प्रकृति को भी समझो, कहीं देर न हो जाए!

-ऋतुपर्ण दवे

rituparndave@gmail.com

धरती बीमार है, बीमारी गंभीर है! आसमान हांफ रहा है, सांस लेने तक को साफ हवा नहीं! पाताल सूख रहा है, पीने तक का पानी उसके गर्भ में नहीं? स्थिति विकट है तो क्या विनाश निकट है! ये कुछ वो गंभीर सवाल हैं जो हम आने वाली पीढ़ी के लिए अपनी नादानी से छोड़ रहे हैं। यानी विरासत में अपनी भावी पीढ़ी को विषैला पर्यावरण, बांझ धरती और सूखे पाताल का बोझ देने जा रहे हैं। क्या जरा भी चिन्ता नहीं कि आने वाली पीढ़ी का क्या होगा? जाति, धर्म, अगड़ा, पिछड़ा, तेरा दलित, मेरा दलित में उलझी हमारी व्यवस्थाएं और व्यवस्थाओं को चलाने वाले क्यों पर्यवारण पर चिन्तित नहीं हैं? याद नहीं पड़ता जब प्रकृति के बदलते तेवर और पर्यावरण के असंतुलन को लेकर सदन में बहस हुई हो, बहिर्गमन हुआ हो। हमारे माननीयों को दलों के दलदल के अलावा यह क्यों नहीं सूझा? जवाब तो देना होगा, कहीं यह सोच तो नहीं कि जवाब लेने को कोई बचेगा भी?

 50 वर्षों की औद्योगिक और तकनीकी क्रान्ति से हम इतने गदगद हुए कि यह सोचना भी भूल गए कि इससे पर्यावरण पर कैसा असर पड़ा? क्रान्ति जरूर हुई लेकिन मानव सभ्यता के अब तक के इतिहास में जीवन से शुध्द हवा, पानी, पहाड़, जंगल और जीने के आधार छिन गए। निश्चित रूप से इंसान ने प्रकृति पर जितना नियंत्रण पाया, प्रकृति का संतुलन उतना ही डगमगाया। सच तो यह है कि प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध और बेहिसाब दोहन ने प्रकृति को प्रभावित किया। असल सच्चाई यह भी कि बढ़ती जनसंख्या, औद्योगीकरण, प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन, वायु एवं जल प्रदूषण, बढ़ती रेडियो धर्मिता, कीटनाशकों का अत्याधिक उपयोग, जंगलों की अंधाधुंध कटाई ही वो मुख्य कारण हैं जिनसे ग्लोबल वार्मिंग का खतरा बढ़ा और ओजोन परत का क्षरण हुआ।

प्रकृति का खुद से नियंत्रण डगमगाया और समय बेसमय मौसम के बदलाव का नतीजन सामने आया। माजरा कुछ यूं है कि अपनी ही तबाही रचते शहर के हम बासिन्दा हो गए। भारत के नजरिए से देखें तो कोई साल ऐसा नहीं जाता जब कहीं भीषण सूखा तो कहीं भयावह बाढ़ की त्रासदी न हो। वर्ल्ड रिसोर्सज इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के अनुसार बाढ़ की त्रासदी झेलने वाले दुनिया के 163 देशों में भारत सबसे ऊपर है। तबाही के मंजर के लिए दोषी जहां हमारा ही गैर जिम्मेदाराना रवैया है तो वहीं तेजी से बढ़ रहा अनियोजित शहरीकरण भी। ज्वलंत उदाहरणों में जहां दुनिया की भीषणतम मानव निर्मित त्रासदियों में एक भोपाल गैस काण्ड है तो बाढ़ के लिए नदी के कटाव को रोकते, तटों पर अंधाधुंध अतिक्रमण। नेशनल डिजास्टर मैनेजमेण्ट अथॉरिटी के आंकड़ों पर गौर करें तो भारत में 58.6 प्रतिशत भू भाग कहीं कम तो कहीं ज्यादा तीव्रता के भूकंप के लिहाज से संवेदनशील है। इसी तरह 4 करोड़ हेक्टेयर जमीन यानी कुल भूभाग का 12 प्रतिशत हिस्सा बाढ़ और नदी के कटाव से प्रभावित है। नदी में पानी आने पर दोनों तटों पर खाली जगह नहीं है। जहां पानी घुसता था वहां आबादी बस गई है। पानी तटों पर बसे कब्जों तक आता है तो हम कहते हैं बाढ़ आ गई।

कुछ इसी तरह बढ़ते वाहन, कल कारखानों से निकलता धुंआ, पटाखों से सांस में घुलते जहर से जहां दुनिया में लगभग 33 लाख लोग हर साल मौत के मुंह में समाते हैं वहीं यह आंकड़ा 2050 तक 66 लाख और भारत में 2025 तक 26600 प्रतिवर्ष जा सकता है। पेड़ों के संरक्षण से जुड़े नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के 2010 के निर्देशों का ईमानदारी से देश में कहीं भी पालन नहीं हो रहा है। इसी तरह मिसाइलों की बढ़ती होड़, रासायनिक हथियारों के बढ़ते इस्तेमाल ने भी पर्यावरण को ही दूषित किया है। संयुक्त राष्ट्र की चौंकाने वाली विश्व जल रिपोर्ट कहती है कि  औद्योगिक, मानवीय और कृषि-सम्बन्धित जूठन के रूप में 20 लाख टन गन्दगी और विषाक्त तरल हमारे पानी में मिल जाता है। ऐसी गन्दगी और विषैले पदार्थों से ताजे पानी की उपलब्धि 58 प्रतिशत तक घटने की आशंका है। अत्याधिक प्रदूषण से हो रहे नाटकीय जलवायु परिवर्तन के चलते भी पानी की उपलब्धि 20 प्रतिशत घटने की आशंका है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट कहती है कि अंधाधुंध विकास और पेट्रोल-डीजल वाहनों के कारण शहरी इलाकों में वायु प्रदूषण गंभीर हो गया है नतीजन दुनिया भर में 80 प्रतिशत शहरी आबादी जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर है। ये आंकड़े 2008 से 2013 के बीच के हैं। 5 वर्ष और गुजर गए हैं, हालात और बदतर ही हुए होंगे। भारत में अभी भी जहां करीब 35 करोड़ घरों में मिट्टी के तेल के लैंप जलते हैं,  लकड़ी, उपला या कोयला जलाया जाता है। छतों व टाइल्स में एस्बेस्टस, ग्लास फाइबर, सिरामिक से फेफड़ों का कैंसर और मेसोथेलिकोमा जैसी घातक बीमारियां बढ़ी हैं। लैन्सेट के ताजा आंकडे काफी चौंकाने वाले जो बताते हैं कि अकेले भारत में प्रदूषण से 2015 में 18 लाख से ज्यादा लोग मारे गए थे इनमें 5 प्रतिशत से अधिक की मौत घरेलू प्रदूषण से हुई थी।  भारत में 54 प्रतिशत ऊर्जा का उत्पादन कोयले से होता है जो वायु प्रदूषण के लिए घातक है।

पर्यावरण की इस दशा के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार बढ़ता प्रदूषण है। प्रदूषण पर लगाम के लिए पड़ोसी चीन से सीख लेनी होगी जिसने कई कदम उठाए। हमें भी ज्यादा धुंआ उगलने वाले कारखानों को बन्द या सख्ती के साथ आबादी से दूर करना होगा। कोयले के कम से कम उपयोग की नीति बनानी होगी, औद्योगिक प्रदूषण को रोकने के लिए प्रभावी कार्रवाई तो बड़े शहरों, भीड़-भाड़ वाले इलाकों में साफ हवा के गलियारे बनाने होंगे ताकि साफ हवा का प्रवाह हो। चीन में शांक्सी प्रान्त के झियान शहर का 330 फीट ऊंचा एयर प्यूरीफायर 10 वर्ग किमी के दायरे में 1 करोड़ घन मीटर हवा को शुध्द करता है। यह स्माग को भी 15 से 20 प्रतिशत नियंत्रित करता है। विशेषता यह है कि पूरी कार्यप्रणाली सौर्य ऊर्जा से संचालित है। अब घरेलू एयर प्यूरिफायर भी ईजाद हो गए हैं। भारत में भी ऐसी कोशिशें करनी होंगी तब कहीं हम प्रदूषण को न केवल बढ़ने से रोक पाएंगे बल्कि पर्यावरण के बिगड़ते संतुलन को सुधार पाएंगे। वनों पर भी खास निगाहें रखनी होंगी। बचे जंगलों को बचाना तो नए को तैयार करना अहम होगा भले ही इसके लिए सैनिकों की मदद क्यों न लेनी पड़े। कांक्रीट के जंजालों के बीच धरती तक वर्षा जल पहुंचाने के लिए कठोर जतन करने होंगे। नदियों के तटों को आबाद अतिक्रमणों से मुक्त करना होगा।

गंभीरतम स्थिति है, निपटने की जवाबदेही केवल भू और पर्यावरण विज्ञान में रुचि रखने वालों की अकेले नहीं हैं। इसे आन्दोलनों, सरोकारों, संस्कारों, रिवायतों से जोड़ना होगा, जल, थल और नभ की अहमियत को समझना और समझाना होगा। क्या जरूरी नहीं कि प्रकृति को जीवित श्रेणी में रख कर वैसा ही बर्ताव करें जैसा खुद के लिए चाहते हैं? क्यों न पंचायत से महापालिका तक सभी निकायों में ग्रीन बजट का अनिवार्य प्रावधान हो। पर्यावरण को सुरक्षित, संरक्षित करने की सामूहिक जिम्मेदारी हो, वर्षा जल के संचय की अनिवार्यता हो, वनों के विस्तार और नदियों से रेत निकासी के लिए कड़ी और संतुलित व्यवस्थाएं हों और इन सबसे बढ़कर प्रत्येक नागरिक की दृढ़ इच्छा शक्ति जगाई जाए। हमें याद रखना होगा कि धरती और आसमान को स्वस्थ रखेंगे तो भूतल भी लबालब होगा। जब यह सब होगा तभी धरती ‘माँ’ की भूमिका निभा पाएगी! जरूरत है ईमानदार चिंतन, प्रयासों और ऐसा करने वालों से सीख लेने की।

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