Wednesday , 5 August 2020
समाचार

दुनिया के आर्थिक मैदान में चीन की घेराबन्दी!

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प्रो. रामदेव भारद्वाज, कुलपति

विश्व राजनीति और वैश्विक पर्यावरण अत्यधिक प्रतिकूल दौर से गुजर रहा है। कोरोना महामारी से जहाँ मानवता त्राहि-त्राहि कर रही है, वहीं अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक, सामरिक, कूटनीतिक एवं तकनीकी संबंधों के पुराने गठबंधन धूमिल हो रहे हैं और नए संबंधों के समीकरण स्थापित हो रहे हैं। चीन जो विश्व का मैन्‍युफैक्‍चरिंग हब के नाम से विख्यात है ‘एग्जिट चाइना’ नीति के कारण संकट में है। अनेकों बहुराष्ट्रीय कंपनियां चीन से पलायन करना चाहती है।लेकिन भारत पसंदीदा मैन्‍युफैक्‍चरिंग हब के रूप में उभर रहा है।विश्व बाजार में मेड इन चाइना प्रॉडक्ट का स्थान अब मेड इंडिया इंडिया लेने जा रहा है?? गुजरात और उत्तरप्रदेश बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिए अनुकूल विकल्प उभर रहे हैं? चीन को संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है। वुहान का इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी और वुहान में स्थित एशिया का सबसे बड़ा वायरस बैंक संदेह के दायरे में है? इनकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जांच किए जाने की मांग उठ रही है?? दुनिया के 212 देशों और क्षेत्रों में कोरोना वायरस से कुल 3,308,678 लोग संक्रमित है, जिनमें कुल 2,34,123 की मौत हो चुकी है। अमेरिका में ही कुल मरीजों की संख्या 1,095,210 है तथा मरने वाले 63,861 है। यह स्थिति भयावह है। लेकिन सोचने का विषय यह है कि चीन में कोरोना का प्रकोप वुहान के अतरिक्त कहीं नहीं हुआ, ऐसा कैसे और क्यों? जबकि कोरोना वायरस सम्पूर्ण विश्व में तबाही फैला रहा है। विश्व समुदाय आज इस आपदा के लिए चीन को उत्तरदायी मान रहा है। क्या यह चीन की कोई नई चाल है?

चीन स्वयं को एशिया का सुपर पावर मानता है। वह दुनिया के देशों को भी आर्थिक के साथ अन्य सभी क्षेत्रों में मदद कर उत्कृष्ट स्थान एवं अपने एकाधिकार और विस्तारवाद को स्थापित करना चाहता है। इसी नीति के अंतर्गत ही चीन के संबंध बनते और बिगड़ते रहते हैं। अमेरिका और यूरोपीय राष्ट्रों के साथ भी चीन की यही नीति है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अध्येयता मानते हैं कि कोरोना महामारी का संकट दोहरी मार -एक ओर मानवीय क्षति और दूसरी ओर आर्थिक क्षति के संकट का समय है। चीन के इरादे अविश्वसनीय है। यद्यपि चीन मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर अन्य मानवीय सहायता तक के मामलों में मदद कर रहा है परन्तु यह सिर्फ गुणवत्ताहीन व्यापार तक सीमित है। ब्राजील की डिप्लोमेट और अर्थशास्त्री टोटियान रोइटो मानती हैं कि चीन की तरफ जाए या अमेरिका की तरफ धर्म संकट है। यह एक ‘लीडरशिप वेक्यूम’ है। दोनों से बचना चाहिए। परन्तु ‘लीडरशिप वेक्यूम’ थ्योरी से सभी सहमत नहीं। भारत विश्व को नेतृत्व दे रहा है और कोविद-19 संकट के बाद भी भारत और भारतीय दृष्टि एवं नीतियां विश्व नेतृत्व के लिए सक्षम है, सही विकल्प है।

‘एग्जिट चाइना’ से भारत को लाभ——–
कोरोना के कारण चीन की अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ रहा है।इस स्थिति का सीधा लाभ भारत को मिलता दिख रहा है। क्योंकि 1000 से अधिक विदेशी कंपनियां चीन छोड़कर भारत आने को तैयार है। इन कंपनियों की ‘एग्जिट चाइना’ नीति का लाभ निश्चित तौर पर भारत की अर्थव्‍यवस्‍था को मिल सकता है।
जापान ने तो चीन छोड़ने वाली कंपनियों के लिये आर्थिक पैकेज की घोषणा की है। 1000 विदेशी कंपनियों में से 300 कंपनियों ने तो भारत में उत्‍पादन शुरू करने की योजना पर सक्रियता से काम शुरू कर दिया है। ये कंपनियां भारत को एक वैकल्पिक मैन्‍युफैक्‍चरिंग हब के तौर पर देखने लगी हैं। कंपनियों ने सरकार के अलग-अलग स्‍तर पर अपनी तरफ से प्रस्‍ताव भेजने शुरू भी कर दिए हैं। कंपनियों की तरफ से केंद्र सरकार के विभागों के अलावा विदेशों में भारतीय उच्‍चायोग और राज्‍य के औद्योगिक विभागों के पास प्रपोजल भेजे गए हैं।
उत्तर प्रदेश सरकार को भी इस तरह के प्रस्ताव मिले हैं। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने चीन से पलायन करने वाली कंपनियों को गौतमबुद्ध नगर जनपद में जगह देने के लिए तैयारी शुरू कर दी है। प्रदेश के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम तथा निर्यात प्रोत्साहन मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह और औद्योगिक विकास मंत्री सतीश महाना ने एक संयुक्त बैठक की है। जिसमें इन कंपनियों को जमीन देने पर विस्तार से विचार किया गया। उत्तर प्रदेश में आने वाली कंपनियों को सरकार द्वारा इंसेंटिव और कैपिटल सब्सिडी देने पर भी विचार किया जा रहा है। औद्योगिक विकास मंत्री सतीश महाना ने गौतमबुद्ध नगर की तीनों विकास प्राधिकरणों के मुख्य कार्यपालक अधिकारियों और चेयरमैन आलोक टंडन को इस बाबत तैयारियां करने का भी निर्देश दिया है। कोरोना के कारण चीन पसंदीदा मैन्‍युफैक्‍चरिंग हब होने का स्वरूप विघटित होने लगा है। हजारों विदेशी कंपनियों की तरफ से भारत में अथॉरिटीज के साथ अलग-अलग स्‍तर पर वार्ता जारी है। जो कंपनियां भारत आने को उत्‍सुक हैं उनमें मोबाइल्‍स, इलेक्‍ट्रॉनिक्‍स, मेडिकल डिवाइसेज, टे‍क्‍सटाइल्‍स और सिंथेटिक फैब्रिक से जुड़ी कंपनियां शामिल हैं। कंपनियां अब भारत को अगली मैन्‍युफैक्‍चरिंग हब के तौर पर देख रही हैं।
कोरोना वायरस के कारण जापान, अमेरिका और साउथ कोरिया की कंपनियां जो चीन पर निर्भर हैं, अब काफी डरी हुई हैं और भारत आना चाहती हैं। नए मैन्‍यूफैक्‍रर्स को कॉरपोरेट टैक्स मात्र 17% ही देना होगा जो कि साउथ ईस्‍ट एशिया में सबसे कम है। चीन इस समय अंतरराष्‍ट्रीय समुदाय की नजरों में है। अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन चीन पर आरोप लगा रहे हैं कि उसने इस महामारी को समय रहते नियंत्रित नहीं किया है। जापान की शिंजो आबे सरकार ने कहा है कि अगर देश की कंपनियां चीन के बाहर जापान या फिर किसी और देश में प्रोडक्‍शन यूनिट लगाती हैं तो फिर उन्‍हें 2.2 बिलियन डॉलर के पैकेज से मदद की जाएगी।

ऑस्ट्रेलिया की चिंता——–
ऑस्ट्रेलिया चीन का सबसे बड़ा बिजनेस पार्टनर रहा है। परन्तु जैसे-जैसे वुहान वायरस के लिए चीन के विरोध में स्वर उठने लगे हैं, वैसे-वैसे रोज नए-नए देश चीन के खिलाफ विरोध में सामने आ रहे हैं। सिर्फ देश ही नहीं बल्कि, जनता में चीन विरोधी भावना की बढ़ोतरी हो रही है। ऑस्ट्रेलिया में चीन विरोधी भावना इतनी बढ़ गयी है कि ऑस्ट्रेलिया की विदेश मंत्री मारिसे पेने ने ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट जॉन मॉरिसन से चीन के खिलाफ एक स्वतंत्र जांच की मांग की है। जिसमें COVID-19 की “उत्पत्ति” और वुहान में प्रकोप से निपटने के तरीकों की जांच हो सके। विदेश मंत्री मारिसे पेने ने कहा है कि कोरोना वायरस के संदर्भ में चीन पारदर्शिता को लेकर उनकी चिंता बहुत महत्वपूर्ण है। ऑस्ट्रेलिया वैश्विक महामारी को लेकर जांच चाहता है जिसमें वुहान में कोरोना के पहले मामले आने के बाद चीन के एक्शन की भी जांच होनी चाहिए। ऑस्ट्रेलिया के लिए यह एक बहुत ही साहसिक कदम है, क्योंकि चीन ऑस्ट्रेलिया का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है जो कि उसकी अर्थव्यवस्था में 194.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य का आयात और निर्यात करता है।
वहीं चीन ने भी ऑस्ट्रेलिया में काफी निवेश कर रखा है लेकिन अब ऑस्ट्रेलिया को भी चीन के इन निवेशों पर शक होने लगा है कि चीन जरूर कोई खेल खेल रहा है। इसी के मद्देनजर ऑस्ट्रेलिया ने अपने इनवेस्टमेंट के नियम कड़े किए थे जैसा यूरोप के कुछ देश और भारत भी कर चुका है।
वहीं ऑस्ट्रेलिया की नौसेना भी चीन के दक्षिण-चीन सागर में बढ़ते कदम पर नजर बनाए हुए हैं और USA के साथ मिलकर उसका सामना करने की योजना बना रही है। मजबूत व्यापारिक संबंध होने के बावजूद कुछ ही दिनों पहले ऑस्ट्रेलिया की नेवी का एक पोत अमेरिका के युद्ध पोत के साथ देखा गया था। ऐसा लगता है कि चीन की आंखों के सामने ऑस्ट्रेलिया उसे चुनौती दे रहा है।
चीन के विरोध में इस प्रकार की लहर चीन की किसी एक हरकत की वजह से नहीं आया है। बीजिंग ने कोरोना वायरस के शुरू होने से पहले ऑस्ट्रेलिया के बाज़ारों से मास्क गायब करवा दिया था। यह रिपोर्ट आई थी कि चीनी सरकार समर्थित एक दिग्गज कंपनी ने गुपचुप तरीके से ऑस्ट्रेलिया में मास्क, हैंड सैनिटाइजर, वाइप्स और आवश्यक चिकित्सा के सामान थोक भाव में खरीदा और उन्हें चीन भेज दिया। ऑस्ट्रेलिया और अन्य देशों में जहां भी द ग्रीनलैंड ग्रुप हैं वहाँ से 3 मिलियन सर्जिकल मास्क के कुल 500,000 जोड़े दस्ताने और भारी मात्रा में सैनिटाइज़र और वाइप्स की ख़रीदारी हुई थी। परन्तु जब तक ऑस्ट्रेलिया सरकार सचेत होती, जरूरी चीजों की कमी व्याप्त हो चुकी थी। इस कारण से भी ऑस्ट्रेलिया में चीन के विरोध में आवाज जोर पकड़ने लगी है। बीजिंग का इस देश में निवेश के साथ-साथ प्रभाव में भी कमी आई है, लेकिन कोरोना वायरस महामारी और फिर उसका कवर-अप के अलावा, वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी में उत्पन्न होने वाले वायरस के संदेह ने ऑस्ट्रेलिया में काफी चीजों को बदल दिया है। ऑस्ट्रेलिया और चीन के संबंध में तेजी से शत्रुता अपनी जगह बना रही है। अब देखना यह है कि ऑस्ट्रेलिया की ये नाराजगी चीन को कितनी भारी पड़ती है??

भारत में वैकल्पिक मैन्‍युफैक्‍चरिंग हब —-
चीन में उत्पादन और निर्माण में संलग्न अनेकों देशों की MNCs एवं TNCs है जिनका चीन से मोह भंग हो रहा है वे भारत को वैकल्पिक मैन्‍युफैक्‍चरिंग हब के रूप में देख रहीं है। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान, वियतनाम, कंबोडिया और इंडोनेशिया आदि अनेक देशों की कपंनियों का झुकाव भारत की ओर है।

जापान——
चीन से दूरी बनाने वाली जापानी कंपनियों को भारत लाने के लिए भारतीय राज्यों ने भी प्रस्ताव दिए हैं। जापान सरकार ने चीन में काम कर रही अपनी कंपनियों को चीन से विस्थापित करने के लिए कहा है। गुजरात सरकार ने सूरत नगर में जापानीज कंपनी की मदद के लिए 200 करोड़ डॉलर यानी करीब 15,000 करोड़ रुपये का फंड रखा है। इसी प्रकार चीन से बाहर किसी अन्य देश में जाकर उत्पादन करने पर इन जापानी कंपनियों को 21.5 करोड़ डॉलर की मदद का प्रस्ताव रखा गया है। भारत के राज्यों की नजर इस मदद राशि पर है। जापानी कंपनियों को अपने राज्य में लाने में कामयाब होने पर अमेरिका व अन्य देशों की कंपनियां भी उस राज्य में अपनी यूनिट लगाने के लिए प्रेरित हो सकती है। यही वजह है कि गुजरात सरकार के प्रमुख सचिव (उद्योग) मनोज दास ने जापान के सरकारी और व्यापारिक प्रमुखों को इस संबंध में पत्र भी लिख दिया है।
गुजरात सरकार का कहना है कि उनके यहां पहले से कई जापानी कंपनियां काम कर रही हैं और जापानी कंपनियों के लिए अलग से औद्योगिक पार्क भी है। गुजरात सरकार 30 प्रकार से अधिक क्षेत्रों से जुड़ी यूनिट लगाने पर कई वित्तीय छूट भी दे रही है। राज्य सरकार के मुताबिक कोरोना वायरस की वजह से जारी लॉकडाउन के समाप्त होते ही चीन से बाहर निकलने की इच्छुक जापानी कंपनियों को गुजरात में लाने के लिए बड़े स्तर पर अभियान चलाया जाएगा। गुजरात की तरह ही उत्तर प्रदेश सरकार भी जापानी कंपनियों को अपने यहां स्थापित करना चाहती है। हाल ही में प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उद्योग मंत्री से इन कंपनियों को ध्यान में रखते हुए नीति बनाने के लिए कहा है। इस संबंध में बैठकें भी की गई हैं। औद्योगिक संगठन के साथ एक बैठक में एमएसएमई मंत्री नितिन गडकरी ने भी कहा था कि लॉकडाउन समाप्त होने के बाद चीन से निकलने की इच्छुक जापानी और अमेरिकी कंपनियों को भारत में लाने के प्रयास तेज किए जाएंगे ।

वियतनाम, कंबोडिया और इंडोनेशिया——-
ऐसी सम्भावना बनने लगी है कि विश्व बाजार में मेड इन चाइना प्रॉडक्ट अब मेड इन इंडिया, मेड इन वियतनाम जैसे टैग के साथ मिलें। क्योंकि चीन और अमेरिका के बीच बढ़ते कारोबारी युद्ध ने विदेशी कंपनियों को चीन से बाहर निकलने के लिए मजबूर कर दिया हैं। इस कारण जहां चीन-अमेरिका के बाजार प्रभावित हुए हैं वहीं एशिया के कुछ देश अब इसमें नए मौके तलाश रहे हैं। भारत समेत वियतनाम, कंबोडिया और इंडोनेशिया जैसे कई देश उम्मीद कर रहे हैं कि अब “फैक्ट्री ऑफ द वर्ल्ड” कहे जाने वाले चीन से निकलकर कंपनियां इन देशों में अपनी विनिर्माण इकाइयों के लिए नई जमीन तलाश करेंगी। आज चीन में जूते-चप्पलों से लेकर वाशिंग मशीन और घड़ियों जैसे उत्पादों की दुनिया भर की फैक्ट्रियां लगी हुई हैं। अमेरिका ने लगभग 200 अरब डॉलर के चीनी आइटमों पर टैरिफ बढ़ाकर 25 फीसदी कर दिया है। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए चीन ने भी 60 अरब डॉलर के अमेरिकी आइटमों पर ड्यूटी बढ़ा दी।
वियतनाम की सलाहकारी और टैक्स फर्म डेजान शिरा एंड एसोशिएट के इंटरनेशनल बिजनेस मैनेजर ट्रेंट डेविस का कहना हैं, “अमेरिका और चीन के बीच बढ़ता तनाव कारोबारियों को बाहर जाने के लिए मजबूर कर रहा है।” इलेक्ट्रॉनिक कंपनी कैसियो ने बताया कि अमेरिकी पेनल्टी से बचने के लिए उसने अपनी घड़ी निर्माण की कुछ इकाइयों को थाईलैंड और जापान में शिफ्ट किया गया है। जापानी प्रिंटर कंपनी रिको ने भी अपना काफी काम चीन से थाईलैंड शिफ्ट किया है। चीन से दूर होने वालों में अमेरिका की शू कंपनी स्टीव मेडन भी है जो अब कंबोडिया जाने पर विचार कर रही है। इसके बाद वॉशिंग मशीन बनाने वाली हेयर और एडिडास, प्यूमा, न्यू बैलेंस और फिला जैसे जूते के ब्रांड को बेचने वाली कंपनी जैसन अपनी नजरें वियतनाम पर लगाए हुए हैं।
डेविस के अनुसार उत्पादकों के लिए चीन छोड़कर आसपास के देशों में जाना फायदे का सौदा है। सस्ता श्रम और कम टैक्स भी इनके बाहर जाने का बड़ा कारण है। बकौल डेविस, “कंपनियों का बाहर जाना सिर्फ ट्रेड वार का नतीजा नहीं है बल्कि वियतनाम में मौजूद अवसर भी इन्हें अपनी ओर खींच रहे हैं।” वियतनाम की गारमेंट कंपनी गारको 10 के डायरेक्टर थान डुक वियत का मानना हैं कि “ट्रेड वार का शुक्रिया…वियतनाम अर्थव्यवस्था को खासकर गारमेंट इंडस्ट्री को बहुत लाभ हुआ है।” अमेरिकी चैंबर ऑफ कॉमर्स इन चाइना की रिपोर्ट के मुताबिक चीन में मौजूद करीब 40 फीसदी अमेरिकी कंपनियां या तो निकल चुकी हैं या बाहर निकलने पर विचार कर रही हैं।

अमरीकी कंपनियां आएंगी भारत ——–
कोरोना आपदा के लिए चीन दोषी है यह धरणा प्रबल होती जा रही है। इसका प्रभाव चीन की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। भारत को इसका लाभ मिलता दिख रहा है। क्योंकि 1000 से अधिक विदेशी कंपनियां चीन छोड़कर भारत आने को तैयार है। अमेरिका की तमाम कंपनियां अब चीन के विकल्प की तलाश कर रही हैं और उनकी नजर भारत पर है। अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ स्टेट्स के सीनियर अधिकारियों और भारत में काम कर रही अमेरिकन कंपनियों के प्रतिनिधियों के बीच बैठक हुई। बैठक का आयोजन अमेरिकन चैम्बर ऑफ कॉमर्स ने किया था। बैठक में भारत को निवेश के लिए नये विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। यूएस गवर्नमेंट डिपार्टमेंट ऑफ स्टेट्स ने सभी कम्पनियों को कहा कि भारत में काम करो भारत बेहतर विकल्प है। चीन के नुकसान का लाभ भारत को होगा। प्रधानमंत्री मोदी जी और चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग। पावर ट्रांसफर की प्रतीकात्मक तस्वीर यूएस डिपार्टमेंट ऑफ स्टेट्स में साउथ एशिया के असिस्टेंट सेक्रेटरी ऑफ स्टेट थॉमस वाजदा ने इस बैठक में कहा कि जो इंडस्ट्रियल ऐक्टिविटी अभी चीन में हो रही है बहुत जल्द वह भारत में होने वाली है। अमेरिकी कंपनियों के प्रतिनिधियों से कहा गया है कि वे अपने प्रस्ताव को लेकर भारत सरकार से सामने पहुंचे और इन्सेंटिव की मांग करें, जिससे आने वाले दिनों में यहां अमेरिकन कंपनियों का तेजी से विस्तार हो सके।
बिजनिस टुडे के अनुसार करीब 1000 विदेशी कंपनियां ऐसी हैं जिनकी नजरें भारत में उत्‍पादन शुरू करने पर टिकी हैं। इन कंपनियों के बीच ‘एग्जिट चाइना’ मंत्र यानी चीन से निकलने की सोच मजबूत होती जा रही है। भारत की अर्थव्‍यवस्‍था के लिए यह अच्छा है। 1000 विदेशी कंपनियां तो ऐसी है जिन्होंने भारत में उत्‍पादन शुरू करने को प्राथमिकता दी है। इन कंपनियों ने भारत को एक वैकल्पिक मैन्‍युफैक्‍चरिंग हब के तौर पर देखा और समझा है। इन कंपनियों ने सरकार के अलग-अलग स्‍तर पर अपनी तरफ से प्रस्‍ताव भेजने शुरू भी कर दिए हैं। कंपनियों की तरफ से केंद्र सरकार के विभागों के अलावा विदेशों में भारतीय उच्‍चायोग और राज्‍य के औद्योगिक विभागों के पास प्रपोजल भेजे गए हैं।
प्रधानमंत्री मोदी जी, चीनी कंपनियों को इंडिया लाने के लिये व्यक्तिगत प्रयास में जुटे हैं। उत्तर प्रदेश सरकार को भी इस तरह के प्रस्ताव मिले हैं। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने चीन से पलायन करने वाली कंपनियों को गौतमबुद्ध नगर जनपद में जगह देने के लिए तैयारी शुरू कर दी है। प्रदेश के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम तथा निर्यात प्रोत्साहन मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह और औद्योगिक विकास मंत्री सतीश महाना ने इस संदर्भ में एक संयुक्त बैठक की है। जिसमें इन कंपनियों को जमीन देने पर विस्तार से विचार किया गया। उत्तर प्रदेश में आने वाली कंपनियों को सरकार द्वारा ‘इंसेंटिव और कैपिटल सब्सिडी’ देने पर भी विचार किया जा रहा है।औद्योगिक विकास मंत्री सतीश महाना ने गौतमबुद्ध नगर की तीनों विकास प्राधिकरणों के मुख्य कार्यपालक अधिकारियों और चेयरमैन आलोक टंडन को इस हेतु तैयारियां करने का भी निर्देश दिया है। कोरोना के कारण चीन पसंदीदा मैन्‍युफैक्‍चरिंग हब होने की पहिचान और महत्व खोता रहा है। हजारों विदेशी कंपनियों की तरफ से भारत में अथॉरिटीज के साथ अलग-अलग स्‍तर पर वार्ता जारी है। जो कंपनियां भारत आने को उत्‍सुक हैं उनमें मोबाइल्‍स, इलेक्‍ट्रॉनिक्‍स, मेडिकल डिवाइसेज, टे‍क्‍सटाइल्‍स और सिंथेटिक फैब्रिक से जुड़ी कंपनियां शामिल हैं। कंपनियां अब भारत को अगली मैन्‍यूफक्‍चरिंग हब के तौर पर देख रही हैं। एक अधिकारी की मानें तो सरकार वर्तमान समय में 300 कंपनियों के साथ वार्ता में व्‍यस्‍त है। इन कंपनियों के साथ इनवेस्‍टमेंट प्रमोशन इकाई, केंद्र सरकार के विभागों के अलावा राज्य सरकारें बातचीत कर रही हैं।

आर्थिक नुकसान के लिए चीन से मुआवजा —–
अमेरिका के राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप का मानना है कि कोरोना का प्रसार उसके स्रोत पर ही रोका जा सकता था। ऐसी स्थिति में ये वायरस पूरी दुनिया में नहीं फैलता और ऐसा ही करना चाहिए था। इस पूरे मामले में एक गंभीर जांच की जा रही है और चीन की ज़िम्मेदारी तय करने के कई तरीके हैं। अमेरिका इस पर भी विचार कर रहा है कि क्या चीन से, कोरोना के कारण हुए आर्थिक नुकसान की भरपाई मांगी जा सकती है। जर्मनी ने भी कहा है कि कोराना वायरस के कारण हुए उस आर्थिक नुकसान को आंक कर कहा है कि इसकी भरपाई चीन को करनी चाहिए।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट किया कि “हम (अमेरिका) चीन से खुश नहीं हैं। हम पूरी स्थिति से नाखुश हैं, क्योंकि हमारा मानना है कि इस महामारी को इसके स्रोत पर ही रोका जा सकता था। ऐसे कई तरीके हैं, जिनसे आप उन्हें (चीन) जिम्मेदार ठहरा सकते हैं.”…हम इस बारे में बहुत ही गंभीर छानबीन कर रहे हैं। जर्मनी में बिल्ड टैबलॉयड है का मानना है कि कोरोना के कारण जर्मनी को करीब साढ़े 12 लाख करोड़ का नुकसान हुआ है। चूंकि इस सबका जिम्मेदार चीन है, इसलिए वो इसकी भरपाई करे।
इसी प्रकार, जर्मनी ने भी वायरस से हुए नुकसान के लिए चीन से यह मुआवजा मांगा है। जर्मनी ने चीन से 165 अरब डॉलर का मुआवजा देने की मांग की है। मुंबई के एक वकील आशीष सोहानी ने नीदरलैंड में अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय में एक याचिका दायर की, जिसमें चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और चार अन्य अधिकारियों पर आपराधिक लापरवाही, सूचनाओं को छिपाना आदि मामलों में मुकदमा दर्ज किया है। उनकी याचिका में लिखा गया है ”इसका एकमात्र कारण केवल राजनीतिक अस्पष्टता और चीनी अधिकारियों की लापरवाही है। वकील ने भारत सरकार और भारत के लोगों की जान और आर्थिक क्षति के लिए चीन से 2.5 ट्रिलियन डॉलर के मुआवजे की मांग की है।

चीन की जांच हो, ऑस्ट्रेलिया———-
ऑस्ट्रेलिया कोरोना वायरस के प्रसार को लेकर पूरी जांच चाहता है। क्योंकि वहां अधिकतर लोगों का मानना है कि कोरोना वायरस चीन के किसी मीट मार्केट से ही फैला है। ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन ने अमेरिका, फ्रांस और जर्मनी के नेताओं से बात की और इस बात पर जोर दिया गया कि एक ‘अंतरराष्ट्रीय गठबंधन’ बनाकर विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन (WHO) को वेपन इंस्पेक्टर जैसी ताकत देनी चाहिए ताकि ऐसी भयावह महामारी फिर कभी न फैले। ऑस्ट्रेलिया में चीन के राजदूत ने यह भी कहा कि इससे दोनों देशों के आर्थिक रिश्तों पर असर पड़ेगा। चीन ने विश्‍व स्‍तर पर हुई इस पहल पर नाराजगी जताते हुए इसे राजनीतिक कदम बताया है। चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि इस तरह के कदमों का असर महामारी के खिलाफ ‘लड़ाई’ पर पड़ेगा।
ऑस्ट्रेलिया के साथ चीन ने विश्वासघात किया है। चीन अपनी शर्तों पर ऑस्ट्रेलिया से व्यापार करना चाहता है परन्तु ऑस्ट्रेलिया अब चीन को महत्व नहीं देना चाहता। कोरोना वायरस की स्वतंत्र जांच के कारण जिससे चीन बुरी तरह उत्तेजित हो रहा है और ऑस्ट्रेलिया को खुलेआम धमकी भी देने लगा है। चीन ने ऑस्ट्रेलिया को धमकी दी है कि यदि उसने चीन विरोधी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रखा तो फिर चीन उसका आर्थिक बहिष्कार भी कर सकता है। चीनी राजदूत ने कहा कि “चीनी जनता ऑस्ट्रेलिया के व्यवहार से काफी रूष्ट है। जनता का मूड चीन में बद से बदतर होता जा रहा है, ऐसे देश में हम क्यों जाएं जो हमारा मित्र ही ना बन सके?” परन्तु ऑस्ट्रेलिया ने इन धमकियों के विरूद्ध ऑस्ट्रेलिया भी चुप नहीं रहा। प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन से पहले ऑस्ट्रेलिया के व्यापार मंत्री साइमन बर्मिंघम ने कहा कि चीन चाहे कुछ करे ऑस्ट्रेलिया अपने बयान पर कायम रहेगा। ऑस्ट्रेलिया में चीन विरोधी भावना इतनी बढ़ गयी है कि इस देश के विदेश मंत्री यहाँ तक कह चुके हैं कि वुहान वायरस की उत्पति के लिए स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।
ऑस्ट्रेलिया की विदेश मंत्री मारिसे पेने ने चीन के खिलाफ एक स्वतंत्र जांच की मांग की है, जिसमें COVID-19 की “उत्पत्ति” और वुहान में प्रकोप से निपटने के तरीकों की जांच हो सके। विदेश मंत्री मारिसे पेने ने कहा है कि कोरोना वायरस के संदर्भ में चीन की पारदर्शिता को लेकर उनकी चिंता बहुत महत्वपूर्ण है। ऑस्ट्रेलिया वैश्विक महामारी को लेकर जांच चाहता है जिसमें वुहान में कोरोना के पहले मामले आने के बाद चीन के एक्शन की भी जांच होनी चाहिए। स्वयं प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन चाहते हैं कि महामारी खत्म होने पर चीन के विरुद्ध एक निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच होनी ही चाहिए। ऑस्ट्रेलिया के लिए यह एक बहुत ही साहसिक कदम है, क्योंकि चीन ऑस्ट्रेलिया का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है जो कि उसकी अर्थव्यवस्था में 194.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य का आयात और निर्यात करता है। वहीं चीन ने भी ऑस्ट्रेलिया में काफी निवेश कर रखा है लेकिन अब ऑस्ट्रेलिया को भी चीन के इन निवेशों पर शक होने लगा है कि चीन जरूर कोई खेल खेल रहा है। इसी के मद्देनजर ऑस्ट्रेलिया ने अपने इनवेस्टमेंट के नियम कड़े किए थे जैसा यूरोप के कुछ देश और भारत भी कर चुका है।
चीन के विरोध में इस प्रकार की लहर चीन की किसी एक घटना की वजह से नहीं आया है। बीजिंग ने कोरोना वायरस के शुरू होने से पहले ऑस्ट्रेलिया के बाज़ारों से मास्क गायब करवा दिया था। यह रिपोर्ट आई थी कि चीनी सरकार समर्थित एक दिग्गज कंपनी ने गुपचुप तरीके से ऑस्ट्रेलिया में मास्क, हैंड सैनिटाइटर, वाइप्स और आवश्यक चिकित्सा के सामान थोक भाव में खरीदा और उन्हें चीन भेज दिया था। ये सब घटनाएँ अपने आप में बहुत गंभीर और बड़ी हैं और ये सब पिछले एक महीने के दौरान ही घटी हैं।
इसका मतलब स्पष्ट है कि अब चीन चाहकर भी अपनी गुंडागर्दी के बल पर दुनिया को नहीं झुका सकता और उसके दिन अब लद चुके हैं। ऑस्ट्रेलिया और चीन के संबंध में तेजी से मनमुटाव बढ़ा है। दोनों देशों के बीच दुश्मनी की शुरुआत हो चुकी है। अब देखना यह है कि ऑस्ट्रेलिया की ये नाराजगी चीन को कितनी भारी पड़ती है।
अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलपति हैं

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