इन नतीजों के सबक | स्पंदन फीचर्स
Tuesday , 17 May 2022
समाचार

इन नतीजों के सबक

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आनंद प्रधान 
राजनीतिक रूप से अत्यधिक संवेदनशील उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजों को राजनीतिक दल हमेशा की तरह अपने निकट-दृष्टि चश्मे से देखने और इसकी या उसकी जीत-हार के संदर्भ में समझाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन इन नतीजों का यह संदेश बिल्कुल स्पष्ट है कि मतदाता भ्रष्टाचार और उसके सबसे अश्लील रूप सार्वजनिक संसाधनों की खुली लूट को और बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं हैं। हालांकि चुनावों के दौरान दावे किए गए कि भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं है, पर नतीजों से साफ है कि भ्रष्टाचार न सिर्फ एक बड़ा मुद्दा था, बल्कि मतदाताओं ने भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरी राज्य सरकारों और केंद्र की कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार को भी नहीं बख्शा।
यही कारण है कि चाहे उत्तर प्रदेश में मायावती के नेतृत्व वाली बसपा सरकार हो या फिर गोवा की दिगंबर कामत की कांग्रेस-एनसीपी सरकार या उत्तराखंड की भाजपा सरकार, मतदाताओं ने इन सभी सरकारों झटका दिया है। इनमें से पंजाब में अकाली दल-भाजपा और उत्तराखंड में भाजपा बाल-बाल बच गई तो उन्हें धन्यवाद देना चाहिए कि मतदाताओं के सामने विकल्प के तौर पर खड़ी कांग्रेस को लोग भ्रष्टाचार, कॉरपोरेट लूट, कमरतोड़ महंगाई और नाकारे विपक्ष की भूमिका के कारण स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। लेकिन इसके साथ यह भी उतना ही बड़ा सच है कि मतदाताओं ने इन भ्रष्ट और निजी हितों के लिए सार्वजनिक संसाधनों की लूट में लगी राज्य सरकारों को भी पूरी तरह से माफ नहीं किया।
यह नहीं भूलना चाहिए कि ये चुनाव पिछले साल हुए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की पृष्ठभूमि में हो रहे थे। इस आंदोलन में जिस तरह से बड़े पैमाने पर लोगों की भागीदारी हुई और उनमें बेचैनी दिखाई पड़ी, उसके निशाने पर मुख्य रूप से यूपीए और खासकर कांग्रेस थी। बिला शक, कांग्रेस को उसकी कीमत चुकानी पड़ी है। वह न सिर्फ राजनीतिक रूप से बहुत महत्त्वपूर्ण उत्तर प्रदेश में नकार दी गई, गोवा में उसे सत्ता गंवानी पड़ी, बल्कि पंजाब और उत्तराखंड में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से घिरी भाजपा सरकारों के खिलाफ माहौल होने के बावजूद कांग्रेस उसे भुनाने में नाकाम रही। इससे एक बार फिर यह साफ हो गया कि सांप्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई को कांग्रेस के भरोसे छोड़ना खतरे से खाली नहीं है।
इससे निश्चय ही राष्ट्रीय स्तर पर यूपीए के बरक्स एक नए धर्मनिरपेक्ष मोर्चे के लिए जगह बनने लगी है। कांग्रेस के लिए यह खतरे की घंटी है। यही नहीं, एक मायने में मतदाताओं ने खासकर उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यक, अति पिछड़ा और अति दलित वोटों के लिए कांग्रेस की चुनावों से ठीक पहले की अवसरवादी कोशिशों को भी नकार दिया है। कांग्रेस युवा मतदाताओं की बात कर रही थी, लेकिन राहुल गांधी के तेज-तर्रार प्रचार अभियान में न तो कोई नई दृष्टि थी और न ही वह साख और भरोसा कि वह मतदाताओं को उत्साहित और प्रेरित कर पता।
सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इन विधानसभा चुनावों में लोगों के उत्साह और मतदान में बढ़ोतरी के बावजूद उनके पास चुनने के लिए कोई वास्तविक विकल्प नहीं था। इन राज्यों में सत्ता की दावेदार सभी प्रमुख पार्टियों को लोगों ने कई बार आजमाया है। पर नतीजा वही ढाक के तीन पात रहा। चाहे वह भ्रष्टाचार का मुद्दा हो या सार्वजनिक संसाधनों की लूट का या सत्ता का इस्तेमाल परिवार और उसके इर्दगिर्द जमा अफसरों-ठेकेदारों-दलालों के निजी हितों को आगे बढ़ाने का या फिर लोगों की उम्मीदों और आकांक्षाओं के साथ खिलवाड़ का, हर नई सरकार ने पिछली सरकारों के रिकार्ड तोड़ दिए।
आश्चर्य की बात नहीं है कि बिना किसी अपवाद के हर राज्य में पांच सालों में मंत्रियों-विधायकों की संपत्ति में न्यूनतम दस से लेकर सौ गुने तक की बढ़ोतरी हुई है। यही नहीं, इन राज्यों में सभी प्रमुख पार्टियों के उम्मीदवारों में ऐसे उम्मीदवारों की संख्या बढ़ती गई है जो पहले से करोड़पति हैं। इसके अलावा, सभी प्रमुख पार्टियों के उम्मीदवारों ने इन चुनावों में पैसा पानी की तरह बहाया। जीतने वाले उम्मीदवारों में शायद ही कोई ऐसा होगा जिसने औसतन एक से दो करोड़ रुपए खर्च न किए हों। यह सचमुच चिंता की बात है कि चुनाव जिस तरह से ज्यादा से ज्यादा महंगे होते जा रहे हैं, चुनावों से बुनियादी बदलाव की संभावनाएं सिमटती जा रही हैं।
इन विधानसभा चुनावों में सबसे महत्त्वपूर्ण चुनाव उत्तर प्रदेश के थे। यहां जिस तरह से मतदाताओं ने मायावती के नेतृत्व वाली बसपा सरकार को खारिज कर दिया और समाजवादी पार्टी को स्पष्ट बहुमत दिया है, उससे साफ है कि उत्तर प्रदेश में राजनीति का मुहावरा बदल रहा है। इसमें बदलाव और लोगों की बढ़ी हुई आकांक्षाओं को महसूस किया जा सकता है। वैसे बदलाव की यह लहर उत्तर प्रदेश के जड़ समझे जाने वाले समाज में पिछले कई वर्षों से चल रही है। इस सामाजिक उथल-पुथल की सबसे खास बात यह है कि इसमें सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता और दलित दावेदारी की राजनीति ने भी उल्लेखनीय भूमिका निभाई है।
लेकिन उत्तर प्रदेश का समाज और राजनीति इस बदलाव से भी आगे जाने की राह बनाने की कशमकश में हैं। इसके केंद्र में लोगों की बढ़ी हुई आकांक्षाएं हैं, जिनमें सामाजिक सम्मान के साथ एक बेहतर जीवन की अपेक्षा है और अवसरों में हिस्से से ज्यादा अवसर बढ़ाने की मांग है। यही नहीं,   इसमें सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता के नारों-दावों के बीच पीछे छूट गए वे तबके हैं जिन्हें न सत्ता में भागीदारी मिली न सामाजिक न्याय का फायदा। इनमें वे युवा और महिलाएं हैं जो उत्तर प्रदेश की दमघोंटू राजनीति और समाज के बंधनों को तोड़ने के लिए बेचैन हैं।

इस बेचैनी में गरिमापूर्ण रोजगार, अच्छी लेकिन सस्ती शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधा, गुंडों-माफियाओं से मुक्ति और कानून का शासन, भ्रष्टाचार पर अंकुश और बेहतर सड़कें, बिजली और पीने का साफ पानी जैसे सवाल हैं। इन चुनावों खासकर उत्तर प्रदेश के नतीजों में बदलाव की यह बेचैनी साफ देखी जा सकती है। उत्तर प्रदेश में बदलाव की आहटों में से कुछ की पहचान और चर्चा जरूरी है। पहली बात तो यह है कि लंबे अरसे बाद इस राज्य में मतदान का प्रतिशत लगभग साठ फीसद तक पहुंच गया। यह पिछली बार की तुलना में दस से चौदह फीसद तक अधिक है।
इससे लोगों के उत्साह का पता चलता है जो बिना उम्मीद के संभव नहीं है। सबसे खास बात यह है कि इस बार मतदान में युवा और महिला मतदाता भी अच्छी-खासी संख्या में दिखे। यह अपने आप में एक बडेÞ बदलाव की ओर इशारा कर रहा है। निश्चय ही, जो मतदाता इतने उत्साह से वोट डालने निकले, उनकी अपेक्षाओं को नजरअंदाज करना या उन्हें वापस संकीर्ण जातिवादी, धार्मिक पहचानों के दायरों में बंद करना मुश्किल होगा।
दूसरी उल्लेखनीय बात यह है कि सत्ता की दावेदार पार्टियों पर नीचे हो रहे बदलाव का ऐसा दबाव पड़ा है कि उन्हें खुद भी बदलना पड़ा है। अस्मिता की राजनीति करने वाली दोनों प्रमुख पार्टियों को जातियों के दायरे से बाहर निकल कर कंप्यूटर-लैपटॉप, गन्ने की कीमतों, कानून-व्यवस्था, सड़क-बिजली-पानी आदि की बात करनी पड़ी, जबकि दोनों राष्ट्रीय पार्टियों को नवउदारवादी आर्थिक विकास के दावों के बजाय रोजगार, अति पिछड़ों, अति दलितों और अल्पसंख्यकों (मुसलमानों) को आरक्षण और कोटे के अंदर कोटे की बात करनी पड़ी। ऐसा लगता है कि कांग्रेस और भाजपा उत्तर प्रदेश में मतदाताओं के बदलते मिजाज को भांप नहीं पार्इं। जब मतदाता संकीर्ण अस्मिताओं की राजनीति से बाहर निकलने का रुझान और अपनी आकांक्षाएं अभिव्यक्तकर रहे थे, ये दोनों राष्ट्रीय पार्टियां उन्हें फिर उन्हीं संकीर्ण दायरों में खींचने की कोशिश कर रही थीं।
इन चुनावों में तीसरा बदलाव यह दिखा कि मुसलिम मतदाता अब किसी के वोट बैंक के रूप में व्यवहार नहीं कर रहा है, बल्कि अन्य जातियों-समुदायों की तरह ही अपने मुद्दों, जरूरतों, आकांक्षाओं और अपेक्षाओं को ध्यान में रख कर वोट दे रहा है। यही नहीं, वह न तो केवल सांप्रदायिक ताकतों खासकर भाजपा को हराने की मजबूरी में किसी पार्टी या उम्मीदवार को वोट दे रहा है और न ही किसी चार फीसद आरक्षण के अवसरवादी चुनावी वायदे पर मोहित है। इसके उलट रोजी-रोटी, बिजली-सड़क-पानी और कानून-व्यवस्था के साथ-साथ समावेशी विकास के लिए वोट दे रहा है। वह प्रयोग कर रहा है और अपने लिए विकल्प तलाश रहा है। इस तलाश में उसके सवाल उत्तर प्रदेश की बाकी गरीब जनता से अलग नहीं हैं।
निश्चय ही, उसके लिए सुरक्षा का सवाल आज भी सबसे महत्त्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ वह एक बेहतर और गरिमापूर्ण जीवन के सवाल को और टालना नहीं चाहता है। इसलिए उसके वोट के स्थायित्व के बारे में अब किसी को भ्रम में नहीं रहना चाहिए। चौथी उल्लेखनीय बात यह है कि उत्तर प्रदेश में सीमित राजनीतिक विकल्पों के बावजूद लोगों ने अपने तरीके से राजनीतिक दलों को सबक सिखाया है। सबक नंबर एक, मतदाताओं को भ्रष्टाचार और राजनीतिक अहंकार बर्दाश्त नहीं है। आश्चर्य नहीं कि बसपा और कांग्रेस दोनों को तगड़ा झटका लगा है। मतदाता राज्य में बढ़ते भ्रष्टाचार के लिए बसपा को और केंद्र में कांग्रेस को जिम्मेवार मान रहा है।
सबक नंबर दो, लोग बसपा के भ्रष्ट और आम गरीब की पहुंच से बाहर सरकार की जगह सपा को हिचकते हुए एक मौका देने के मूड में दिख रहे हैं, लेकिन वे उसके भ्रष्ट-गुंडाराज को भूले नहीं हैं। सपा को इस मौके को लोगों की मजबूरी मानने की भूल नहीं करनी चाहिए। तीसरा सबक कांग्रेस और ‘युवराज’ राहुल गांधी के लिए है, जो नई आकांक्षाओं की राजनीति साठ और सत्तर के दशक के पिट चुके टोटकों और नब्बे के दशक के संकीर्ण सामाजिक समीकरणों से करना चाहते हैं जिनके दिन कबके बीत गए। कांग्रेस के रणनीतिकार भूल गए कि इस बीच लोग राजनीतिक रूप से और समझदार, सचेत और मुखर हो गए हैं।
चौथा सबक भाजपा के लिए है, जो इन चुनावों में और ज्यादा बेपरदा हो गई है। उसकी राजनीति बदलते हुए उत्तर प्रदेश और उसके मतदाताओं के मन को पढ़ने-समझने में पूरी तरह नाकाम साबित हुई। कहने का आशय यह कि उत्तर प्रदेश के मतदाताओं ने राज्य में एक नई प्रगतिशील, जनतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और न्यायपूर्ण राजनीति के लिए मौका बनाया है। इस राजनीति के मुहावरा और प्रतीक अस्सी और नब्बे के दशक की राजनीति के मुहावरों और प्रतीकों से अलग होने चाहिए।
साभारः जनसत्ता

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