अंशुल उपाध्याय की कलम से …..

आज भारत में कई जगह sc, st एक्ट का विरोध हो रहा है। ये विरोध करने वाले लोग कौन है?? क्या कभी किसी ने इस ओर विचार किया हैं। इनमें सुवर्ण अधिक है या बेरोजगार अधिक है। या फिर वो लोग अधिक है जो,शिक्षित समाज का हिस्सा तो है,पर हर जगह आरक्षण से न खुश है।
       वजह चाहे जो भी हो,ये सारे आज एक जुट हुए है,या हो रहे है इनमें सभी किसी न किसी राजनैतिक दल से सम्बंधित नहीं हो सकते। दुसरो पर आरोप प्रत्यारोप करना सबसे अच्छा तरीका होता है जबाब देने का। पर मैं कहना चाहती हूँ कि, क्या आरोप लगाने या समस्या के संबंध में बात करने से समस्या का समाधान होता है?? उत्तर है,नहीं। आज नौबत यहाँ तक कैसे आ गयी कि, संस्कारो के प्रदेश में भी आंदोलन हो रहे है?? इसका एक कारण है समाज में व्याप्त असमानता और दूसरा कारण है बेरोजगारी।
सरकारी नीतियों को बनाने से ज्यादा जमीनी स्तर पर उनके प्रचार की अधिक आवश्यकता है। गरीब बस्तियों और आम लोगो के इलाकों में एक दिवसीय शिविर या कैम्प लगाये जाए और सरकारी उपक्रमो से कंप्यूटर के माध्यम से कैसे जुड़े ये प्रशिक्षण दिया जाये। स्टार्ट अप इंडिया हो या सरकारी नोकरी संबंधी वेवसाइट, उस पर जाए कैसे? और अपने मतलब की योजना के लाभ की क्या विधि है?? इस पर थोड़ी महाविद्यालय और मध्यम वर्गीय बस्तियों में जाग्रति शिविरों की आवश्यक्ता है। जरुरी नहीं प्रत्येक व्यक्ति कंप्यूटर जानता हो। पर ये अवश्य जरुरी है कि,प्रत्येक व्यक्ति के पास कोई न कोई रोजगार का साधन अवश्य हो। जब व्यक्ति काम करेगा अपने परिवार के साथ खुश होगा तो, उसको कभी सरकार विरोधी किसी भी कार्य में सक्रिय होने का समय ही नहीं मिलेगा।

परमात्मा का अर्थ है परम+आत्मा अर्थात समस्त संसार की आत्माओं में सबसे परम आत्मा।अब बात ये की परमात्मा को पाया कैसे जाए?? कृष्ण कहते है,मै कण कण में हूँ। फिर हम मंदिर ,मस्जिद,गिरजाघर में गुरूद्वारे में क्या ढूंढने जाते है?? तब मैं कहूँगी की वहाँ ईस्वर हो न हो पर सकारात्मक ऊर्जा अवश्य होती है।वो सकारात्मक ऊर्जा जो हमारी प्राथर्नाओ से निकली है,हमारे द्वारा बोले गये अच्छे शब्दो और मंत्रो से निकली है। दीवारे उन शब्दों की पवित्र ऊर्जा को स्वमं में सोख लेती है। ठीक वैसे जैसे छिड़का हुआ जल दिवार सोख लेती है। फिर जब,हम उस पावन जगह जाते है तो हमारे शब्द उन्ही दीवारों से टकराकर हमारी ही आत्मा तक दुगनी ऊर्जा के साथ पहुँचते है। जो हमको एक नयी स्फूर्ति देती है। मुझे लगता है परमात्मा सबसे ज्यादा प्रसन्न कलाकारों से होते है,लिखने वाला,गाने वाला,नृत्य करने वाला,कलात्मक भोजन बनाने वाला,कलात्मक गहने बनाने वाला आदि। तभी तो सिनेमा के कलाकार और गायक इतना नाम और धन कम समय में ही कमा लेते है।क्योंकि,उनके अभिनय और नृत्य के तार हमारी आत्मा को प्रसन्न कर देते है। और शोहरत उनके हिस्से आ जाती है। मीरा बाई ने जीवन भर कृष्ण से ही प्रेम किया और गीत गाये। आज कृष्ण भक़्तों में उनका नाम सर्वप्रथम लिया जाता है। तुलसीदास,वेद व्यास,कबीर,रहीम,हो या बाल्मीकि जी सबने प्रभु चरित्र लिखा और जन जन की आत्मा से जुड़ कर महान बन गए। सब कहने का सार ये है,कि कलाकार बनिए और अपनी कला से लोगो के ह्रदय को जीत कर आत्मा तक पहुँचिये फिर आपको महान बनने से कोई नहीं रोक पायेगा। ढोंग न करे राजनेता हो तब भी राजनेता होने का दिखावा न करे। आप जो भी है,उस पद से जुड़े कार्य ह्रदय से आत्मा से सतत करते रहे । तभी अन्य लोगो की आत्मा तक पहुचेंगे। तभी सब आत्माओं में सबसे परम आत्म बनेंगे, स्वमं तक पहुँचेंगे। और परमात्मा को स्वमं की आत्मा में ही पा लेंगे। यही महान बनने का मार्ग है, कृष्ण के जीवन का सार है।

आज आपको ऊर्जा के विषय में बताना चाहूँगी।
ऊर्जा दो तरह की होती है एक सकारात्मक ऊर्जा और दूसरी नकारात्मक ऊर्जा। सकारात्मक ऊर्जा अर्थात देवता,और नकारात्मक ऊर्जा अर्थात दानव।
देवता,उस समुदाय को कहा गया है,जो सदैव,दान,धर्म,क्षमा,न्याय,शालीनता,तेज़, और सत्य व अहिंसा की बात करते है। तथा दानव में वे समुदाय आते है,जिनके स्वाभाव में, लालच,क्रोध,हिंसा,झूठ,ईर्ष्या,घमंड और अन्याय की प्रवत्ति होती है।
           इन्ही गुणो के आधार पर मनुष्य को भी सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति होती है। जिस व्यक्ति के स्वाभाव में जिन गुणों की अधिकता होती है, वह उसी संज्ञा को प्राप्त करता है। इसलिए सदैव अपने व्यवहार में दैवीय प्रवत्ति के गुण लाइए,फिर देखिएगा कि, कैसे आपको प्रकृति की गुप्त ऊर्जाएं स्वमं ही प्राप्त होती है।जो कि आपके आभा मंडल को वृस्तृत कर देती है।
    आगे चलकर दैवीय प्रवत्ति के लोग ही देवताओं की तरह पूज्यनीय हो जाते है। आराम से बिना अस्पताल के चक्कर लगाये प्राण निकलते है।उनके जाने पर पूरी दुनिया शोक मग्न हो जाती है। सदियों तक उनका नाम अमर रहता है। और दानव प्रवत्ति के लोगो को महानता का ढोंग करने के बाद भी जेल जाना पढ़ता है। समाज उनको त्रिरिस्कृत करता है,और मर्त्यु आने तक वो भयंकर रोगों में घिरकर कस्ट पाते है,कई महीनो तक उन्हें अस्पताल की सुईया चुभोई जाती है।बुढ़ापे में कोई साथ नहीं देता बडे कस्ट में प्राण निकलते है। और उनके जाने के बाद उनके ही परिवारजन चैन की सांस लेते हैं।
     सार ये है,कि स्वर्ग और नर्क अन्यत्र कही नहीं है,सब यही इसी मर्त्युलोक में है। अपने स्वाभाव में दया,करुणा, ममता,क्षमा और परोपकार लाइए,और दैवीय गति को प्राप्त होइये।
   “पद के मद में चूर पथिक गिरता गहरी खाई में, और जो अन्य प्राणि जन को आदर करे, सोत गुलगुली रजाई में” ।

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