Thursday , 6 August 2020
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कबाड़ से जुगाड़ |

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कबाड़ को हम दो पैसे की भी चीज न मानकर उसके बारे में सोचना बंद कर देते हैं. लेकिन पश्चिमी राजस्थान में जोधपुर शहर के कुछ ऐसे युवा व्यवसायी हैं जो रात-दिन कबाड़ के बारे में ही सोचते रहते हैं. तीन साल पहले तक शहर में जिसकी कोई कद्र ही न थी, वही कबाड़ आज करोड़पति बनने का मूल मंत्र बन गया है.

यकीन न हो तो जोधपुर के प्रीति इंटरनेशनल के मालिक रितेश लोहिया (39) और सहकर्मी पत्नी प्रीति (37) से पूछिए. लोहिया दंपती को कबाड़ इतना रास आ गया कि अब वे निर्यात के अपने मूल व्यवसाय फर्नीचर हैंडीक्राफ्ट पर ध्यान भी नहीं दे रहे. वे हर वक्त कबाड़ के जुगाड़ में लगे रहते हैं. इसकी ठोस वजह है. उनकी फर्म का व्यवसाय जो 2009 से पहले 16 करोड़ रु. सालाना का था, अब कबाड़ के बूते 35 करोड़ रु. तक पहुंच गया है.

कबाड़ का यह जुगाड़ आखिर है क्या? इसकी शुरुआत असल में होती है 2009 से. उस दौर की व्यावसायिक मंदी की मार सभी छोटे-बड़े व्यवसायियों पर पड़ी. फर्नीचर हैंडीक्राफ्ट्स का निर्यात करने वाली प्रीति इंटरनेशनल उससे अछूती न रही. उन्हीं बुरे दिनों में लोहिया दंपती के पास एक दिन डेनमार्क से उनका एक ग्राहक आया. वह गोदाम में फर्नीचर देख रहा था कि उसकी नजर एक टिन पर पड़ी जिस पर किसी मजदूर ने गलती से कपड़े से बनी गद्दी रख दी और वह एंटीक कुर्सी दिखने लगी.

ग्राहक को वह आइडिया इतना भाया कि उसने लोहिया को बेकार चीजों से ऐसे ही उत्पाद बनाने की राय दे डाली. मंदी की मार में खामोश बैठे लोहिया दंपती का भी दिमाग दौड़ने लगा. टिन का कबाड़ बटोरा गया और हजारों की संख्या में जुगाड़ से बने स्टूल विदेश भेजे जाने लगे. अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया की मांग तो पूरी भी नहीं हो रही.Kabad

घी या तेल के डिब्बों पर न कोई पेंट, न रंगरोगन. कपड़े की गद्दी बनाई और उस पर चिपका दी. ऐसी एंटीक गद्दियां बनीं कि उनकी सप्लाई कर पाना मुश्किल हो गया. रितेश की सुनिए जरा, ”यह आइटम इतना चल रहा है कि टिन का जो डिब्बा कबाड़ी 30 रु. में भी नहीं खरीद रहे थे, आज 100 रु. में भी हमें नहीं दे रहे हैं.” यानी कबाड़ी भी मालामाल हो रहे हैं.

लोहिया अब स्टूल के अलावा सोफा, कुर्सियां, बार कुर्सी/टेबल, आलमारी, दरी, कारपेट, बेडशीट, तकिए जैसे तमाम घरेलू उत्पाद विदेश भेज रहे हैं. लोहे, लकड़ी और जूट से बनी ये चीजें रितेश अपनी बोरानाडा स्थित यूनिट में तैयार करते हैं. जोधपुर के पास बासनी में उन्होंने अपनी एक और यूनिट लगा दी है, जहां टेक्सटाइल संबंधित उत्पाद बनते हैं. इनकी डिजाइन प्रीति तैयार करती हैं. इस फर्म को हाल ही में कोरिया से 2,000 दरियों का ऑर्डर मिला है.

कबाड़ के इन सजीले उत्पादों ने जोधपुर के हैंडीक्राफ्ट्स निर्यातकों के धंधे में जान फूंक दी है. दो साल पहले इस धंधे में उतरे फॉरच्युन एक्सपोर्ट के सिद्धार्थ मेहता (35) की मानें तो विदेशियों की पसंद के चलते नए उत्पादों को भी पुराना करके बेचना पड़ रहा है. उनके गोदाम में तैयार हो रही एक नई रैक पर मजदूर स्क्रैच करते दिखे.

मेहता स्पष्ट करते हैं, ”कभी कबाड़ वाली चीजें नहीं मिलतीं तो नए सामान को ही कबाड़ की शक्ल देनी पड़ती है क्योंकि वे तैयार होते ही बिक जाते हैं.” धीमी शुरुआत के बाद अब छा जाने की तैयारी में लगे मेहता पुरानी चीजों से बने उत्पादों के यही कोई 20 कंटेनर हर महीने अमेरिका, यूरोप और ऑस्टेलिया भेजते हैं. कबाड़ से जुगाड़ के बाद मेहता का करोबार 16 से 20 करोड़ रु. सालाना पहुंच गया है.Kabad

अब मुनाफे का गणित देखिए. रितेश को दरियों के ऑर्डर को पूरा करने के लिए सेना के टेंट और दूसरे कपड़े नीलामी के दौरान खरीदने पड़े. मजदूरों से उन कपड़ों की कतरनें बनवाई गईं. माल और मजदूरी के बाद एक दरी पर खर्च आया 500 रु., जो कोरिया में 2,000 रु. में बिकेगी. रितेश की फर्म ऐसे सामान के हर महीने 35 कंटेनर उत्पाद अमेरिका, यूरोप, सिंगापुर, कोरिया, जर्मनी जैसे दसेक देशों में भेजती है. ऐसे हर उत्पाद पर एक टैग लगा होता है, जिस पर उत्पाद के निर्माण की पद्धति की पूरी जानकारी होती है. माल कबाड़ का और ईमानदारी भी पूरी.

जोधपुर के एक दर्जन युवा व्यवसायी जब एक ही धंधे में कूदे हों तो प्रतिस्पर्धा तो होगी ही. ऐसे में सबको अपने उत्पाद को किसी-न-किसी तरह से कुछ खास बनाना पड़ता है. मेहता का दावा है कि ”अंतरराष्ट्रीय मानकों वाला और इको फ्रेंडली होना मेरे सामान की खासियत है.” उनके यहां तरह-तरह के कपड़ों के जोड़ से सोफे बनते हैं. एंटीक दिखने वाले इन सोफों की खासी मांग है. मेहता कपड़े का कबाड़ गुजरात से खरीदते हैं और लोहे का पूरे प्रदेश भर से.

इस व्यवसाय का एक पहलू यह भी है कि इसमें सारा काम मशीन की बजाए हाथ से ही होता है. इस वजह से लागत भले थोड़ी ज्‍यादा लगती हो पर रोजगार के भी रास्ते खुले हैं. कबाड़ से उम्दा उत्पाद बनाने वाली एक और फर्म द होम के मनीष बंसल (35) कहते हैं, ”मशीनों का इसमें दूर-दूर तक कोई काम नहीं.”

बंसल भी 2009 में इस धंधे में कूदे और इन उत्पादों ने उनके कारोबार को 2 करोड़ रु. सालाना से बढ़ाकर 4 करोड़ रु. पर पहुंचा दिया. बंसल कपड़े में पैचवर्क का खास तरह का आइटम तैयार कर रहे हैं. उन्होंने उत्तर प्रदेश और गुजरात के कबाड़ियों से पुराना कपड़ा खरीदा. कपड़े का काम लायक हिस्सा निकालकर बाकी टुकड़ों को जोड़ उस बड़े कपड़े पर मजदूरों से इंब्राइडरी और जरी का काम करवाया. बारीक कारीगरी वाले इस कपड़े से बेडशीट, तकिए, तस्वीर और कैनवस जैसे उत्पाद बनाए गए. गौरतलब है कि बाड़मेर का चौहटन गांव पूरी तरह से पैचवर्क के काम से जुड़ा है. यहां हर घर में एक, दो या फिर पूरा परिवार पैचवर्क का काम कर रहा है. अकेले पैचवर्क से 500-700 लोगों को काम मिल रहा है.

एक अन्य फर्म द होम डिजाइनर एसेसरीज के अजय शर्मा ने पुरानी जींस के कपड़े के बने उत्पाद क्या उतारे, उनसे तो पूर्ति भी नहीं हो पा रही. बिल्कुल नया आइडिया था यह. शर्मा का व्यवसाय 30 लाख रु. से बढ़कर 3 करोड़ रु. सालाना जा पहुंचा. वे भी 2009 में मंदी में ही इस धंधे में उतरे थे. उनका सिद्धांत थाः बनाओ कुछ भी पर वह कुछ अलग दिखना चाहिए. बस इसी से शर्मा मालामाल हो गए. हर महीने वे करीब 10 कंटेनर माल अमेरिका और यूरोप भेजते हैं. शर्मा की फर्म के मैनेजर एम. उस्मानी की सुनिएः ”नए आइटम तैयार करने को हम दिमाग दौड़ाते रहते हैं.”

इस्तेमाल हो चुकी चीजों से बने सामान के भविष्य को उज्‍द्गवल बताते हुए प्रीति भी नई सोच के पहलू को ही रेखांकित करती हैं. उनके शब्दों में, ”हमें क्रिएटिव, नए किस्म के और अलग आइटम तैयार करने होंगे.” ऐसा सामान जो सजावटी कम और घरेलू उपयोग के लिए ज्‍यादा हो. मेहता भी यहां लोहिया दंपती की बात का समर्थन करते हैं, ”घरेलू उपयोग वाले उत्पादों की मांग ज्‍यादा रहती है.” फॉरच्युन एक्सपोर्ट आलमारी, टेबल, कुर्सी, सोफा, कारपेट जैसे कई उत्पाद नए तरीके से ईजाद कर रहा है.

‘वेस्ट (बेकार) इज द बेस्ट’, जोधपुर के इन युवा व्यवसासियों का यही मूलमंत्र है. इन्होंने  मंदी के दौर में कुछ नया किया और इतने सफल हुए कि उन्होंने अपने मूल व्यवसाय को अलग छोड़ दिया. उनका यह कदम ग्लोबल वार्मिंग की दिशा में तो सही रहा ही, इससे श्रमिकों, कारीगरों के लिए भी नए अवसर पैदा हो गए. आज 2,000 मजदूर इससे गुजारा कर रहे हैं.

कबाड़ की चीजों से करोड़पति बने जोधपुर के व्यवसायियों ने राजस्थान ही नहीं, देश के अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी धाक जमाई है. बात तो नई सोच की है.

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