पश्चिम बंगाल में जो भी हुआ वह भारत के संघीय बनावट पर आक्रमण है

गौतम चौधरी

hsddun@gmail.com

केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो-सीबीआई के बीच का झगड़ा अभी शांत भी नहीं हुआ था कि देश की यह सबसे बड़ी जांच एजेंसी एक नए विवाद में फंस गयी है। दरअसल, कोलकाता के पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार से सीबीआई की टीम पूछताछ करने के लिए कोलकाता गयी थी। सीबीआई राजीव कुमार से पूछताछ करती, उससे पहले ही कोलकाता पुलिस ने उस टीम को थाने में बिठा लिया। मतलब टीम को बंगाल पुलिस ने अपने अभिरक्षण में ले लिया। यह देश की पहली घटना है जब किसी केन्द्रीय जांच एजेंसी की टीम को इस प्रकार राज्य पुलिस के द्वारा थाने में बिठाया गया हो। यह घटना देश की सम्प्रभुता को चुनौती देने वाली घटना से कम नहीं है। हालांकि इस घटना पर बंगाल की ममता बनर्जी की सरकार के पास अपने तर्क हैं और सीबीआई को नियंत्रित करने वाली केन्द्र सरकार के अपने तर्क हैं। निःसंदेह तर्क होंगे। मसलन हर घटना को नैतिक और कानूनी तौर पर वैध ठहराने के तर्क गढ लिए जाते हैं लेकिन जो हड़कत पश्चिम बंगाल की पुलिस ने की है वह भारतीय संघीय व्यवस्था पर चोट है और इसे किसी कीमत पर उचित नहीं ठहराया जा सकता है। यहां मैं कुछ उदाहरण देना चाहूंगा। मसलन पंजाब के खालिस्तानी चरमपंथी जरनैल सिंह भिंडरावाला को किसी समय में एक खास राजनीतिक दल की ओर से संरक्षण मिला था।

आपको बता दें कि एक मामले को लेकर भिंडरावाले पर मुकदमा चलाया गया था लेकिन वह अदालत में जाने से इनकार कर दिया और कहा कि मैं भारत के अदालत में विश्वास ही नहीं करता हूं। फिर उसकी सुनवाई गुरदर्शन प्रकाश गुरुद्वारा, मेहता चैक, जिला अमृतसर में हुआ। उसका प्रतिफल पूरा देश देख चुका है। प्रथम चरण में संरक्षण देने वाले राजनीतिक दल को भिंडरावाला से फायदा दिखा लेकिन बाद में वही भिंडरावाला देश की संप्रभुता के लिए खतरा पैदा किया और संरक्षण देने वाले का भी सर्वनाश कर दिया। इसी प्रकार सुभाष घिसिंग का मामला है। लालू यादव के मामले की चर्चा यहां करना मैं जरूरी समझता हूं। मामला बेहद रुचिकार है। कोर्ट के आदेश पर सीबीआई बिहार में चारा घोटाले की जांच कर रही थी। ज्वाइंट डायरेक्टर यूएन विश्वास, जांच टीम को लीड कर रहे थे। बिहार के तात्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद के अनुरोध पर सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट को जांच की निगरानी का जिम्मा सौंपा। सीबीआई ने जांच की प्रारंभिक रिपोर्ट कोर्ट में पेश की। सीलबंद रिपोर्ट पढ़ कर न्यायाधीश चैंक पड़े। उन्होंने डॉ विश्वास से पूछा कि क्या यह आपकी रिपोर्ट है? विश्वास ने इंकार में सिर हिलाते हुए अपनी जेब से एक दूसरी रिपोर्ट निकालकर अदालत को दिया। कोर्ट में उपस्थित सभी हैरानी से यह देख रहे थे। जजों ने दूसरी रिपोर्ट भी पढ़ी फिर पूछा-दोनों रिपोर्ट में अंतर क्यों है? डॉ विश्वास ने बताया की नियमानुसार उन्होंने अपनी रिपोर्ट सीबीआई निदेशक को भेजी थी। वहां से एडिट होकर रिपोर्ट कोर्ट में पहुंची है लेकिन उन्होंने अपनी रिपोर्ट की एक कॉपी रख ली थी, जो आपके पास है। सीबीआई के तत्कालीन डायरेक्टर जोगिंदर सिंह भी कोर्ट में मौजूद थे। उनका चेहरा स्याह पड चुका था।

मूल रिपोर्ट में परिवर्तन क्यों किया गया, कोर्ट के इस सवाल का वे जवाब नहीं दे सके। जजों को मामला समझते देर नहीं लगी। कोर्ट ने तत्काल जोगिन्दर सिंह को चारा घोटाले जांच से अलग रहने का निर्देश दिया। विश्वास को स्वतंत्र रूप से मामले की जांच का आदेश हुआ। कहा गया कि वे अपनी रिपोर्ट सीधे कोर्ट को सौंपे। इसके बाद विश्वास की जांच जो शुरु हुई तो वह घोटालेबाजों को सलाखों के पीछे करके ही रुकी। 20  साल तक बिहार पर राज करने की घोषणा करनेवाले लालू प्रसाद को 6 साल के बाद ही मुख्यमंत्री की गद्दी छोड़ जेल जाना पड़ा। विभिन्न दलों के आधे दर्जन से अधिक राजनेताओं और अफसरों को सजा हुई। यहां मैं एक बात यह भी बता दें कि कालांतर में ममता बनर्जी जितनी घातक तो नहीं लेकिन कुछ इसी प्रकार की परिपार्टी भाजपा शासित प्रदेश के मुख्यमंत्रियों ने भी की है। 2012 में रमन सिंह के शासनकाल के दौरान सीबीआई के अधिकारियों को बंधक बना लिया गया था। 2012 में रमन सिंह के शासनकाल के दौरान सीबीआई के अधिकारियों को बंधक बना लिया गया था।

मार्च, 2011 में छत्तीसगढ़ के बस्तर में ताड़मेटला कांड हुआ था। इस कांड में 300 घरों को आग लगा दी गई थी और तीन लोगों की हत्या कर दी गई थी। इस हत्याकांड के आरोप लगे थे छत्तीसगढ़ के विशेष सुरक्षा बलों पर, जिन्हें एसपीओ कहा जाता है। मामले की जांच सीबीआई कर रही थी। इस कांड की जांच के लिए सीबीआई के भोपाल जोन के 6 अधिकारी 9 फरवरी, 2012 की शाम को ताड़मेटला पहुंचे थे। उसी दिन सुकमा के एएसपी डीएस मरावी पर माओवादियों ने हमला कर दिया। इस दौरान एक एसपीओ करलम सूर्या की मौत हो गई। वहीं माओवादियों से बात करने पहुंचे स्वामी अग्निवेश पर भी हमला हुआ। कुल मिलाकर इलाके का माहौल बेहद खराब हो गया था। इसी माहौल में सीबीआई के अधिकारी ताड़मेटला कांड की जांच के लिए पहुंच गए थे। सीबीआई के अधिकारियों को देखते एसपीओ भड़क गए और आरोप लगाया कि सीबीआई अधिकारी ही एसपीओ करलम सूर्या की मौत के जिम्मेदार हैं। इसके बाद सीबीआई के अधिकारियों ने खुद को एक रूम में बंद कर लिया। सीबीआई अधिकारियों ने आरोप लगाया कि एसपीओ के पास हथियार और हथगोले भी थे और उन्होंने फायरिंग भी की थी। 2012 में शिवराज सिंह चैहान की सरकार ने एक आदेश पारित कर सीबीआई के खिलाफ मोर्चा खोला था। उस आदेश में केंद्रीय एजेंसियों को राज्य में आॅपरेशन से अलग कर दिया गया था।

12 अक्टूबर, 2012 को शिवराज सरकार के गृह विभाग ने एक नोटिफिकेशन जारी किया। उस नोटिफिकेशन में कहा गया था कि मध्यप्रदेश सरकार दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम 1946 के तहत इस बात की इजाजत देती है कि केंद्र सरकार की जांच एजेंसी मध्यप्रदेश में जांच कर सकती है लेकिन वो जांच एजेंसियां मध्यप्रदेश सरकार के तहत आने वाले आईएएस, आईपीएस और आईएफएस अफसरों की जांच नहीं कर सकती है। इसका सीधा सा मतलब ये था कि कोई भी केंद्रीय एजेंसी मध्यप्रदेश के अधिकारियों को हाथ भी नहीं लगा सकती है। हालांकि पश्चिम बंगाल की सराकर ने अपने अधिकारी को संरक्षित करने के लिए ऐसा किया लेकिन इसके भी अंजाब बुरे हो सकते हैं। वैसे इस मामले में केन्द्र की नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार की भी भूमिका बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती है। वैधानिक रूप से सीबीआई राज्य सराकर की बिना अनुमति प्रदेश में किसी प्रकार का कोई अभियान नहीं चला सकती है। भारतीय संघीय ढंचे में राज्य को स्वायत्ता मिली हुई है। कई राज्य पहले से सीबीआई के प्रवेश को लेकर लिखित अनुमति केन्द्रीय गृह मंत्रालय को दे रखें है लेकिन कई राज्य सरकारें केस के आधार पर सीबीआई को अनुमति प्रदान करती है। इधर जब केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो में उठा-पटक प्रारंभ हुआ तो सीबीआई की विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़ा करते हुए आंध्रप्रदेश की सराकर ने अपनी अनुमति वापस ले ली। फिर पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ने भी इसकी घोषणा की और अब थोड़ दिन पहले छत्तीसगढ की सरकार ने भी ऐसा ही किया।

ऐसे में यह मामला राजनीतिक रूप से संवेदनशील हो गया और इस मामले को केन्द्र सरकार को राजनीतिक हस्तक्षेप से ही संभालना चाहिए था लेकिन केन्द्र सरकार ने ऐसा कुछ भी नहीं किया उलटे सीबीआई की टीम पश्चिम बंगाल पहुंच गयी। इसे केन्द्र सरकार की नाकामी ही कहनी चाहिए। यदि समय रहते केन्द्र सरकार मामले में हस्तकक्षेप की होती तो आज ममता बनर्जी की सरकार को यह कदम उठाने की जरूरत नहीं पडती। हालांकि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय बेहद उचित और अनुभव वाला कहा जा सकता है। पुलिस अधिकारी राजीव कुमार से पूछताछ की अनुमति कोर्ट ने दे दी है। कोर्ट के इस निर्णय को केन्द्र सरकार और सीबीआई अपनी जीत बता रही है लेकिन जो संघीय ढंचे पर आक्रमण हुआ है उसके लिए न तो कोर्ट कुछ कहने के लिए तैयार है और न ही केन्द्र सरकार। कोर्ट ने सापफ-साफ कह दिया है कि विधायिका का मामला है इसलिए हम उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकते हैं। यदि यही परिपाटी चली तो फिर हर प्रदेश अपने-अपने आंतरिक मुद्दों को ध्यान में रखकर संघीय ढंचों पर प्रहार करेगा। इसपर सत्ता प्रतिष्ठान को गंभीरता से सोचना चाहिए। भारत विभिन्न अनुशासन, सभ्यता, संस्कृति, भाषा, पंथ, जाति और धर्म का देश है। इस देश को एक बनाने में हमारे संविधान की महत्वपूर्ण भूमिका है। देश की एकता और अखंडता सर्वोपरी है। इसके खिलाफ किसी प्रकार के कृत्य अक्षम्य हैं। यह राष्ट्र तभी एकीकृत रह पाएगा जब हम अपने-अपने हद में रहेंगे अन्यथा हम बिखड जाएंगे।

हमने चेकोसलोवाकिया, अफगानिस्तान, सीरिया मिस्र, वियतनाम, कोरिया आदि दुनिया के कई देशों को आधुनिक युग में पराभूत होते देखा है। सोवियत यूनियन भी इसी प्रकार के कुछ अंतविरोधों के कारण धरासाई हुआ। हमें वह भूल नहीं करनी चाहिए जो हम लगातार कर रहे हैं। इस मामले में ममता बनर्जी को भी तसल्ली से काम लेना चाहिए हालांकि उनके आरोप ज्यादा तल्ख हैं लेकिन बातचीत से राजनीतिक समस्या का हल निकाला जा सकता था पर ऐसा नहीं हुआ। केन्द्र सरकार की ओर से बताया जा रहा है कि चीट-फंड घोटाले की जांच के लिए सीबीआई कोलकाता गयी थी लेकिन सीबीआई के अंतरिम निदेशक नागेश्वर राव की पत्नी की कंपनी का एंगल भी यहां फंस रहा है। फिर भाजपा ने चुनाव आयोग से राजीव कुमार पर आपत्ति दर्ज कराई थी। इधर ममता बनर्जी का आरोप है कि चीट-फंड घोटाले के मास्टर माइंड आज भाजपा के नेता बने हैं और उनके उपर सीबीआई जांच ढीली चल रही है लेकिन जो भाजपा में शामिल नहीं हुए उनके उपर जबरदस्त कार्रवाई हो रही है यह सरासर अन्याय है। आंतरिक बात क्या है यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा लेकिन दोनों ओर से जिस प्रकार मामले पर पहल हुआ वह तरीका बेहद गलती है और भारत के संघीय ढंचे पर आक्रमण है। इस प्रकार की गतिविधि से हर संवैधानिक इकाई को परहेज करना चाहिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Enable Google Transliteration.(To type in English, press Ctrl+g)