Monday , 28 September 2020
समाचार

अपनी विरासत के प्रति गर्व की भावना नारद जयन्ती – प्रो. राकेश सिन्हा

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IMG_0459भोपाल. भारत केवल एक राष्ट्र नहीं, वरन एक सभ्यता है, संस्कृति है, जिसकी जड़ें हजारों साल पुरानी हैं | आज राष्ट्र पुनर्जागरण के दौर में लोग मई दिवस को भूलकर विश्वकर्मा दिवस मनाने लगे हैं, यह इसी बात का प्रमाण है, अपनी विरासत के प्रति गर्व की भावना का प्रगटीकरण है | नारद जयन्ती भी इसका ही एक रूप है | कानपुर के साम्प्रदायिक दंगे में मारे गए गणेश शंकर विद्यार्थी हों, अथवा बापूराव पराड़कर, हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे कालजयी पत्रकार, इनके शब्दों की वाणी तब भी सुनाई पड़ती थी, आज भी गूंजती है |

 15 जून को स्थानीय शहीद भवन में विश्व संवाद केंद्र तथा हिन्दुस्थान समाचार द्वारा आयोजित नारद जयन्ती कार्यक्रम में “सामाजिक चेतना में मीडिया की भूमिका” विषय पर मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए भारतीय नीति प्रतिष्ठान के मानद निदेशक तथा जाने माने लेखक, चिन्तक व दिल्ली विश्व विद्यालय में राजनीति शास्त्र के प्राध्यापक श्री राकेश सिन्हा ने उक्त विचार व्यक्त किये | कार्यक्रम का संचालन मीडिया एक्टीविस्ट अनिल सौमित्र ने किया. कार्यक्रम की अध्यक्षता दैनिक भास्कर समूह के जाने माने पत्रकार श्री अभिलाष खांडेकर ने की.

श्री सिन्हा ने कहा कि अंग्रेजों के शासनकाल में विदेशी पूंजी की मदद से अच्छे कागज़ पर छपने वाले टाईम्स ऑफ़ इंडिया अथवा स्टेट्समेन जैसे समाचार पत्रों की तुलना में 1887 से 1910 तक चले हिन्दी प्रदीप को 23 वर्षों में 10 प्रेस बदलनी पडीं. इलाहाबाद से छपने वाले स्वराज्य अखबार के 9 संपादकों को सश्रम कारावास की सजा हुई . अखबार ने एक विज्ञापन दिया – सम्पादक की आवश्यकता है.  पारिश्रमिक दो सूखी रोटी, एक गिलास पानी. प्रत्येक सम्पादकीय के लिए 10 वर्ष कारावास का पुरस्कार | और अचम्भा देखिये कि सम्पादक बनने के लिए कतार लग गई. इन्हीं अखबारों ने साम्राज्यवाद को चुनौती दी . यही है भारतीय पत्रकारिता की उज्वल विरासत . येन केन प्रकारेण पूंजी इकट्ठा कर समाचार पत्र निकालने वालों से सामाजिक चेतना की अपेक्षा नहीं की जा सकती . एक समाचार पत्र ने 250 कंपनियों से समझौता किया है . उसके 7 से 10 प्रतिशत शेयर इन कंपनियों ने लिए हैं, ताकि उन कंपनियों के काले कारनामे अखबार में न छपें. प. मदन मोहन मालवीय जी के लीडर और अभ्युदय, लोकमान्य तिलक के केसरी, गांधी जी के हरिजन तथा नेहरू जी के नेशनल हेराल्ड ने जिन सामाजिक सरोकारों को लेकर समाचार पत्र निकाले, उनकी तुलना में आज के समाचार पत्र कहाँ टिकते हैं ? आज अखबारों में सम्पादक नहीं, मालिक के लिये रेलवे टिकिट से लेकर राज्यसभा टिकिट तक की व्यवस्था करने वाले नियुक्त होते हैं.  उन्होंने कहा कि आज अखबार के मुखप्रष्ठ पर छपता है, निर्भीक व स्वतंत्र समाचार पत्र.  यह ऐसा ही है जैसे किसी दूकान के साईन बोर्ड पर लिखा हो कि शुद्ध घी की दूकान. अन्दर भले ही नाम मात्र को शुद्धता न हो. बापूराव पराड़कर को कभी नहीं लिखना पडा . अखबार पढ़कर ही समझ में आ जाता था कि यह कैसा है और क्यों है ? यह सौभाग्य है कि आम आदमी यह सब समझता है, जानता है .

नरेंद्र मोदी से असहमति हो सकती है, प्रजातंत्र में होना भी चाहिए. किन्तु विदेशी “टाईम्स” और “इकोनोमिस्ट” जैसे समाचार पत्र उन्हें वोट ना देने का आव्हान करें, यह तो सीधे सीधे भारत के आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप है. इससे भी अधिक आपत्तिजनक यह है कि जनसत्ता और टाईम्स ऑफ़ इंडिया जैसे समाचार पत्र विदेशी अखबारों को कोट करें. जनसत्ता के सम्पादक से इस विषय में पूछताछ की तो उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी के खिलाफ हम किसी से भी हाथ मिला सकते हैं. ऐसी परिस्थिति में आवश्यक है कि मीडिया तंत्र में एफ़.डी.आई. का प्रवेश ना हो, विचार शुद्ध रहें.

  विशिष्ट अतिथि के रूप में बोलते हुए माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति श्री बृजकिशोर कुठियाला ने कहा कि विगत 100-150 वर्षों में जो दूषित इतिहास लिखा गया उसके कारण अनेक विकृतियाँ पैदा हुई हैं | उन्हीं में से एक है नारद जैसे महान व्यक्तित्व को विदूषक के रूप में प्रस्तुत किया जाना | आज के बाजार आधारित समाज में संवाद भी व्यापार बन गया है | नारद व्यक्ति नहीं संस्था थे जिसका कार्य समाज को संचालित करने वाले वर्गों से संवाद रखना था | उन्होंने किसी कारपोरेट घराने का प्रतिनिधित्व नहीं किया | स्वार्थ, दीनता, व्यक्तिगत लाभ से परे उनका कार्य आज की पत्रकारिता की द्रष्टि से महत्वपूर्ण है | नारद भक्ति सूत्र में उन्होंने बार बार कहा है कि इसकी अभिव्यक्ति नहीं हो सकती | निश्चय ही अभिव्यक्ति की सीमा होती है | किसी मूक से पूछा जाए कि स्वाद कैसा है, पति की ह्त्या के बाद पत्नी से पूछें कि कैसा लग रहा है, कितना बेमानी है इस प्रकार के सवाल ? महाभारत में युधिष्ठिर के साथ संवाद करते हुए उन्होंने जो 125 प्रश्न पूछे हैं, वे सुशासन के सूत्र हैं | नारद के संवाद को आदर्श मानकर मीडिया चले तो समरस समाज की दिशा में सही कदम होगा |

अध्यक्षीय भाषण में श्री अभिलाष खांडेकर ने कहा कि आज भी समाज में पत्रकारिता से आशा जीवित है | स्थिति उतनी बुरी नहीं है, जितनी मान ली गई है | चुनौतियों के बाद भी संपादक नाम की संस्था जीवित है व सामाजिक सरोकारों के प्रति सजग है | श्री खांडेकर ने कहा कि सोशल मीडिया ने प्रिंट मीडिया के भविष्य पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है |

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