Friday , 28 January 2022
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विकास की बात विज्ञान के साथ, विज्ञान की बात सबके साथ

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विज्ञान के क्षेत्र में बहुत कुछ हुआ है, लेकिन अभी बहुत कुछ करना बाकि है। विज्ञान जब तक खास लोगों का विषय बना रहेगा तब तक इसका पूरा-पूरा उपयोग नहीं किया जा सकता। विज्ञान को विकास से जोड़ना होगा। मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद् के महानिदेशक प्रो. प्रमोद कुमार वर्मा इसी कवायद में लगे हैं कि विज्ञान को जन-जन तक कैसे ले जाया जाए। कैसे इसे खास से आम बनाया जाए। प्रदेश की नीति, योजना और क्रियान्वयन तीनों स्तरों पर कैसे विज्ञान को समाहित किया जाए। प्रो. वर्मा विज्ञान के द्वारा विकास को सर्वसुलभ बनाना चाहते हैंं। प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह चैहान ने मध्यप्रदेश बनाओ का नारा दिया है, स्वर्णिम मध्यप्रदेश के निर्माण में विज्ञान की भूमिका के सिलसिले में स्पंदन फीचर्स से प्रो. वर्मा का साक्षात्कार –

सवाल : प्रदेश के विकास में विज्ञान की क्या भूमिका होगी?
प्रो. प्रमोद के. वर्मा – मध्यप्रदेश में विकास को लेकर बहुविध प्रयास हो रहे हैं। लेकिन अभी भी एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो विकासमूलक कार्यक्रमों से लाभान्वित होने से वंचित है। विकास की सुगंध उन तक अभी भी नहीं पहुच पाई है। विज्ञान और उचित प्रौद्योगिकी की मदद से विकास का लाभ वंचित और सुदूरवर्ती क्षेत्र के लोगों तक भी पहुंचाया जा सकता है। राज्य द्वारा संचालित और कल्याणकारी योजनाओं और कार्यक्रमों के न सिर्फ निर्माण में बल्कि उसके क्रियान्वयन और मूल्यांकन में भी विज्ञान की अहम भूमिका हो सकती है।

सवाल : विज्ञान एक गंभीर और जटिल विषय है, इसे एक खास वर्ग का विषय समझा जाता है। प्रदेश के गरीब, पिछड़े, वनवासी और किसान के लिए विज्ञान कैसे उपयोगी हो सकता है?
प्रो. प्रमोद के. वर्मा – विज्ञान के बारे में अनेक भ्रांतियां है। इनमें से एक बड़ी भ्रांति यह भी है कि विज्ञान सिर्फ वैज्ञानिकों के लिए है, या विज्ञान सिर्फ एक खास वर्ग के लिए है। विज्ञान एक दृष्टिकोण है। यह सबके पास है। जो भी चाहे इस दृष्टिकोण को अपना सकता है। हमारी कोशिश है कि लोगों में वैज्ञानिक मनोवृत्ति का विकास हो। हमारे घर-परिवार के बड़े-बुजुर्ग भले ही पढ़े-लिखे या साक्षर न हों, लेकिन वे विज्ञान को जानते और समझते रहे हैं। हमारे घरों में दादी ने ‘काजल’ बनाना और आंखों में लगाना हमारी मां को सिखाया। झारखंड राज्य में बनने वाले हंडिया और मध्यप्रदेश के मंडला जिले के वैद्यों द्वारा किए जाने वाले उपचार की विधियां वैज्ञानिक कसौटी पर खरी उतरी हैं। भारत ने वैज्ञानिक दृष्टि अपनाते हुए समय, सामग्री, प्रक्रिया और उत्पाद को हमेशा महत्व दिया। भारत में ओझा-वैद्य शायद पढ़ना-लिखना नहीं जानते लेकिन उपचार की श्रेष्ठ विधियों से वे भलि-भांति परिचित थे। मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद् की यही कोशिश है कि विज्ञान को जन-जन तक कैसे पहंुचाया जाए। मध्यप्रदेश में किसानों, जनजातीय और ग्रामीण समाज के बीच विज्ञान की पैठ बढ़ी है। एक तरफ तो विज्ञान की उन तक पहुच हुई है, दूसरी तरफ विज्ञान के उपयोग से इन वर्गों के जीवन स्तर में भी सुधार आया है।
सवाल : परिषद् के वे कौन से कार्य हैं जिनसे प्रदेश के विकास को सीधे-सीधे लाभ पहुंच रहा है?
प्रो. प्रमोद के. वर्मा – म.प्र. विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद् किसानों, वनवासियों, स्कूली छात्र-छात्राओं, महिलाओं और ग्रामीण समुदाय के लिए विशेष प्रयास कर रहा है। विज्ञान को इन वर्गों और समुदायों के बीच ं ले जाना हमारी प्राथमिकता है। किसानों को जैविक खेती के लिए न सिर्फ जागरुक किया जा रहा है, बल्कि उन्हें हरसंभव सहायता भी दी जा रही है। कृषि विभाग के साथ मिलकर बीजों के संरक्षण का प्रयास किया जा रहा है। पंचायत स्तर पर ही बीज बैंक स्थापित हो सकें इस दिशा में कोशिश की जा रही है।
कारीगर, शिल्पी और ऐसे ही कई हुनरमंद समूहों के लिए प्रशिक्षण, तकनीकी और प्रौद्योगिकी आधारित सहयोग और बाजार के साथ उनका नेटवर्क स्थापित करने के लिए अनेक प्रयास किए जा रहे हैं। इस दिशा में काफी सफलता भी मिली है। वनवासी क्षेत्रों में न सिर्फ वनवासियों के ज्ञान का संकलन व दस्तावेजीकरण हो रहा है, बल्कि उसके मूल्य-संवद्र्धन के लिए भी काम किया जा रहा है। यह सब इसलिए भी किया जा रहा है ताकि विज्ञान का उपयोग जन-जन के विकास के लिए हो सके।

सवाल : विज्ञान का उपयोग किसान और वनवासी समुदाय द्वारा किए जाने के एक-दो उदाहरण बताएं ।
प्रो. प्रमोद के. वर्मा -मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद् द्वारा संचालित कई कार्यक्रम में दो सर्वाधिक महत्वपूर्ण – ग्रामीण प्रौद्योगिकी उपयोग केन्द्र और क्लस्टर विकास कार्यक्रम है। इन दोनों कार्यक्रमों के तहत वनवासी समाज और किसान लाभान्वित हो रहे हैंं।
ग्रामीण प्रौद्योगिकी उपयोग केन्द्र के तहत क्षमता संवद्र्धन और नवाचार पर जोर दिया जा रहा है। ग्रामीण मानव संसाधन का विकास और प्रशिक्षण के माध्यम से उसकी क्षमता संवद्र्धन प्रमुख उद्देश्य है। इसके द्वारा आम लोगों के बीच उपलब्ध कौशल, तकनीक और ज्ञान का मूल्य संवद्र्धन किया जा रहा है ताकि इनका बेहतर लाभ लिया जा सके। इसके माध्यम से परंपरागत ज्ञान और तकनीकी का भी विकास किया जा रहा है। प्रदेश सरकार की मंशा के अनुरूप संपूर्ण प्रदेश के नवाचारी प्रतिभाओं की पहचान की जा रही है। इनमें से अधिकांशतः किसान, वनवासी और ग्रामीण छात्र-छात्राएं ही हैं। ऐसे ही नवाचारियों में होशंगाबाद के छात्र प्रखर राजेश पाराशर हैं जिन्होंने मच्छर मारने वाले यंत्र का विकास किया है। इंदौर के एक वनवासी छात्र द्वारा स्वचालित विद्युत उत्पादक यंत्र और चार्जर का मॉडल तैयार किया गया है। परिषद् के सहयोग से इसका परीक्षण और विकास किया जा रहा है। इसी प्रकार खंडवा के एक किसान द्वारा भूकंप मापक यंत्र का विकास किया गया है। परिषद् के द्वारा शीघ्र ही एक नवाचारी सेल का गठन किया जा रहा है।
ग्रामीण प्रौद्योगिकी उपयोग केन्द्र के तहत ओबेदुल्ला गंज में दो कार्यशालाओं का निर्माण किया जा रहा है। इसमें बांस, जूट, लैंटाना और सिसेल फाइबर से लेकर लोहा, लकड़ी और चमड़े से संबंधित उत्पादों के बारे में आवश्यक प्रशिक्षण व विकास का काम किया जायेगा। यहां प्रशिक्षण, प्रयोग और नवाचार के लिए आने वालों के लिए छात्रावास का निर्माण भी किया जा रहा है। मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद् शीघ्र ही मध्यप्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों की आवश्यकता, वर्तमान स्थिति, उपलब्ध संसाधनों और स्थानीय समुदाय की वर्तमान अपेक्षाओं के बारे में एक व्यापक सर्वे करने वाला है।
परिषद् द्वारा किसानों के हितों को ध्यान में रख कर जलवायु परिवर्तन शोध केन्द्र की स्थापना की जा रही है। जलवायु परिवर्तन के सिलसिले में अभी तक दुनियाभर में विशेषरूप से ग्लेशियर और तटीय क्षेत्रों की स्थिति के बारे में आंकलन और शोध किया जा रहा है। लेकिन मध्यप्रदेश की आवश्यकताओं के अनुरूप यह शोध केन्द्र जलवायु परिवर्तन का यहां की मिट्टी पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन करेगा। वर्ष 2011-12 के बजट के अन्तर्गत इसके लिए 21 करोड़ की राशि का प्रशासनिक अनुमोदन प्राप्त हो चुका है।

सवाल : मध्यप्रदेश के विकास में एक वैज्ञानिक और विज्ञान संस्थान की क्या भूमिका हो सकती है?
प्रो. प्रमोद के. वर्मा – एक वैज्ञानिक और प्रदेश के विभिन्न वैज्ञानिक संस्थान प्रदेश के विकास में अहम भूमिका अदा कर सकते हैं। हमारी कोशिश है कि विकास की बात विज्ञान के साथ और विज्ञान की बात सबके साथ की जाए। म.प्र. विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद् के द्वारा लगातार यह प्रयास हो रहा है कि विकास के हर पहलू में विज्ञान व प्रौद्योगिकी को शामिल किया जाए। विज्ञान के सहयोग से विकास को सबके लिए उपलब्ध कराया जा सकता है। विकासमूलक गतिविधियों में अधिकाधिक लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की जा सकती है। स्थानीय समुदाय द्वारा किए जा रहे कार्यो में विज्ञान-प्रौद्योगिकी की मदद से गुणात्मक वृद्धि की जा सकती है। इस वृद्धि से किसी भी प्रयास का स्वमेव मूल्य-संवद्र्धन हो जाता है।  इस दृष्टि से परिषद् द्वारा नैनो टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में सार्थक प्रयास किया गया है। इसके लिए परिषद् द्वारा एक टास्कफोर्स का गठन कर काम भी शुरु किया जा चुका है। आने वाले दिनों में अल्प लागत के पानी फिल्टर और हब्र्स के निर्माण में नैनो टेक्नॉलोजी का प्रभावी उपयोग किया जा सकेगा। इससे प्रदेश को काफी लाभ मिल सकता है।
परिषद् की इच्छा है कि प्रदेश के योजना निर्माण में भी हम अपना योगदान दें। इसके लिए शासन और योजना आयोग से बातचीत करने का विचार किया गया है। विकास से जुड़े प्रत्येक विभाग के बीच अन्तर्विभागीय समन्वय जरूरी है। तभी विकास कार्यों का समुचित लाभ हितग्रहियों को मिल पायेगा। परिषद् अपने विशेषज्ञों की टीम के सहयोग से प्रदेश के विकास कार्यों का, विशेषकर जहां संरचनागत विकास हो रहा है उसके सतत मूल्यांकन का काम भी कर सकता है। जहां प्रौद्योगिकी और तकनीकी विकास या उससे जुड़े प्रशिक्षण की आवश्यकता हो वहां मैपकॉस्ट अपने योगदान के लिए सदैव तैयार है। प्रदेश में उर्जा, परिवहन और ग्राम स्वावलंबन आदि क्षेत्रों में अनेक नवाचारी प्रयोग और कार्य हो रहे हैं, इन सब का प्रदेश कविकास में बहुमूल्य योगदान है।
सवाल : मध्यप्रदेश के किसान, वनवासी, कारीगर और छात्र-छात्राओं को विज्ञान-प्रौद्योगिकी के विकास का लाभ कैसे मिलेगा ?
प्रो. प्रमोद के. वर्मा – मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद् विज्ञान के बड़े प्रयोगों की बजाए ऐसे छोटे-छोटे प्रयोग कर रहा है जिनसे प्रदेश के किसान, मजदूर, वनवासी, महिलाएं, विभिन्न क्षेत्रों में कारीगरी का काम करने वाले और छात्र-छात्राओं को लाभ मिल सके। बड़े प्रयोगों के लिए देश में अनेक वैज्ञानिक संस्थाएं काम कर रही हैं। हमारा प्रमुख उद्देश्य ही विज्ञान को जन-जन तक ले जाना और इससे आमजन को लाभान्वित करना है। किसानों के लिए बीज, मिट्टी और खाद के संबंध में अनेक नवाचारी प्रयोग हुए हैं। जैविक खेती को विकसित और विस्तारित करने के अनेक प्रयास हो रहे हैं। इसी प्रकार गोबर सहित विभिन्न प्रकार के कचरे से खाद बनाने प्रविधि किसानों तक पहुचाई जा रही है। स्थानीय स्तर पर ही बीजों के संरक्षण और संवद्र्धन की कोशिश हो रही है।
कारीगरों को अनेक स्थानों पर प्रौद्योगिकी विकास की मदद दी गई है। कारीगर और मजदूरों को प्रौद्योगिकी की मदद से श्रम और समय में मूल्य संवद्र्धन का लाभ मिल रहा है। वनवासी क्षेत्रों में लोगों का हुनर पहचान कर न सिर्फ उसे संरक्षित करने का प्रयास हो रहा है, बल्कि सहयोग के द्वारा उसमें गुणात्मक विकास की कोशिश भी की जा रही है। शहडोल सहित कई जिलों में वनवासियों ने वन उत्पादों में तकनीकों का प्रयोग शुरु कर दिया है। मिशन एक्सलेंस के माध्यम से मध्यप्रदेश के विद्यालयों से प्रत्येक वर्ष हजारों छात्र-छात्राएं देश के विभिन्न वैज्ञानिक संस्थानों का अवलोकन कर रहे हैं। ये छात्र-छात्राएं देश के वैज्ञानिक परिवेश व अपने आस-पास के वैज्ञानिक परिवेश के साथ तादात्म स्थापित करने की सीख भी ले रहे हैं।
सवाल : भविष्य की योजनाएं क्या है?
प्रो. प्रमोद के. वर्मा – प्रतिभावन स्कूली बच्चों के लिए आयोजित कार्यम ‘‘मिशन एक्सलेंस’’ काफी सफल हुआ है। ऐसी ही गतिविधि अन्य वर्गों खासकर वनवासी छात्र-छात्राओं के लिए करने की योजना है। राज्य योजना आयोग को संसाधन मैपिंग के लिए मदद दी जा रही है। जिले स्तर तक का संसाधन मैपिंग हो चुका है, इसे तहसील और गांव स्तर तक करना है। हमारी इच्छा है कि विकास कार्यों के बेहतर लाभ के लिए स्थानीय स्तर पर अन्तर्विभागीय समन्वय हो। विकास के लिए योजना निर्माण से लेकर उसके मूल्यांकन और निगरानी जैसे कार्यों में भी विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद् अपनी भूमिका निभा पाए। परिषद् में सुदूर संवेदन पद्धति (जीआईएस) की विशेष टीम उपलब्ध है। इसके द्वारा उपग्रह के आंकड़ों की मदद से हम उस प्रत्येक कार्य में मदद कर सकते हैं जहां शासन को मुआवजा देने की जरूरत होती है। डूब-क्षेत्र, ओलावृष्टि, सूखा और बाढ़ प्रभावित लोगों के लिए मुआवजा निर्धारण में हमारी विशेषज्ञता और उपलब्ध तकनीक से राजस्व विभाग को काफी मदद हो सकती है। इसके द्वारा गलत मुआवजा दावों में कमी लाई जा सकती है, वहीं दावों के लिए सही मुआवजा निर्धारण में भी काफी सहयोग हो सकता है। स्वर्णिम मध्यप्रदेश के निर्माण में हम हरसंभव योगदान देना चाहते हैं। स्पदंन फीचर्स।

 

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