Monday , 28 September 2020
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वैश्वीकरण, मीडिया और समाज

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स्वदेश सिंह

पुस्तक समीक्षा

वैश्वीकरण, मीडिया और समाज (2011)

नेशनल पब्लिशिंग हाउस, जयपुर

लेखक- रामगोपाल सिंह

धीरे-धीरे उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के दो दशक पूरे हो गए. निजीकरण की गाड़ी पर सवार मीडिया ने अपनी पहुंच और असर देश की करोड़ों जनता तक बनाने में सफलता पाई है. सभ्यता के विकास के साथ ही वैश्वीकरण और मीडिया एक प्रक्रिया के रूप में बहुत ही मंद गति से आगे बढ़े थे लेकिन पिछले दो दशकों में भारत में हुआ बदलाव हुआ किसी क्रांति से कम नहीं. वैश्वीकरण और मीडिया ने पिछले दो दशकों में जो असर भारतीय समाज पर छोड़ा वैसा पहले कभी नहीं हुआ. खान-पान, पहनावा, भाषा- सभी पर इनका गहरा असर देखने को मिला. ऐसा लगा कि देश का सांस्कृतिक विमर्श ही बदलने लगा है.

जिस प्रकार वैश्वीकरण और मीडिया समाज पर प्रभाव डालता है उसी तरह समाज भी अपना असर इन पर छोड़ता है. इसीलिए अलग-अलग समाज में वैश्वीकरण और मीडिया के स्वरूप में भी अंतर देखने को मिलता है. यानी कि वैश्वीकरण, मीडिया और समाज में एक आपसी संबंध होता है. इसी आपसी संबंध की रूपरेखा खींचने की कोशिश राम गोपाल सिंह ने अपनी किताब वैश्वीकरण, मीडिया और समाज में की है.

वैश्वीकरण, मीडिया और समाज राम गोपाल सिंह के पिछले 4-5 वर्षों में लिखे लेखों का संकलन है. वरिष्ठ अध्येता और शिक्षाविद् रामगोपाल सिंह का कहना है कि वैश्वीकरण और मीडिया का जितना असर समाज पर पड़ा है उतना ही असर समाज ने दोनों पर डाला है.

सभी लेखों को तीन भागों में बांटा गया है. पहले छह लेखों में वैश्वीकरण और समाज के संबंधों को जाति, मानवाधिकार और आरक्षण के माध्यम से समझने की कोशिश की गई है. अगले वर्ग के लेखों के माध्यम से बदलते जातीय और राजनीतिक समीकरणों की पृष्ठभूमि में मीडिया और समाज को जानने का प्रयास किया गया है. अंतिम वर्ग के लेखों के माध्यम से आतंकवाद और नक्सलवाद जैसी गंभीर समस्या को मीडिया और वैश्वीकरण के संदर्भ में देखने की कोशिश की गई है.

किताब की प्रस्तावना में लेखक ने लिखा है कि यह पुस्तक वैश्वीकरण, मीडिया और समाज के तानेबाने को समझने की एक कोशिश है. ऐसा लगता है कि वो अपने प्रयास में सफल रहे हैं. अपनी बात रखने के लिए उन्होंने  कई तर्क दिए हैं. उन्होंने इन तीनों के अंतर्संबंध को समझने के लिए पिछले 2-3 दशकों में भारतीय समाज-जीवन को प्रभावित करने वाले कुछ प्रमुख मुद्दों के माध्यम से अपनी बात रखी है. जाति व्यवस्था, आरक्षण, दलित, राजनीतिक परिवेश, बाजारवाद, लोकतंत्र, आतंकवाद और नक्सलवाद कुछ ऐसे ही मुद्दे हैं जिन्हें समझे बिना पिछले 2-3 दशकों में आए बदलाव को समझना मुश्किल है. कहना न होगा कि मीडिया और वैश्वीकरण ने भी समाज पर सबसे अधिक प्रभाव इसी समय में डाला है.

मध्य भारत में अपने जीवन का अधिकतम समय बिता चुके राम गोपाल सिंह ने  हिंदी पट्टी के समाज, राजनीति और आर्थिक तानेबाने को नजदीक से देखा. उन्होंने नक्सलवाद को पनपते देखा और शिक्षाविद् होने के नाते वैश्वीकरण का शिक्षा पर पड़े रहे असर को नजदीक से महसूस किया है.

रामगोपाल जी का मत है कि वैश्वीकरण और मीडिया की वजह से समाज में विरोधाभास और अंतरद्वंद पैदा हुए हैं. विकास और आधुनिकता के नए पैमाने गढ़े गए हैं जो अपने आप में बेमानी हैं. ऐसा ठीक भी लगता है. दो दशक बाद वैश्वीकरण और मीडिया के प्रभाव का आकलन करना कोई अन्याय न होगा. देखने में यही सामने आता है कि वैश्वीकरण और मीडिया से जो उम्मीद की गई थी वो पूरी होते नहीं दिखती. हम आधुनिकता और विकास की दौड़ में एक अलग ही दिशा में निकल गए हैं जो एक समरस और सृजनशील समाज और गतिशील सभ्यता के विकास में हमारी मदद करता नजर तो नहीं आता.

 

 

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