वापस पानी में न चली जाय ऋणमुक्ति की भैंस

कमलेश पारे
ऋणमुक्ति की घोषणा हुए पूरे डेढ़ माह हो चुके हैं.इसी के कारण तीन राज्यों में राजनीतिक’तख्ता पलट’ हुआ था.लेकिन, इस डेढ़ महीने के बाद भी,घोषणा के क्रियान्वयन में सभी के हाथ-पाँव फूल गए हैं,और पाँव के नीचे की जमीन भी लगभग सरक सी गई है. 17 दिसंबर,2018 को बनी सरकार ने मामले को देख-परख कर 15 जनवरी,2019 के आसपास प्रदेश की सभी सहकारी समितियों और बैंक शाखाओं में कर्जे की स्थिति सम्बन्धी लिस्टें सार्वजनिक रूप से लगाईं थीं.तभी से गाँवों और कस्बों में गज़ब की हड़बड़ी का आलम है.किसी ने क़र्ज़ लिया ही नहीं,और तथाकथित रूप से उसके नामे बड़ी रकम दर्ज़ हुई है,वहीँ जिसने लिया है,उसकी माफ़ी मज़ाक नुमा हुई है. इस सबके चलते मीडिया के मैदान में,राजनीतिक दल आरोपों के तीर-तमंचे और तोप,एक दूसरे पर खूब चला रहे हैं,पर व्यावहारिक स्तर पर स्थितियां बिलकुल स्पष्ट नहीं हैं.
हाँ,ग्वालियर और हरदा में,जहाँ सरकारी या सहकारी अमले ने आँखों के देखते ही मख्खी निगलवा दी है,के खिलाफ एक दो दिन पहले ही,पुलिस में ‘एफआईआर’लिखवाई गई है.शेष प्रदेश का ‘एफआईआर’लिखने वाला अमला कहता है कि हम तो ‘आडिट-रिपोर्ट’के साथ ही इसकी कायमी करेंगे.क्योंकि,इसके बिना अदालतों में प्रकरण टिक नहीं पाते हैं,और आरोपी छूट जाते हैं.आडिट करने वालों का,अमले की कमी का,अपना रोना पहले से है.सहकारी समितियों में कई-कई साल से लंबित,या आधा-अधूरा हुआ आडिट भी,अपने आप में अलग ही चर्चा व चिंता का विषय है,जो इस ऋण मुक्ति में बाधक हो सकता है.
इस तरह,प्रदेश भर में मैदानी स्तर पर किसी को कुछ नहीं मालूम.यदि मालूम भी है,तो पूरा मालूम तो नहीं ही है.जितने मुंह उतनी ही बातें.सब जगह समान समस्याएँ हैं.किसी ने बैंक से क़र्ज़ लिया ही नहीं,और वह कर्जदारों की लिस्ट में है,तो किसी ने लिया है,किन्तु क़र्ज़ माफ़ी बहुत ही कम रक़म की हुई है.ग्रामीण साख सहकारी समितियों और बैंक की क़स्बाई शाखाओं में कर्मचारी भी कम हैं,जो हर किसान से बात कर सकें,इसलिए ‘माथाफोड़ी’अब बहुत ही खतरनाक स्तर की होती जा रही है.
सूचियों के आधार पर यदि किसान असंतुष्ट है,तो उससे गुलाबी रंग का फार्म भरवाया जा रहा है.जिसकी जांच होगी.अकेले इंदौर संभाग में ही लगभग 25 हजार गुलाबी फार्म पहले ही हफ्ते में आये हैं.स्थानीय,जिले और प्रदेश स्तर पर जब पूछा गया कि इन ‘गुलाबी फार्मों’का अब क्या होगा ? जवाब भी सब जगह से समान ही मिला कि ‘जांच होगी’.जांच कैसी होगी ? तो बताया गया कि ऐसे किसानों के ऋण फार्म निकलवाए जाएंगे,उनके दस्तखत की,कोई हस्ताक्षर विशेषज्ञ जांच करेगा,आरोप पत्र दिए जाएंगे,फिर अदालत से दोषी को कड़ी सजा दिलवाई जायेगी.
यानी फिर वही गवाह,बयान,रिपोर्ट और लम्बे समय बाद मिलने वाले न्याय नहीं,निर्णय के बीच कितना वक़्त लगेगा,किसी को नहीं मालूम.तब तक उस किसान की ऋण-पात्रता या अगले कर्जे  का क्या होगा,यह भी किसी को नहीं मालूम.
ऊपर से बैंकिंग के विशेषज्ञ तो यहाँ तक कह रहे हैं कि वसूली न होने से निजी स्तर पर,बैंक और राज्य के स्तर पर भी नियमानुसार ऋण-पात्रताएं जरूर प्रभावित होंगी.मतलब,भरोसा नहीं कि इस ऋणमुक्ति की ‘भैंस कब और किस स्तर पर फिर पानी में चली जाए’. शातिर अफसरों ने इसमें एक और ‘लोचा’निकाल लिया है,कि लोन फर्जी है,तो किसान को समझा-बुझाकर ‘हाँ’करा ली जायेगी.उसे कुछ पैसे भी दिए जाएंगे,फिर सरकारी घोषणा के अनुसार,कर्जे को तो माफ़ होना ही है.यानी ‘साहब’की उस हालत में भी चांदी ही है.
भोपाल में एक उच्च पदस्थ अफसर से जब पूछा गया कि-आखिर यह सब हो कैसे गया ? बैंक वालों ने तो सारे प्रदेश में,सबको आँखों देखते ही मक्खी निगलवा दी.इस पर उनका बड़ा ही मासूम जवाब था कि जब आप पढ़े लिखे शहरी भी,बैंक में कर्ज़ा लेने जाते हैं,तो बिना पढ़े कई जगह किसी अनजान के कहने पर दस्तखत करते ही हैं,वैसे ही गाँव-कस्बों और किसान के स्तर पर भी हुआ होगा.
सहकारी बैंकों में गड़बड़ी का आलम तो यह भी है कि बैंक की ‘सिल्लक'(नकद राशि) बड़ी मात्रा में ऐलानिया हफ़्तों बाहर घूमी थी,लोग पकडे भी गए,लेकिन अदालत से सब छूट आये.यदि सब लोग भूल गए हों,तो याद कर लें कि यह हरदा में हुआ था,जब वह जिला नहीं बना था.इसी तरह बैंक सिल्लक के राजनेताओं द्वारा उठा लेने और वापरने के भी बहुत किस्से हैं.
इस बार ऋण मुक्ति के बहाने,अब यह बड़ा ही नहीं,बहुत बड़ा आर्थिक घोटाला सामने आने की उम्मीद है.यह सब तब हुआ है,जब गाँव गाँव ‘डिजिटल मेम्बरशिप रिकार्ड'(डीएमआर)की बात हो रही है,पीओएस मशीन से सौदे हो रहे हैं.हर व्यक्ति का आधार कार्ड कई जगह जुड़ा हुआ है.यानी,कस्बाई व ग्रामीण स्तर के समिति और बैंक मैनेजरों की हिम्मत और होशियारी की तो बलिहारी ही है.
इस पूरे प्रकरण में हजारों नहीं,तो सैकड़ों करोड़ रुपयों का घपला तो अभी-अभी सामने ही दिख रहा है.अभी ही मुख्यमंत्री श्री कमलनाथ ने इसे तीन हज़ार करोड़ का घपला कहा है. जिससे बात करो,वह मैनेजरों और उनके दलालों पर ही शक कर रहा है.एक जिम्मेदार अफसर ने तो यह भी कहा है कि यह तो ‘आइसबर्ग’का छोटा सा कोना है.अंदर का खेल तो बहुत बड़ा होगा.
मैनेजरों से पूछो,तो उनका एक ही जवाब है,कि यह ऋणमुक्ति,कोई पहली बार तो हुई नहीं है,हर बार किसान योजना की बारीकियों को समझे बिना ऐसा ही हल्ला मचाते हैं.लेकिन,इन ‘साहबों’के पास,बैंकों और समितियों में पल रहे दलालों की उपस्थिति का कोई जवाब नहीं है.बात मानिये,जितने दलाल आजकल सभी बैंकों में घूम रहे हैं,उतने तो अनाज,कपड़े और पशुओं की मंडी में भी नहीं होते. ग्वालियर जिला सहकारी बैंक की अकेली चीनोर शाखा में से,एक हज़ार से ज्यादा किसानों के नाम से कोई ‘भूत’ सौ करोड़ रुपये से ज्यादा ले गया.इन एक हजार लोगों में से कई तो भूमिहीन और खेतिहर मज़दूर भी हैं. राजधानी से सटे गावों के किसानों के जितने रुपयों के कर्ज माफ़ हुए हैं,वे मज़ाक तो नहीं,बैंक वालों के अपराध ज्यादा लगते हैं.जैसे मज़ाकनुमा चेक पहले फसल बीमे के आये थे, वैसी ही अब कर्जमाफी हुई है.
शायद आपको याद हो,कि देश में अपनी तरह के अकेले पत्रकार श्री पी साईंनाथ की पुस्तक ‘एवरीबॉडी लाइक्स गुड ड्राट’में उन्होंने लिखा था कि हर आपदा,सरकारी अफसरों की कमाई का बड़ा मेला होती है.आपदा के समय आई नकद पैसों की फसल सब दूर अफसर बड़े ही मजे से काटते हैं.
नरसिंहपुर,गुना,होशंगाबाद और हरदा जिलों के कुछ आंचलिक पत्रकारों से पूछें,तो वे यही कहेंगे कि हमारे यहाँ ही नहीं,सारे प्रदेश में समर्थन मूल्य पर होने वाली खरीद अफसरों की लूट का एक ‘उत्सव’होती है,और खाद-बीज की कमी भी खेती-बाड़ी से जुड़े अफसरों की कमाई का त्यौहार होता है. यहाँ सबसे दुखद पहलू तो यह है कि चीज़ें सारे प्रदेश में एक जैसी हैं,लेकिन प्रतिपक्ष इसमें पूरी तरह से लापता है.नरसिंहपुर और गुना के वरिष्ठ पत्रकार श्री ब्रजेश शर्मा और नूरुल हसन ‘नूर’कहते हैं कि प्रतिपक्ष को तो मालूम ही नहीं कि हो क्या रहा है. राजधानी के वरिष्ठ पत्रकार श्री चंद्रकांत नायडू,संयोग से इसके पहले हुई ऋणमुक्ति के समय,तबके मुख्यमंत्रीजी के साथ गॉंवों में घूमे थे.उनके सहित सबने तब देखा था कि ग्रामीण साख या सरकारी सुविधाओं और योजनाओं का सर्वाधिक लाभ,बड़े किसान या बिचौलिए लगभग छीनकर ले लेते हैं,और चुनाव में इनसे ही चुनावी नफे-नुकसान का डर भी रहता है,इसलिए भ्रष्टाचार पर सर्जिकल स्ट्राइक तो हो ही नहीं सकती. इसीलिए औजारों और इच्छा-शक्ति के अभाव में, अक्सर,भैंस वापस पानी में ही चली जाती है.

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