विलुप्त हो रहीं पहाड़ी भाषाएं | स्पंदन फीचर्स
Tuesday , 17 May 2022
समाचार

विलुप्त हो रहीं पहाड़ी भाषाएं

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शंकर सिंह भाटिया, देहरादून

यूनेस्को की रिपोर्ट में यह बात साफ तौर पर सामने आई है कि उत्तराखंड में सबसे अधिक बोली जाने वाली गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी बोली-भाषाएं भी लुप्त होने के कगार पर हैं। लोग इन बोली-भाषाओं का प्रयोग करने से बच रहे हैं। छोटे-छोटे समूहों द्वारा प्रयोग में लाई जाने वाली दर्जनों बोलियां तो मृतप्राय: हो चुकी हैं। उत्तराखंड राज्य का गठन की अवधारणाओं में यहां की विशिष्ट संस्कृति एवं मौलिक बोली भाषाओं का संरक्षण भी शामिल था। राज्य गठन के बाद उपजे राजनीतिक हालात ने इस मुद्दे को नजरअंदाज कर दिया। भाजपा सरकार ने गढ़वाली तथा कुमाऊंनी बोली भाषा को संरक्षण देने के लिए समूह ग की भर्ती में इन बोली भाषाओं के ज्ञान की अनिवार्यता का प्रावधान किया था। बाद में सरकार ने अपना फैसला खुद ही पलट दिया।

सच तो यह कि तुष्टिकरण की राजनीति में यह मुद्दा पीछे छूट गया है। अब राजनीतिक दल गढ़वाली तथा कुमाऊंनी बोली-भाषाओं को भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान दिलाने की बात कर रहे हैं। सवाल यह उठ रहा है कि यदि इन बोली-भाषाओं का प्रयोग करने वाले लोग ही इनसे कतरा रहे हैं और उनकी संख्या लगातार कम होती जा रही है, तब किस आधार पर इन्हें संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान दिया जा सकेगा। उत्तराखंड राज्य गठन के बाद तीसरी विधानसभा के लिए चुनाव हो रहे हैं।

 

पिछले दो बार की तरह इस बार भी चुनाव में मौलिक बोली भाषा के साथ हो रही उपेक्षा चुनावी मुद्दा नहीं है। राजनीतिक दलों के घोषणा पत्रों में भी इसे दरकिनार किया गया है। यदि चुनाव में मौलिक बोली भाषा से संबंधित यह संवेदनशील सवाल मुद्दा नहीं बनेगा तो चुनाव के बाद सत्ता में आने वाला दल इसे आसानी से दरकिनार कर देगा।

साभारः दैनिक भास्कर

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