जेपीसी अपनी सार्थकता सिद्ध करे | स्पंदन फीचर्स
Tuesday , 17 May 2022
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जेपीसी अपनी सार्थकता सिद्ध करे

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सिद्धार्थ शंकर गौतम
आखिरकार केंद्र सरकार संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी के गठन पर राजी हो गई है। किसी विशिष्ट उद्देश्य के लिए संसद द्वारा गठित की जाने वाली जेपीसी देश की सबसे ताकतवर जांच समिति होती है। इस समिति का अध्यक्ष सत्तापक्ष का होता है जबकि संसद के दोनों सदनों में राजनीतिक दलों की आनुपातिक भागीदारी के अनुसार इसके सदस्य बनाए जाते हैं। इस जांच समिति की प्रमुख ताकत होती है कि यह खुफिया एजेंसियों, नौकरशाहों, मंत्रियों, राजनीतिज्ञों ,यहां तक कि प्रधानमंत्री को भी अपने समक्ष हाजिर होने का समन भेज सकती है। पिछले साल संसद का शीतकालीन सत्र  (नौ नवंबर से 14 दिसंबर 2010) तक इसी जेपीसी की मांग की भेंट चढ गया था। टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच पीएसी की बजाय जेपीसी से कराने के मुद्दे पर सत्तापक्ष व विपक्ष, दोनों ही अपने-अपने हितों को लेकर अड गए थे।

पूरे सत्र के दौरान एक महीने से अधिक चले हंगामे की भेंट चढी संसद की कार्यवाही का मौद्रिक मूल्य 172 करोड रुपए था। इस सत्र के दौरान कुल 23 बैठकों में 138 घंटे संसदीय कामकाज के लिए तय किए गए थे, जबकि सात घंटे 37 मिनट ही लोकसभा में कामकाज हुआ। जहां 36 बिल पेश किए जाने थे, वहां 13 ही पेश हो पाए। 35 बिलों को पारित होना था मगर चार ही पारित हो पाए। हाल के दिनों में जनता के धन का इससे बडा दुरुपयोग नहीं देखा गया। जिन जनप्रतिनिधियों को जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिए था, वे जेपीसी गठन की चिंता मात्र से स्वयं की राजनीति को चमकाने का उपक्रम कर रहे थे। जेपीसी गठन के मुद्दे पर देश की जनता तथा मीडिया में जो आक्रोशित प्रतिक्रिया हुई शायद सरकार उसे समझ चुकी थी तभी तो वह जेपीसी के गठन के लिए राजी हुई। वैसे यह कोई पहला मौका नहीं है जब जेपीसी के गठन के लिए विपक्ष को संसद की कार्यवाही स्थगित करनी पडी हो।

इससे पहले भी चार बार जेपीसी का गठन विभिन्न घोटालों की जांच के लिए हो चुका है जिनमें संसद की कार्यवाही स्थगित करनी पडी थी। पहली बार 1986 में बोफोर्स घोटाले के मुद्दे पर विपक्ष द्वारा जेपीसी गठन पर 45 दिनों तक संसद का कामकाज ठप रहा था। हालांकि, बाद में जेपीसी का गठन तो हुआ पर घोटाले का जिन्न आज भी जब-तब प्रकट होता रहता है। दूसरी बार वर्ष 1993 में हर्षद मेहता द्वारा अंजाम दिए गए शेयर बाजार के घोटाले पर 17 दिनों तक संसद में हंगामा मचा था। इस मामले में जेपीसी का गठन हुआ। गठित जेपीसी ने तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह समेत करीब एक हजार लोगों से पूछताछ की लेकिन नतीजा कुछ भी नहीं निकला। तीसरी बार शेयर ब्रोकर केतन पारिख द्वारा यूटीआई शेयर कीमतों में हेरा-फेरी से किए गए घोटाले में जेपीसी के गठन की मांग को लेकर 14 दिनों तक संसदीय कामकाज बाधित रहा था।

इस मामले की तह तक जाने के लिए जेपीसी गठित हुई थी। फिर वर्ष 2003 में सॉफ्ट ड्रिंक्स में कीटनाशकों की मिलावट के आरोपों की जांच के लिए चौथी बार जेपीसी गठित हुई। इन मामलों का नतीजा भी कुछ नहीं निकला। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या जेपीसी गठित होने भर से किसी घोटाले की तह तक पहुंचा जा सकता है? इतिहास तो इसकी गवाही नहीं देता। अभी तक हुई जेपीसी जांचों में निष्कर्ष या नतीजे संदेहास्पद ही रहे हैं। फिर भी विपक्ष हमेशा सरकार पर जेपीसी के गठन का दबाव डालता रहा है। अब इसमें विपक्ष को कितना फायदा होता है, यह तो वही जाने, लेकिन नुकसान में हमेशा आम नागरिक ही रहता है। संसद की कार्यवाही ठप होने से देश का करोडों रुपया तो बर्बाद होता ही है, जनहित के मुद्दों पर चर्चा भी नहीं हो पाती है।

खैर जब टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच के लिए जेपीसी के गठन की मांग सरकार ने मान ही ली है तो उम्मीद है कि इस बार जेपीसी इतिहास को झुठलाते हुए पूरी पारदर्शिता से अपना काम करेगी और देश को  1.76 लाख करोड रुपए का चूना लगाने वाले टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले के असली गुनाहगारों को देश के समक्ष पेश करेगी। अगर ऐसा हो पाया तो यह जेपीसी के गठन की सार्थकता सिद्ध करेगा। वरना तो जैसा होता रहा है वैसा ही इस बार भी होगा।

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