स्मार्ट स्प्रेयर से कम हो सकती है कीटनाशकों की बर्बादी

रईस अल्ताफ

Twitter handle: @rayies_sts

नई दिल्ली, 9 अक्टूबर (इंडिया साइंस वायर): बगानों में कीटनाशकों के छिड़काव के लिए भारतीय शोधकर्ताओं ने अल्ट्रासोनिक सेंसर आधारित एक स्वचालित स्प्रेयर विकसित किया है, जिसकी मदद से कीटनाशकों के उपयोग में कटौती की जा सकती है। अल्ट्रासोनिक ध्वनि संकेतों पर आधारित इस स्प्रेयर को ट्रैक्टर पर लगाकर कीटनाशकों का छिड़काव किया जा सकता है। ट्रैक्टर को बागान में घुमाते वक्त यह स्प्रेयर जब पौधों के करीब पहुंचता है तो सक्रिय हो जाता है और खुली जगह में पहुंचने पर यह बंद हो जाता है। इस स्प्रेयर का सफल परीक्षण महाराष्ट्र के राहुरी  स्थित रिसर्च फार्म में अनार के बागान में किया गया है।

इस स्प्रेयर से छिड़काव करने पर कीटनाशकों के उपयोग में 26 प्रतिशत तक बचत दर्ज की गई है। इसके साथ ही फलों में संक्रमण रोकने में भी इसकी दक्षता का स्तर 95.64 प्रतिशत तक प्रभावी पाया गया है। इस अध्ययन से संबंधित नतीजे शोध पत्रिका करंट साइंस में प्रकाशित किये गए हैं। इस स्प्रेयर में अल्ट्रासोनिक सेंसर, माइक्रोकंट्रोलर बोर्ड, सोलीनॉइड वॉल्व, एक-तरफा वॉल्व, स्थायी विस्थापन पंप, प्रेशर गेज और रिलीफ वॉल्व लगाया गया है। 12 वोल्ट बैटरी से चलने वाले इस स्प्रेयर में 200 लीटर का स्टोरेज टैंक लगा है।

बागानों में किसान आमतौर पर हस्तचालित छिड़काव या मशीनी छिड़काव करते हैं। इन दोनों तरीकों में काफी खामियां हैं। हस्तचालित पद्धति में छिड़काव करने वाले व्यक्ति को स्प्रेयर अपने हाथ में लेना पड़ता है जो उसके स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है। मशीनी छिड़काव प्रणाली में कीटनाशक का निरंतर छिड़काव होते रहने से काफी मात्रा में रसायन बरबाद हो जाता है। दूसरी ओर सेंसर आधारित यह यह नया स्प्रेयर सिर्फ चयनित पौधों पर ही कीटनाशक का छिड़काव करने में सक्षम है।

इस अध्ययन से जुड़े शिमला स्थित केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक ब्रृजेश नारे ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि, “कीटनाशकों के छिड़काव की यह स्मार्ट तकनीक दोनों परंपरागत छिड़काव पद्धतियों को प्रतिस्थापित करके किसानों के स्वास्थ्य और संसाधनों को बचाने में मददगार हो सकती है।”

बागानों में पौधों की जटिल संरचना और उनके बीच की दूरियों में भिन्नता के कारण उन पर कुशलता के साथ कीटनाशकों का प्रयोग करना चुनौती होती है। छिड़काव के दौरान कीटनाशकों का एक बड़ा हिस्सा पत्तियों और फलों तक पहुंच नहीं पाता और मिट्टी या हवा में घुलकर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है। अनुसंधान दल में ब्रृजेश नारे के अलावा वी.के. तिवारी (भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, खड़गपुर), अभिषेक कुमार चंदेल (वाशिंगटन स्टेट यूनिवर्सिटी, अमेरिका) और सत्यप्रकाश कुमार (केंद्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान, भोपाल) शामिल थे। (इंडिया साइंस वायर)

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