Friday , 28 January 2022
समाचार

सकारात्मक एवं रचनात्मक अवधारणाएं ही समाज को नई दिशा नए आयाम देती है

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डा. स्वाति तिवारी
प्रख्यात कहानीकार डॉ. स्वाति तिवारी की कहािनयाँ एक व्यापक फलक पर बदलती हई दुनिया
में स्त्री के निरन्तर और परिवर्तनकारी सघंर्ष को सार्थक स्वर और दिशा देती दिखाई देती हैं।
उनकी लेखनी के आधार वही साधारण लोग है, जिन्हें आम लोग कहा जाता हैं। स्वाति तिवारी
की कहानियाँ भाषायी दृिष्ट से अत्यन्त सहज हैं वे आम जीवन को रेखांंिकत करने वाली
कहानी लेखिका हैं, लेकिन उनका अनुभव संसार ग्रामीण से लेकर अन्तर्राष्ट्रीय सभ्यता तक फैला
हुआ हैं, अत: उनकी कहानियाँ किसी एक दायरे में नहीं बाँधी जा सकती। उनकी कहानियाँ,
 अंग्रेजी, गुजराती, मराठी, पंजाबी में अनुवािदत हो चुकी हैं। उनकी कहानियों पर देवी
अहिल्या विश्वविद्यालय इंदौर, कुरूक्षेत्र विवि, हिमाचल प्रदेश, हिन्दी प्रचारिणी सभा चेन्नई
में शोध कार्य हुए हैं। आम घरेल महिलाओं की सृजनात्मक संभावनाओं को स्थान देने के
 िलए इंदौर लेखिका संघ की स्थापना एवं सफलता का श्रेय स्वाति जी को ही जाता है।
वे इंदौर लेखिका संघ की संस्थापक अध्यक्ष एवं दिल्ली लेखिका संघ की सचिव रही हैं। पेश है
उनसे हाल ही में हुई बातचीत के प्रमुख अशं।
प्रश्न:- आपका साहित्य के प्रति रूझान कब हुआ है?
उत्तर:- हमारे घर का वातावरण हमेशा से साहित्यिक रहा है। पिताजी हिन्दी के व्याख्याता रहे हैं।
शुद्ध उच्चारण वाली हिन्दी स्वत: संस्कारों में शािमल होती चली गई। मेरे पिताजी कथा-कथन
की शैली में हमें बचपन में साहिहत्यक कहाहनयाँ सुनाते थे। बचपन उन्हीं साहित्यिक कहानियों के
वातावरण में पला बढ़ा। रविन्द्रनाथ टैगोर की काबूलीवाला, महादेवी वर्मा की घीसा, पे्रमचंद जी
की अमर कहानियाँ, शेक्सपियर की लोकप्रिय कहानियाँ ऐसी तमाम साहित्यिक रचनाएँ मैंने और
हम सभी भाई-बहनों ने उस उम्र में सुनी थी, जब शायद साहित्य शब्द सुना और समझा भी
नहीं था। पिताजी से सुनी कहानियों से ही शायद मन में कहानी को मिट्टी तैयार हुए होगी और
यही से कहानी लिखने की नींव पढ़ गई।
प्रश्न:- लेखन की शुरूआत कैसे हुई?
उत्तर:- बचपन की सुनी पिताजी द्वारा दी गई अमिट धरोहर संस्कार बन गई, जिसने जीवन
मूल्यों को समझने की दृिष्ट दी, जिसने हमें संवेदनशील बना दिया मां ने एक सुव्यवस्थित
धार्मिक शैली के साथ पारिवारिक सामाजिक संस्कार दिए । इसी वातावरण ने हमें स्वस्थ
मानसिक पालन-पोषण के साथ उच्चतम शिक्षा भी दी जिसने सोचने समझने की दृष्टि, अपनी
बात कहने का निर्भीक आत्मविश्वास दिया। लडक़ी या लडक़े के भेदभाव से परे सन्तान के रूप
में पालन-पोषण व्यक्तित्व के निमार्ण में महत्वपूर्ण भूिमका अदा करता है- इन सभी तत्वों ने
प्रखर-वक्ता के रूप में छात्र जीवन में ही पहचान दी। मेरी इसी विशेषता में लिखना भी एवं
अनिवार्य काम था। भाषण और वाद-विवाद के साथ निबंध रिपोर्ट लिखने में पारंगत हो गई।
मैं किसी भी विषय पर पूरी तैयारी के साथ बोलती रही हूँ, बस शायद लेखन की शुरूआत इसी
तरह से हुई।
प्रश्न:- आपकी रचना प्रक्रिया क्या है?
उत्तर:- रचना प्रक्रिया का कोई निर्धारित फार्मूला नहीं होता कि हम ऐसा करेंगे तो ऐसी रचना
तैयार होगी। जब जैसे समय मिलता है कोई विषय कचोटता है लिख लेती हूँ। गहृस्थ जीवन,
कामकाजी होना और साथ में सामाजिक संस्थागत कार्यों की व्यस्तताएं हैं वे मेरे लिए और हमारी
परिवार जैसी पिवत्र संस्था के लिए प्रमुखता रखती है इन सब के बीच जो समय बचता है वह
मेरा अपना होता है, उसी में लिखती हूँ। समय की हर क्षेत्र में अपनी माँग होती है उसी में जब
जैसे बनता हैं एक कोशिश लिखने की भी होती है। जाने-अनजाने मेरे लिखने का अच्छा या बुरा
प्रभाव परिवार पर पड़ता हो, पर कुछ समझौते लेखक के परिवार स्वत: कर लेते हैं।
अक्सर रात में लिखती हूँ। पहले जब बच्चे अपनी पढ़ाई कर रहे होते थे और अब फोन आने के
इंतजार में या नेट पर बात करने के बाद कुछ देर लेखन होता है। जब भी कोई विषय मिलता है,
कोई विचार उठता है तब लिखना मजबूरी बन जाता है, क्योंंिक तब नहीं लिख पाने की बैचेनी
तंग करती है, तनाव होता है, अपनापन बना रहता है। लिखने और प्रकाहशत हो जाने के बाद
सृजन की संतुिष्ट होती है, जो नया उत्साह नयी रूफूर्ति देती हैं। लिखने से पहले पढऩा बेहर
जरूरी समझती हूं, क्योंकि लेखन होने से पहले अच्छा पाठक होना जरूरी है। अक्सर डाइनिंग
टेबल पर ही लिखती हूँ क्योंकि वहां पर घर के
केन्द्र में रहकर घर में नियंत्रण एवं दाियत्वों को पूरा करने में सरलता होती हैं। अक्सर घर में
ही लेखन करती हूँ। शायद मेरी लेखन से पहले वाली बौद्धिक क्षमता को अपने परिवार का ही
वातावरण रास आता हैं।
प्रश्न:- वर्तमान साहित्य सृजन विशेष कर आज की कहानी के बारे में आप क्या सोचती है?
उत्तर:- वर्तमान साहित्य विशेषकर कहानी में निरपेक्ष रूप से विचार किया जाता है जैसे आज
की कहानी, नई कहानी, यथार्थ कहानी, किसी युग की कहानी, सामाजिक कहानी, स्त्री विमर्श
या दलित विमर्श की कहानी इत्यादि- पर मुझे नहीं लगता कि कहानी को इस तरह खांचों में
बाँट कर देखा जाना चािहए। क्योंकि कहानी किसी युग की हो अथवा वतर्मान की वह केवल
कहानी है, जिसका संबंध जीवन का मर्म हैं, जीवन की विविधताएं, इन्हीं विविधताओं को जीवन
मर्म को लेखन अपने तरीके से महसूस कर समेटता है और कहानी बुनता हैं।
प्रश्न:- अच्छा साहित्य किसे मानती है?
उत्तर:- अच्छा सािहत्य मन की गहराईयों से निकलता है, और दिलों को स्पर्श करता हैं। वह
मात्र क्षणिक उत्तेजना नहीं, बल्कि अन्तर्मन की आन्तरिकता के लिए होता है। इसीलिए साहित्य
प्राचीन या नया नहीं केवल साहित्य होता हैं। कहानी की लम्बी यात्रा में वतर्मान परिप्रेक्ष्य में वही
उत्कर्ष है, जिसमें कहानी कहने और पढऩे के साथ श्रोता या पाठक की भाव चेतना को छू जाए।
प्रश्न:- कहते हैं आजकल कहानी का ट्रेंड बदल गया है? कहानी बदल गई है? क्या सोचती है आप?
उत्तर:- वतर्मान साहित्य एहसास करवाता है कि समय के साथ विषय और प्रश्न बदल जाते है
जिससे संदर्भ भी बदल जाते हैं, जो देते हैं सािहत्य को नयापन। पिछले तीन-चार दशकों को
कहानी ने निरन्तर इस नये पन का एहसास करवाया है, बिल्क कहना चाहिए कहानी कल्पनालोक
से यथार्थ तक पहुँची है। जिसने आत्मिक, बौद्धिक, वैयक्तिक, सामाजिक जीवन की विवेचना के
साथ-साथ जीवन की सूक्ष्मता यातनाओं को अनुभूतियों को स्वर दिया है - शब्द दिए हैं। विकास
की दृष्टि से भारतीय कहानी आज उस जगह स्थािपत है जहाँ विकिसत मनुष्य जीवन मूल्य
समेटते हुए खड़ा है।
प्रश्न:- क्या साहित्य को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से खतरा हैं?
उत्तर:- आज भले ही साहित्य पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का खतरा मंडरा रहा हो पर यह सच
है कि आज भी और हमेशा ही सािहत्य एवं कथा साहित्य मनुष्य जीवन तथा सामाजिक
परिवेश को अभिव्यिक्त देने का सबसे अच्छा माध्यम बना हुआ है।
प्रश्न:- आपकी कहानियों ने कब पत्र-पत्रिकाओं में स्थान लिया?
उत्तर:- लेख, कविताएँ तो प्रकाशित होते रहे थे। स्कूल में पढ़ती थी तभी से शायद नवीं कक्षा
में थी तभी से लेख कविताएँ प्रकािशत हो रहे हैं पहली कविता 'अश्रु की बून्दÓ स्कूल पत्रिका
में प्रकािशत हुई थी। पहली लम्बी कहानी फ्री पे्रस के हिन्दी संस्करण में धारावाहिक किश्त
में प्रकाशित हुई थी 'क्या मैंने गुनाह कियाÓ। बाद में इस शीर्षक में पहला संग्रह देश के
अग्रणी प्रकाशन दिल्ली से प्रकािशत हुआ।
प्रश्न:- क्या आपने उपन्यास भी लिखे है?
उत्तर:- हां पहला उपन्यास प्रकाशन के लिए तैयार है। प्रकाशक से चर्चा भी हो चुकी हैं।
उपन्यास लिखना एक लम्बी प्रकिया हैं जो धैर्य के साथ समय भी लेती है।
प्रश्न:- कहानी या उपन्यास में आपकी पसन्द क्या है?
उत्तर:- यूँ तो दोनों ही अच्छी विधा है। पर कहानी में पीड़ा की गहरे से गहरी अनुभूित होती
है, जैसे कोई खामोशी, कोई आक्रोश, विद्रोह, कोई चीख कोई अन्तराल जो अन्तर्मन को हिला
डालती हैं जबिक उपन्यास में उसी पलक का विस्तार किया जाता हैं, मेरा मानना है कि एक
साधारण उपन्यास से कहीं ज्यादा कठिन है एक अच्छी कहानी लिखना।
प्रश्न:- पुस्तकें कहाँ से प्रकािशत हुई हैं?
उत्तर:- मेरा पहला संग्रह वाणी प्रकाशन दिल्ली से आया फिर एक संग्रह 'अकेले होते लोगÓ
भी वाणी से ही आया है। पिछले साल बैंगनी फूलों वाला पेड़ कहानी संग्रह सामयिक प्रकाशन
दिल्ली से ही आया। दिशा प्रकाशन नई दिल्ली से भी दो संग्रह आए हैं। संजीव प्रकाशन,
नितिका प्रकाशन से भी आए हैं- अकेले होते लोग का अंग्रेजी अनुवाद वाणी प्रकाशन दिल्ली से
ही आने वाला है। उपन्यास के बारे में सामयिक प्रकाशन से चर्चा हो चुकी है।
प्रश्न:- समीक्षाएँ कहाँ-कहाँ हुई?
उत्तर:- सारी तो याद भी नहीं है, पर हो समीक्षाएँ दूरदर्शन(दिल्ली) पर सबुह सबेरे कार्यक्रम
में भी आयी। नई दुनिया, दैनिक भास्कर, कादम्बिनी, वीणा, कथाक्रम, कथाबिम्ब, हिन्दुस्तान,
जनसत्ता, साक्षात्कार कई पत्र-पत्रिकाओं में आती रही है।
प्रश्न:- आपने कई सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त किए हैं। कैसा लगता है पुरस्कार पाना?
उत्तर:-निश्चय ही अच्छा लगता है। पुरस्कार हमें बेहतर करने के लिए प्रेरित करते हैं। हमारे
लेखन को हमारी कृति को प्रमाणित करते हैं। कह सकते है कि पुरस्कार साहित्यकार को उसकी
जिम्मेदारी का अहसास दिलाते हैं।
प्रश्न:- लेखक होना कब अच्छा लगता है?
उत्तर:- जब भी कोई अनजान व्यक्ति अनजाने में ही आपकी कहानी पर चर्चा करें तब। एक बार
मैं इंदौर के चौइथराम अस्पताल में ऑपरेशन के लिए एडिमट होने गई। वहाँ के जनसंपर्क
अधिकारी के केबिन में बैठी थी वहीं से भर्ती होने के औपचारिकताएं पूरी करवा रही थी। पर्ची
एवं एडमिशन पेपर तैयार कर रही कम्प्यूटर आपरेटर बगैर पेपर तैयार किए मेरे पास आ गई
कहने लगी क्या आप वहीं है जिनकी कहािनयाँ पढ़ती हूँ? मेरे हाँ करने पर वह इतनी खुश हो
रही थी जैसे कोई बरसों से बिछड़ा मिल गया हो .....................। कहने लगी
आपका नाम टाइप करते हुए मेरा मन पहले मिलने के लिए मचलने लगा उसने पहले मुझे वार्ड
में पहुंचाया आप आराम करिए मैं पेपर तैयार करके लाती हूँ।
ऐसा ही कुछ एक बार फिर एक लेबोरेटरी में भी हुआ। एक बार भोपाल में एक शादी में
महिलाओं का एक ग्रुप मेरी कहानी 'जिज्जी से मिल आनाÓ के अचार प्रसंग पर चर्चा कर रहा
था। पास अनजान बनकर खड़े होकर यह सुनना अच्छा लग रहा था। ऐसे वक्त लगता हैं हमारा
कहा, बोला तो एक निर्धारित दायरे के लोग सुन रहे होते हैं, पर हमारा लिखा पता नहीं कितने
कहाँ-कहाँ पढ़ रहे होते हैं। हमारी बात वैयक्तिक विचार से सावर्जिनक चर्चा में जाकर लोगों को
सोचने पर बाध्य करती है।
प्रश्न:- सबसे महत्वपूर्ण लेखन क्या रहा?
उत्तर:- यूँ तो हर लेखन महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि उसका उद्देश्य अलग-अलग होता है। मेरे
अब तक के लेखन में मेरा एक लेख दैनिक भास्कर के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकािशत हुआ था।
'क्या हो गया है मेरे धार को?Ó दरअसल यह लेखकीय सोच या बौद्धिकता से तैयार लेख तो था
ही नहीं। यह पीड़ा थी एक स्त्री की दंगों से तहस-नहस होते अपने मायके के शहर की। उन दिनों
भोजशाला मुद्दे को लेकर धार दंगों की चपेट में था। मेरे लेख ने उसी शहर के साम्प्रदायिक सौहाद्र, 
प्रेम भाईचारे को याद किया था जिसमें जिक्र था बन्दीछोड़ बाबा की दरगाह का जिसमें जिक्र था 
हिन्दू-मुस्लिम हर विवाह में बजने वाले बशीर के बैण्डबाजे का।
एक सहज-सा लेख था। अखबार में प्रकािशत लेख अभी तो मैंने देखा ही था कि मुझे तत्कालीन
मुख्यमंत्री के निवास से फोन आया- सीएम साहब आपसे बात करेंगे, मैं आश्चर्यचकित थी। मेरे
लिए फोन? घर पर उस वक्त कोई था भी नहीं। शहर में तनाव था। धार में हफ्तेभर से कफ्र्यू
लगा हुआ था। एक भय मेरे वजूद पर फैलने लगा। कुछ तो गड़बड़ हो गयी है यह लिख कर
...............पर जब तत्कालीन मुख्यमंजी श्री दिग्विजय सिंह ने कहा कि मैंने आपका
लेख पढ़ा। बहुत बिढय़ा लिखा है। मैं बधाई देता हूँ। इस वक्त ऐसे ही लेखों की जरूरत है। फिर
उन्होंने इस मुद्दे और तक मेरे लेखन के बारे में लम्बी चर्चा की। उस लेख के लिए बाद में
मुख्यमंत्री जी का लिखित सराहना पत्र भी आया। सुकून तब और ज्यादा मिला जब मेरे शहर
धार से हिन्दू-मुिरूलम दोनों सम्प्रदाय के अनेक लोगों के लगातार फोन आते रहे। मुझे बताया
गया कि शहर में वो लेख दोनों सम्प्रदाय के लोगों ने घर-घर बाँटा। उस एक लेख के बाद मुझे
लगा हमारी सहज सी दिल से निकली बात भी लोगों के दिलों में इस तरह जाती है। यह सब
कुछ मेरे लिए पुरस्कारों, सम्मानों से बढ़ कर था। लगा लेखन आपको आपकी बात को आपके
विचारों को स्थापित करता है ...............।
प्रश्न:- आप कई संस्थाओं से भी जुड़ी रही है। क्या आप समाज व देश के लिए कुछ बेहतर कर
पाई?
उत्तर:- वैसे तो हर व्यक्ति अपने नए समाज के लिए कुछ बेहतर करता है पर किसी संरूथा से
जुड़ कर आप एक टीम में शािमल होते हैं। टीम वर्क के परिणाम भी बड़े होते हैं, क्योंकि
विस्तार से काम करने की सुविधा होती है। मैंने इंदौर में महिलाओं की सृजनात्मक, रचनात्मक
बौद्धिक उर्जा को लेखिका संघ के माध्यम से एकत्र कर कई महत्वपूर्ण काम किए। थेलसेमिया
चाइल्ड वेलफेयर ग्रुप की बोर्ड ऑफ डायरेक्टर में रहीं तो बीमार बच्चों के लिए भी कुछ काम किए।
फूल ना सही फूल की पंखुरी ही सही यह सोच कर राज्य संसाधन केंद्र की गवर्निंग बाडी की
सदस्य मनोनीत हई। प्रौढ़ शिक्षा के लिए काम करने वाली एक उत्कृष्ट संरूथा है यह दिल्ली
लेखिका संघ की सिचव, दिल्ली महिला पत्रकारों की संस्था आईडब्ल्यूपीसी की सदस्य हूं।
संस्थाएँ हमें काम करने का आधार देती है- दिशा देती हैं।
प्रश्न:- आपने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया प्रिन्ट मीडिया दोनों में ही काम किया है?
उत्तर:- हाँ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में तब काम किया जब हमारे प्रदेश में चैनल्स का नया दौर था।
तब मैंने एक चैनल के लिए सोलह किश्तों के लिए 'एक हस्तीÓ श्रंखला में साक्षात्कार लिए थे।
परिवार परामश केन्द्र पर केन्द्रित आधे घण्टे की एक फिल्म 'घरोंदा ना टूटेÓ बनाई थी। इसमें
सम्पादन, पटकथा, स्वर सभी कुछ स्वयं किया था। एक और चैनल के लिए कलागुरू विष्णु
चिंचालकर पर एक फिल्म बनाई। मन्नू भंडारी जैसी वरिष्ठ कथाकार का इन्टरव्यू लिया था।
आकाशवाणी इंदौर के लिए अनिगनत कार्यक्रम लिखे। प्रिन्ट मीडिया में कई प्रमुख अखबारों में
फीचर सम्पादक का काम किया। पत्रिकाओं, किताबों का सम्पादन किया है। देश के अग्रणी
अखबारों के लिए स्थायी स्तम्भ लिखें।
प्रश्न:- आजकल क्या कर रही है?
उत्तर:-डिलिट के लिए करने का मन है उसी के लिए विषय खोज रही हूँ। आम विषयों से हट
कर कोई नया विषय हो तभी काम करने में मजा आता है।
प्रश्न:- आप विज्ञान की विद्यार्थी रही है हिन्दी में लेखन कैसे?
उत्तर:- हाँ मैने एमएससी प्राणिकी में किया फिर टेक्सेशन में एलएलबी किया फिर कुछ
अन्तराल के बाद एम.फील, पीएचडी किया और डी. लिट की इच्छा है। विज्ञान की विद्यार्थी होने
का फायदा मुझे मिलता है कोई भी बात गप्पबाजी नहीं होती। वैज्ञानिक दृष्टिकोण घटनाओं का
विश्लेषण करने में मदद करता है।
प्रश्न:- आपके लेखन की मूल प्रेरणाएं क्या रही हैं?
उत्तर:- मेरी लेखनी के आधार वही साधारण लोग है। समाज के आम लोग लेखनी का दायरा
अपने आसपास के लोगों से ही बना है इसलिए मेरी कहानी के पात्र काल्पिनक कभी नहीं रहे,
वे इसी सामाजिक परिवेश उपजे कथा बीजों से बने हैं। मेरा मानना है कि साधारण लोगों के
जीवन के सरोकारों से ही असाधारण कहानी बनती है। मेरे विचार से एक कहानीकार की लेखनी
की सार्थकता तभी होती है जब साधारण लगने वालों में भी वह असाधारण को ढूंढ निकाले। मेरे
लेखन के पात्र स्वयं मुझे लिखने के लिए बाध्य करते हैं, इनमें ज्यादातर पात्र स्त्रियां ही है
विडम्बना ही है कि समाज और परिवार की दूरी होते हुए भी वही शोषण की शिकार होती है।
ऐसे शोषित पात्रों की स्थिति मुझे मेरे संवेदनातंत्र को विचिलत कर देती है और प्रवाह के विरूद्ध
कलम काम करने लगती है।
प्रश्न:- भाषा शैली की बात आती है तो आपकी सोच में एक साहित्यकार का दाियत्व क्या है?
उत्तर:- सािहत्य में जीवन का सत्य होना चाहिए क्योंकि विणर्त सखु-दु:ख पाठक आत्मसात
कर लेता हैं, इसिलए लेखन सहज-सरल और प्रवाहमान हो, ज्यादा क्लिष्ट अलंकारी भाषी नहीं
बिल्क सुन्दर भावों की प्रस्तुती देना चािहए जो लोगों को तमाम समस्याओं से जुझने का हौसला
दे सके। दूसरी बात यह है कि व्यक्ति आज तमाम उलझनों से परेशान है। इसिलए साहित्य
सकारात्मक आशावादी हो निराशावादी नहीं। आज लेखक को अपने अस्तित्व को बनाये रखने
की चिन्ता बनी रहती है, इससे लेखन प्रभािवत होता है। कहानी का आधुनिकीकरण तो होना
चाहिए पर अमानवीयकरण नहीं।
प्रश्न:- साहित्य में अश्लीलता के बारे में क्या सोचती है?
उत्तर:- अश्लीलता साहित्य को चर्चित कर सकती है साथर्क नहीं। शील-अश्लील का ध्यान रखकर
मर्यादित सत्य के स्वरूप में ही लिखा जाना चािहए।
प्रश्न:- लेखन और परिवार में आपकी प्राथिमकता क्या हैं?
उत्तर:- आपने परिवार और समाज को नकार कर किया हुआ कोई भी काम सार्थक हो ही
नहीं सकता। मेरी प्राथिमकता में परिवार हमेशा सबसे आगे है उसके बाद दूसरे काम।
प्रश्न:- सािहत्य का संकल्प क्या होना चािहए?
उत्तर:- सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और परिवेशगत बदलाव हर सािहत्य में स्वत: समाहित
होते हैं - लेखक में अपने समय की समस्याओं तथा संकटों की पहचान की क्षमता होनी
चािहए। क्योंकि उनकी सकारात्मक एवं रचनात्मक अवधारणाएं ही समाज को नई दिशा नए
आयाम देती है। अत: साहित्य का संकल्प समाज के हित में होना चािहए।
(अंजना सिव की स्वाति तवारी से बातचीत)

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