चुनाव में दिन-ब-दिन बढ़ता काले धन का प्रयोग

राकेश दुबे

देश ने आम चुनाव के दौरान हुई छापे की कार्रवाई ने इस बात को उजागर कर दिया है कि देश में चुनाव अभियान किस हद तक उस धन पर निर्भर करते हैं, जिन्हें सामान्य भाषा में काला या अवैध कहा जाता है । चुनाव आयोग की विशेष टीम ने अब तक देश भर से जो नकदी, शराब और मादक पदार्थ जब्त किए हैं उनकी कीमत १८०० करोड़ रुपये से ज्यादा हो सकती है। यह न केवल अपने आप में एक बड़ी समस्या है बल्कि इसमें दिनोदिन इजाफा भी होता जा रहा है।  

आज मतदान का पहला चरण है और इसके बावजूद ऐसा प्रतीत हो रहा है कि पिछले आम चुनाव के दौरान पकड़े गये ३००  करोड़ रुपये वह आंकड़ा पीछे  छूट चुका है, यह राशि पिछले चुनाव में जब्त हुई थी । इस चुनाव में अब तक ४७३  करोड़ रुपये की नकदी जब्त की जा चुकी है और ४१०  करोड़ रुपये मूल्य का सोना पकड़ा जा चुका है। अकेले तमिलनाडु से २२०  करोड़ रुपये मूल्य का सोना जब्त किया गया है। जब्त नकदी के मामले में भी तमिलनाडु १५४  करोड़ रुपये के साथ शीर्ष पर है।

इसी दौरान , पंजाब और गुजरात मादक पदार्थों की जब्ती के मामले में शीर्ष पर हैं। अकेले गुजरात से ही ५००  करोड़ रुपये मूल्य का मादक पदार्थ जब्त किये गये है। चुनाव आयोग ने जो राशि जब्त की है, उसके अलावा भी आयकर विभाग समेत विभिन्न सरकारी एजेंसियों ने भी काफी मात्रा में नकदी जब्त की है। हाल के दिनों में ६०  से ज्यादा छापे मारे गए। सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज के अनुमान के मुताबिक इस बार  चुनावों में कुल मिलाकर ५०००० करोड़ रुपये से अधिक की राशि खर्च हो सकती है। यह राशि अमेरिकी में हुए पिछले राष्ट्रपति चुनाव में खर्च हुई राशि से अधिक है।

भारत के निर्वाचन आयोग ने चुनाव में हर प्रत्याशी के व्यय की सीमा तय कर रखी है, परन्तु  उसका हमेशा उल्लंघन होता है। चुनाव आयोग ने प्रत्याशियों के लिए ५०  से ७०  लाख रुपये के व्यय की सीमा तय की है, परंतु यह निरर्थक जान पडती  है | क्योंकि राजनीतिक दलों के व्यय की सीमा तय नहीं की गई है और न ही राजनीतिक दल ऐसा कुछ करने की मंशा ही रखते हैं । तमिलनाडु में द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम समेत कुछ विपक्षी दलों ने यह दावा भी किया है कि छापे राजनीति से प्रेरित हैं। कुछ मामलों को अपवाद मानते हुए भी यह ऐसी व्यवस्थागत समस्या बन चुकी है जिसे हल करना आवश्यक है। गत वर्ष प्रकाशित-कॉस्ट्स ऑफ डेमोक्रेसी: पॉलिटिकल फाइनैंस इन इंडिया, में अनेक राजनीति विज्ञानियों के एक समूह ने देश में चुनावी फंडिंग की समस्या की जांच की और उन्हें जो नतीजे मिले वे परेशान करने वाले थे।

इसके परिणाम स्वरूप चुनाव खर्च का बोझ वहन कर सकने वाले प्रत्याशियों की बढ़ती तादाद है | इसका अर्थ यह है कि लोकसभा के स्वरूप में ऐसा बदलाव आ रहा है कि वहां अमीरों की तादाद बढ़ रही है। उदाहरण के लिए २०१४ की लोकसभा में ८२ प्रतिशत  उम्मीदवारों के पास एक करोड़ रुपये से अधिक संपत्ति थी। राजनीति विज्ञानियों ने यह भी पाया कि इस प्रकार के व्यय को वोट के बदले नोट के रूप में देखना सरलीकरण होगा। बल्कि यह तोहफे देने और मूलभूत चुनावी मशीनरी पर व्यय करने जैसा है।  अब तो आवश्यकता  इस बात की है कि इस  व्यय को नियंत्रित किया जाए और पार्टी स्तर पर नकदी जुटाने को सीमित किया जाए तथा पार्टियों द्वारा अपने प्रत्याशियों को की जाने वाली फंडिंग को अधिक पारदर्शी बनाया जाए। इससे प्रत्याशियों की खुद की फंडिंग पर निर्भरता कम होगी। मौजूदा सरकार के बेनामी चुनावी बॉन्ड इसमें मददगार नहीं हैं। इस विषय पर व्यापक सहमति की आवश्यकता है जिसमे सभी पक्ष शमिल हों और  आवश्यक खेच का पैसा डिजिटल तरीके से जुटाया जाए।

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