिक समीक्षा समिति की जिस बैठक में लिया गया उसमे उसमे मंहगाई और विकास दर को प्रभावित करने वाले अंतर्राष्ट्रीय और आंतरिक कारकों पर भी गंभीरता से विचार किया गया, जिसमे क्रूड आयल की कीमतों में उतार चढ़ाव का रुख प्रमुख था। गौरतलब है कि विगत कुछ महीनों से अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल का रुख बना हुआ है। यद्यपि अब इसमें कुछ कमी दिखाई दे रही है, लेकिन अभी भी तेल की कीमतों में अस्थिरता की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है। रिज़र्व बैंक ने इस आशंका के मद्देनजर रखते हुए रेपो रेट में दुबारा वृद्धि करने का विकल्प चुना।

रिज़र्व बैंक की नजर में हॉल ही में केंद्र सरकार द्वारा खरीफ फसलों के समर्थन मूल्य में औसत वृद्धि भी खुदरा मंहगाई पर असर डाले बिना नहीं रहेगी। रिज़र्व बैंक को इस वर्ष मानसूनी बारिश की अनिश्चितता ने भी चिंतित किया है। यदपि देश के अनेक हिस्सों में इस बार बारिश संतोषजनक है, लेकिन कुछ हिस्सों में कम बारिश ने बैंक की चिंता बड़ा दी है। रिजर्व बैंक का मानना है कि देश के सभी हिस्सों में औसत बारिश का रुख बरकरार रहता है तो मंहगाई पर प्रतिकूल प्रभाव की आशका को नकारा सकता है। यदपि अभी बारिश के औसत के पूरा होने में एक माह का समय शेष है, परन्तु रिसर्व बैंक ने यह सोचकर रेपो रेट में वृद्धि कर दी है कि औसत बारिश के अभाव में मंहगाई पर पड़ने वाले असर से निपटने की तैयारी पूर्व से ही कर लेना बेहतर होगा।

अंतर्राष्ट्रीय बाजार में ट्रेड वार के कारण ग्लोबल फाइनेंशियल में उतार- चढ़ाव की स्थिति तथा कंपनियों की उत्पादन लागत में वृद्धि के कारण मंहगाई पर पड़ने वाले असर को देखते हुए भी रिसर्व बैंक ने रेपो रेट में वृद्धि करने का फैसला किया है। बैंक का यह फैसला भले ही आमजन को अप्रिय लगे परन्तु इसे टाला नहीं जा सकता था। अब देखना यह है कि दो माह बाद होने वाली मौद्रिक नीति समिति की बैठक में इस कदम के प्रभावों से रिजर्व बैंक संतुष्टि व्यक्त करता है या नहीं।

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