Monday , 28 September 2020
समाचार

परमाणु खतरे की घंटी

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जापान के समक्ष उत्पन्न हुए परमाणु विकिरण के खतरे से भारत को सबक लेने की सलाह दे रहे हैं ब्रह्मा चेलानी
प्रधानमंत्री ने जिस राष्ट्रीय सहमति का वायदा किया था उसके बिना ही विवादित भारत-अमेरिकी परमाणु करार संपन्न कर दिया गया। अब जापान में श्रृंखलाबद्ध रिएक्टर विस्फोटों से भारत में बिना प्रतिस्पर्धी निविदा के ही परमाणु रिएक्टर आयात करने के गोरखधंधे पर फिर से बहस छिड़ेगी। इस प्रकार के अरबों डॉलर के आयात में बड़ा घोटाला हो रहा है और इसकी सुरक्षा को लेकर गंभीर नतीजे भुगतने पड़ सकते हैं। जैतापुर में 9900 मेगावाट परमाणु उत्पादन क्षमता के संयंत्र की स्थापना का ही मामला लें। इस परियोजना के लिए न केवल जल्दबाजी में पर्यावरण मंजूरी दी गई, बल्कि जमीन के अधिग्रहण में भी जोरजबरदस्ती की जा रही है। यह परियोजना फ्रांस की कंपनी एरेवा स्थापित कर रही है। इसमें छह ऐसे रिएक्टर लगाए जाएंगे, जिनके डिजाइन का अब तक परीक्षण ही नहीं हुआ है। आइए परमाणु ऊर्जा पर और प्रकाश डालें। हालांकि परमाणु शक्ति से आधी सदी से ऊर्जा उत्पादन हो रहा है, फिर भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इससे उत्पादित ऊर्जा बेहद महंगी पड़ती है। इसके लिए सरकार को खुले दिल से अनुदान देना पड़ता है। जापान के फुकुशिमा के तीन रिएक्टरों में विस्फोट और अन्य की खतरनाक हालत से स्पष्ट हो जाता है कि परमाणु ऊर्जा भी सुरक्षित नहीं है, चाहे खतरा टालने के समुचित उपाय भी क्यों न किए गए हों। फुकुशिमा के कारण लंबे समय से मंदी की मार झेलने के बाद अब उबरते हुए परमाणु उद्योग का वैश्विक आकर्षण खत्म होता नजर आ रहा है। वास्तव में, फुकुशिमा ने भारत द्वारा परमाणु रिएक्टरों के आयात के अंधे सौदों और चार विदेशी कंपनियों के लिए जबरन भूमि अधिग्रहण पर बहस को फिर से जिंदा कर दिया है। इन कंपनियों को अलग से परमाणु पार्क आवंटित किए गए हैं, वह भी बिना किसी निविदा प्रक्रिया के। परमाणु करार से आयात के सौदों का जो रास्ता खुला है उससे फ्रांस, रूस और अमेरिका को मुख्य रूप से लाभ होगा और इन अपारदर्शी सौदों से भ्रष्ट राजनेताओं को घूस में मोटी रकम मिलेगी। भापाल गैस त्रासदी पर भारत सरकार के लचर रवैये को देखते हुए फुकुशिमा एक चेतावनी बनकर सामने आया है कि अगर सुरक्षा पर घूसखोरी को वरीयता दी जाएगी तो देश बड़े खतरे में पड़ जाएगा। विदेशी कंपनियों के साथ अरबों डॉलर के ऐसे सौदे जिनमें पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धी निविदा प्रक्रिया का अभाव है, देश की चिंताएं बढ़ा रहे हैं। जिस अजीबोगरीब और संदेहास्पद तरीके से पहले इन कंपनियों को परमाणु पार्क आवंटित किए गए और बाद में कीमत पर विचार-विमर्श किया गया उससे लगता है कि इसमें 2जी स्पेक्ट्रम से भी बड़े घोटाले को अंजाम दिया जा रहा है। इस आलोक में क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि आयातित रिएक्टरों की प्रति मेगावाट क्षमता का मूल्य 17 लाख डॉलर तय किया जा रहा है, जो देशी रिएक्टरों की तुलना में दोगुना है। इससे भी बदतर यह है कि विशेष कानून द्वारा हादसे की स्थिति में विदेशी कंपनियों का दायित्व सीमित कर दिया गया है। यही नहीं, उन्हें बाजार की दर पर बिजली उत्पादन से मुक्त भी कर दिया गया है। इन रिएक्टरों को सरकारी कंपनी न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लि. (एनपीसीआइएल) द्वारा चलाया जाएगा और इनसे उत्पादित ऊर्जा को बाजार दर पर बनाए रखने के लिए सरकार करदाताओं की गाढ़ी कमाई से इस महंगी बिजली को भारी-भरकम अनुदान देगी। गलती न करें-इसमें पूरा-पूरा खतरा है कि 150 अरब डॉलर यानी करीब सात लाख करोड़ रुपये की अकल्पनीय रकम के संभावित आयात सौदों वाली यह परियोजना रुपये बनाने वाली सबसे बड़ी योजना बन सकती है। आखिरकार, नीतिगत बदलावों के साथ हो रहे इन अनुबंधों की प्रकृति भारी भ्रष्टाचार का इंजन बन सकती है। इन सौदों के कारणे निर्यात पर निर्भर एशिया की प्रमुख शक्तियों में भारत एकमात्र अपवाद बन गया है। समुद्र तट पर स्थापित परमाणु रिएक्टर जो खतरा झेल रहे हैं वह 2004 में हिंद महासागर में आई सुनामी से जाहिर हो गया था। तब भारत के दूसरे सबसे बड़े परमाणु रिएक्टर मद्रास एटॉमिक पावर स्टेशन के रिएक्टर बंद करने पड़े थे। सुनामी के वक्त इस संयत्र का एक रिएक्टर पहले ही बंद था। दूसरे रिएक्टर को इसलिए सुरक्षित तरीके से बंद किया जा सका था, क्योंकि विद्युत संयंत्र को रिएक्टरों से ऊंचे स्थान पर स्थापित किया गया था, किंतु फुकुशिमा के विपरीत भारतीय संयंत्र ने सुनामी का सीधा झटका नहीं झेला था। फुकुशिमा रिएक्टरों ने 9 रिक्टर स्केल के भूकंप के कारण उठी ऊंची लहरों की टक्कर झेली थी, जिससे उनकी आपात शीतप्रणाली ठप हो गई थी। भारत के परमाणु संयंत्र समुद्र किनारे स्थापित हैं और विदेशी कंपनियों के नए परमाणु पार्को की भौगोलिक स्थिति भी यही है। तमाम विदेशी परमाणु संयंत्र हल्के पानी के रिएक्टर (एलडब्ल्यूआर) हैं, जिनके संचालन में देशी प्रेसराज्ड हैवी वाटर रिएक्टर (पीएचडब्ल्यूआर) संयंत्रों की तुलना में कहीं अधिक मात्रा में पानी की आवश्यकता पड़ती है। इसलिए पानी की किल्लत वाले भारत में एलडब्ल्यूआर रिएक्टरों की स्थापना समझदारी से भरा कदम नहीं है। सागर किनारे स्थित रिएक्टर प्राकृतिक आपदा को झेलने में अधिक जोखिम भरे हैं। हरिकेन और सुनामी जैसे तूफानों से इन्हें अधिक नुकसान पहुंचता है और क्लाइमेट चेंज के इस दौर में समुद्र का स्तर बढ़ने से इन रिएक्टरों के भविष्य में समुद्र में समाने की आशंका बढ़ जाएगी। समुद्र किनारे परमाणु रिएक्टर स्थापित करने से बड़े पैमाने पर स्थानीय समुदायों का विस्थापन होता है। लंबे-चौड़े समुद्रीतट के बावजूद भारत में एलडब्ल्यूआर के लिए कोई उपयुक्त खाली समुद्री स्थल नहीं है। इसके अलावा, फुकुशिमा त्रासदी के बाद स्थानीय लोग और पर्यावरणविद जैतापुर, हरिपुर, मीठी विर्दी और अन्य स्थानों पर परमाणु संयंत्रों की स्थापना के खिलाफ संघर्ष शुरू कर देंगे। विदेशों से आयातित ईंधन पर आधारित रिएक्टरों के बल पर ऊर्जा सुरक्षा की योजना पैसे की बर्बादी के अलावा कुछ नहीं है। यही नहीं, बाहरी दबाव के कारण ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय हित भी खतरे में पड़ जाएंगे। भारत के अपने फुकुशिमाओं की प्रेतछाया इसलिए और भी स्याह हो जाएगी कि जिन चार अलग-अलग एलडब्ल्यूआर प्रौद्योगिकी वाले रिएक्टरों की स्थापना की योजना है, उनमें ऐसे रिएक्टर भी शामिल हैं, जिनका परीक्षण ही नहीं हुआ है। आज देश को परमाणु पारदर्शिता और खुली बहस की जरूरत है, किंतु इस जरूरत पर भ्रष्टाचार और कॉरपोरेट परमाणु लॉबी का उभार भारी पड़ रहे हैं। (लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)

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