Friday , 10 July 2020
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चीन की डेट-ट्रैप डिप्लोमेसी और भारत

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प्रो. रामदेव भारद्वाज

डेट ट्रैप डिप्लोमेसी (Debt Trap Diplomacy) का प्रयोग सामान्यतः कथित नकारात्मक अभिप्राय वाले देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों में लिए गए कर्ज के संदर्भ के आधार पर कूटनीति का वर्णन करने के लिए किया जाता है। इसमें एक ऋणदाता देश शामिल होता है, जो जानबूझकर किसी अन्य देनदार देश को अत्यधिक ऋण देता है, जब वह अपने कर्ज दायित्वों का सम्मान करने में असमर्थ हो जाता है, तो कर्जदार देश से आर्थिक या राजनीतिक रियायतें निकालने का कथित इरादा रखता है। ऋण की शर्तों को अक्सर लेनदार देश के ठेकेदारों को भुगतान करने के लिए इस्तेमाल किए गए ऋण के पैसे के साथ सार्वजनिक नहीं किया जाता है। डेट ट्रैप डिप्लोमेसी शब्द का प्रयोग वर्तमान पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के विदेशी ऋण योजना के साथ सबसे अधिक जुड़ा हुआ है। डेट ट्रैप डिप्लोमेसी के अंतर्गत चीन द्वारा विश्व के देशों को 375 लाख करोड़ रु. के कर्ज दिए हैंं। 150 देशों को चीन ने जितना कर्ज दिया, उतना तो वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ ने नहीं दिया। चीन ने 150 देशों को 1.5 ट्रिलियन डॉलर का लोन दिया, जबकि वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ ने 200 अरब डॉलर का दिया। चीन ने देशों को उनकी जीडीपी से 20% से ज्यादा कर्ज दिया। जिबुती इकलौता देश, जिस पर कुल कर्ज का 77% हिस्सा चीन का यूएन की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन ने 2018 में 139 अरब डॉलर का इन्वेस्टमेंट किया, ये आंकड़ा 2017 की तुलना में 4% ज्यादा है।

चीन की डेट-ट्रैप डिप्लोमेसी :::
आधारभूत संरचनात्मक विकास (Infrastructure Development) के नाम पर पहले कर्ज देना और फिर उस देश को एक तरह से कब्जा लेना की नीति को ‘डेट-ट्रैप डिप्लोमेसी’ कहते हैं। आजकल ये शब्द चीन के लिए ही इस्तेमाल होता है। चीन का तर्क है कि इससे छोटे और विकासशील देश में इन्फ्रास्ट्रक्चर मजबूत होगा। जबकि, उसके विरोधी मानते हैं कि चीन ऐसा करके छोटे देशों को कब्जा रहा है। अमेरिकी वेबसाइट हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू की रिपोर्ट बताती है कि, चीन शुरू से ही छोटे देशों को कर्ज देता रहा है। 1950 और 1960 के दशक में चीन ने बहुत से छोटे-छोटे देशों को कर्ज दिया। ये ऐसे देश थे, जहां कम्युनिस्ट सरकारें थीं। जर्मनी की कील यूनिवर्सिटी ने वर्ल्ड इकोनॉमी पर जून 2019 में एक रिपोर्ट जारी की थी। इसके मुताबिक, 2000 से लेकर 2018 के बीच देशों पर चीन की उधारी 500 अरब डॉलर से बढ़कर 5 ट्रिलियन डॉलर हो गई। आज के हिसाब से 5 ट्रिलियन डॉलर 375 लाख करोड़ रुपए होते हैं। इन सबके अलावा भी हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू की रिपोर्ट कहती है कि चीन की सरकार और उसकी कंपनियों ने 150 से ज्यादा देशों को 1.5 ट्रिलियन डॉलर यानी 112 लाख 50 हजार करोड़ रुपए का लोन भी दिया है। इस समय चीन दुनिया का सबसे बड़ा लेंडर यानी लोन देने वाला देश है। इतना लोन तो आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक ने भी नहीं दिया। दोनों ने 200 अरब डॉलर (15 लाख करोड़ रुपए) का लोन दिया है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो दुनियाभर की जीडीपी का 6% बराबर कर्ज चीन ने दूसरे देशों को दिया है।
एक दर्जन देशों पर उनकी जीडीपी का 20% से ज्यादा कर्ज चीन ने दिया। हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू की रिपोर्ट के मुताबिक, 2005 में चीन ने 50 से ज्यादा देशों को उनकी जीडीपी का 1% या उससे भी कम कर्ज दिया था, लेकिन 2017 के आखिर तक चीन उनकी जीडीपी का 15% से ज्यादा तक कर्ज देने लगा। इनमें से जिबुती, टोंगा, मालदीव, कॉन्गो, किर्गिस्तान, कंबोडिया, नाइजर, लाओस, जांबिया और मंगोलिया जैसे करीब दर्जन भर देशों को चीन ने उनकी जीडीपी से 20% से ज्यादा कर्ज दिया है।

चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स नीति :::
चीन की स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स (मोती की लड़ी) नीति के अंतर्गत संभावित चीनी इरादों पर एक भू-राजनीतिक सिद्धांत है हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) है। यह चीनी सैन्य और वाणिज्यिक सुविधाओं के नेटवर्क और संचार की समुद्री लाइनों के साथ संबंधों को संदर्भित करता है, जो कि चीन के मुख्य भू-भाग से लेकर हॉर्न ऑफ़ अफ्रीका में पोर्ट सूडान तक फैला हुआ है। समुद्री रेखाएं कई प्रमुख समुद्री चोक बिंदुओं से गुजरती हैं जैसे कि स्ट्रेट ऑफ़ मंडब, स्ट्रेट ऑफ़ मलक्का, स्ट्रेट ऑफ़ होमूर्ज़ और लोम्बोक, स्ट्रेट पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, मालदीव और सोमालिया में अन्य रणनीतिक समुद्री केंद्रों के साथ-साथ।
यह योजना, चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे और चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के अन्य भागों के साथ भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है। इस तरह की प्रणाली भारत को घेर लेगी और इसके बिजली प्रक्षेपण, व्यापार और संभावित क्षेत्रीय अखंडता के लिए खतरा उत्पन्न ‍करेगी। इसके अलावा, पाकिस्तान के भारत के पारंपरिक दुश्मन के लिए चीन का समर्थन और उसके ग्वादर पोर्ट को एक खतरे के रूप में देखा जाता है, आशंकाओं से ‍घिरा चीन एक विकसित हो सकता है। ग्वादर में विदेशी नौसैनिक सैन्य अड्डा, जो चीन को IOR में तेजी से युद्ध का संचालन करने की अनुमति दे सकता है। पूर्व से, क्युकुपी के गहरे पानी के बंदरगाह को भी इसी तरह की चिंता के साथ देखा जाता है। चीनी योजना का पहला व्यापक शैक्षणिक विश्लेषण और नई दिल्ली के लिए इसके सुरक्षा निहितार्थ को फरवरी २००-में एक सक्रिय-कर्तव्य भारतीय नौसेना अधिकारी द्वारा जाना जाता है। दिसंबर 2008 में हिंद महासागर में चीन की एंटी-पायरेसी नौसेना तैनाती और अगस्त 2017 में जिबूती में अपनी पहली विदेशी सेना के आगामी अधिग्रहण का विश्लेषण करते हुए, उनका विश्लेषण हिंद महासागर में चीन की “स्थायी सैन्य उपस्थिति” की भविष्यवाणी करता है, जिसे भारतीय नीति निर्माताओं द्वारा प्रस्तुतकर्ता के रूप में देखा जाता है। तदनुसार, भारत तब से कथित खतरे का सामना करने के लिए कई तरह के कदम उठा रहा है।

भारत की लुक ईस्ट पालिसी :::
चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ का जवाब भारत की ‘लुक ईस्ट पालिसी’ (Look East Policy) को समझा जाता है। लुक ईस्ट पॉलिसी या पूर्व की ओर देखो नीति पूर्व एशियाई क्षेत्र में मजबूती हासिल करने की भारत की सामरिक आर्थिक नीतियों में से एक है। इस नीति के तहत भारत का प्रयास इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को काटना है। दूसरे शब्दों में, लुक ईस्ट पॉलिसी दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के साथ व्यापक, आर्थिक और सामरिक संबंधों को विकसित करने का प्रयास है ताकि इस क्षेत्र में क्षेत्रीय शक्ति के रुप में खुद को स्थापित कर सके। इसका आरम्भ 1991 में प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिंह राव के शासन काल में हुआ। बाद की अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह की सरकारों ने भी इसे कड़ाई से अपनाया। इस नीति के तहत भारत ने एशियन टाईगर और टाईगर कब अर्थव्यवस्थाओं के साथ अच्छे संबंध स्थापित किए हैं। भारत ने श्रीलंका, थाईलैंड और अन्य पूर्व एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के साथ मुक्त व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर किए, जिनमें सिंगापुर के साथ व्यापक आर्थिक सहयोग करार और थाईलैंड के साथ शीघ्र फसल योजना शामिल हैं। लोकतंत्र, मानवाधिकार और सामरिक हितों पर जोर देते हुए ताईवान, जापान और दक्षिण कोरिया के साथ संबंधों को मजबूत किया गया है। दक्षिण कोरिया और जापान भारत में भारी विदेशी निवेश का स्रोत बने हुए हैं। दूसरी ओर पूर्व एशियाई अर्थव्यवस्थाएं भी भारत के साथ सहयोग में रुचि दिखाती हैं।

दक्षिण एशियाई देशों को दिया कर्ज :::
चीन द्वारा भारत की घेराबन्दी की दृष्टि से दक्षिण एशिया के सामरिक महत्व के क्षेत्रों में अपना विस्तार किया है। सामुद्रिक अड्डों के अंतर्गत, पाकिस्तान में ग्वादार, श्रीलंका में हम्बनटोटा, मालदीव में माराओ,
बांग्लादेश में चटगांव, म्यांमार में कोको द्वीप, कंबोडिया व थाईलैंड में प्रभुत्व स्थापित कर लिया है। इन क्षेत्रों में चीन की एयरबेस, सर्विलांस सिस्टम, बंदरगाह व हवाई पट्टी शामिल हैं। चीन की तेल ठिकाने पर कब्जे की महत्वाकांक्षा बहुत पुरानी है। दक्षिण चीन सागर में स्पार्टली द्वीप को लेकर चीन का जापान और वियतनाम के साथ मलेशिया और इंडोनेशिया के साथ विवाद चल रहा है। भारत के अक्साईचिन और पाकिस्तान के पीओके के बीच कराकोरम सड़क मार्ग बना चुका है। इसी रास्ते से चीन और पाक के बीच द्विपक्षीय व्यापार होता है।
श्रीलंका ‘मोतियों की लड़ी’-स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स String of Pearls- का एक हिस्सा है। यह लड़ी हिंद महासागर क्षेत्र में चीनी इरादों का एक बहुत पुराना भू-राजनीतिक सिद्धांत है, जो चीनी मुख्य भू-भाग और पोर्ट सूडान के बीच पड़ने वाले देशों में चीन द्वारा विकसित की गई सैन्य और व्यापारिक सुविधाओं के नेटवर्क की स्थापना की ओर इंगित करती है।
चीन, इकोनॉमिक पावर के दम पर सदैव कमजोर देशों को निशाना बनाता है और उन्‍‍हें कर्ज देकर अपनी जाल में फंसाता है। चीन की इस जाल में भारत के पड़ोसी पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश को कर्ज देकर अपनी जाल में फंसाता है। चीन की इस जाल में भारत के पड़ोसी पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश और नाइजीरिया समेत अन्य कई देश बुरी तरह फंसे हुए हैं। लेकिन अब श्रीलंका इससे बाहर निकलने की कोशिश में लगा है। इसके लिए श्रीलंका ने भारत से भी मदद मांगी है। इसी प्रकार चीन हिंद महासागर में भारत को घेरना चाहता है और अपना एकाधिकार स्थापित करना चाहता है।

पाकिस्तान—
पाकिस्तान द्वारा करीब 60 अरब डॉलर के China–Pakistan Economic Corridor– CPEC के लिए दिसंबर, 2019 तक चीन से करीब 21.7 अरब डॉलर कर्ज ले चुका है। विशेषज्ञों ने आशंका जताई है कि अपनी लगातार गिरती अर्थव्यवस्था से जूझ रहा पाकिस्तान इस कर्ज को उतारने के लिए पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) का कुछ हिस्सा चीन को सौंप सकता है। पाकिस्तान ने अगस्त 2018-19 के बीच विदेश से 2804 अरब रुपए का और घरेलू स्रोतों से 4705 अरब रुपए का कर्ज लिया था। वहीं, पाकिस्तानी स्टेट बैंक के मुताबिक मौजूदा वित्तीय वर्ष के पहले दो महीनों में पाकिस्तान के सार्वजनिक कर्ज में 1.43 फीसदी का इजाफा हुआ है, जिससे संघीय सरकार का यह कर्ज बढ़कर 32,240 अरब रुपए हो गया है और अगस्त 2018 में यह कर्ज बढ़कर 24,732 अरब रुपए था, लेकिन मौजूदा वित्तीय वर्ष के पहले तीन महीने में सरकार का कर संग्रह 960 अरब रुपए का रहा, जो कि 10 खरब रुपए के लक्ष्य से कम है।
चीन पाकिस्तान में CPEC के मध्यम से घुसपैठ करने के बाद पाकिस्तान को अपना गुलाम बनाने की योजना बना रहा है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) एक बहुत बड़ी वाणिज्यिक परियोजना है, जिसका उद्देश्य दक्षिण-पश्चिमी पाकिस्तान से चीन के उत्तर-पश्चिमी स्वायत्त क्षेत्र शिंजियांग तक ग्वादर बंदरगाह, रेलवे और हाइवे के माध्यम से तेल और गैस की कम समय में वितरण करना है। आर्थिक गलियारा चीन-पाक संबंधों में केंद्रीय महत्व रखता है, गलियारा ग्वादर से काशगर तक लगभग 2442 किलोमीटर लंबा है। यह योजना को संपूर्ण होने में काफी समय लगेगा। इस योजना पर 46 बिलियन डॉलर लागत का अनुमान किया गया है। यह गलियारा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर,
गिलगित-बाल्टिस्तान और बलूचिस्तान होते अधिकृृृत कश्मीर, गिलगित-बाल्टिस्तान और बलूचिस्तान होते हुए जायेगा। विविध सूचनाओं के अनुसार ग्वादर बंदरगाह को इस तरह से विकसित किया जा रहा है, ताकि वह 19 मिलियन टन कच्चे तेल को चीन तक सीधे भेजने में सक्षम होगा। चीन के लिए सीपेक के साथ-साथ चीन ने पाकिस्तान में ना सिर्फ 5 लाख चीनी नागरिकों को बसाने की भी योजना बना रहा है और अब पाकिस्तान में चीनी करेंसी भी चलाने की योजना को भी अमलीजामा पहनाने जा रहा है। अर्थात् पाकिस्तानी रुपए और डॉलर के बाद अब चीनी युआन भी पाकिस्तान में लीगल टेंडर बन जाएगा और पाकिस्तान अपने प्रभुत्व से समझौता करके चीन को प्रोत्साहित कर रहा है।
चीन की डेट-ट्रैप डिप्लोमेसी का उद्देश्य दक्षिण एशिया के राष्ट्रों को चीन कर्ज देकर उन पर अपना अधिपत्य स्थापित करता है। चीन 2013 से चीन बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। इस प्रोजेक्ट का मकसद एशिया, यूरोप और अफ्रीका को सड़क, रेल और समुद्री रास्ते से जोड़ना है। इस पूरे प्रोजेक्ट पर 1 ट्रिलियन डॉलर यानी 75 लाख करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है। चीन के इस प्रोजेक्ट को जो देश समर्थन दे रहा है, उनमें से ज्यादातर अब चीन के कर्जदार बन गए हैं। चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर या CPIC भी इसी प्रकल्प का हिस्सा है। इस पर चीन और पाकिस्तान दोनों मिलकर काम कर रहे हैं। ये कॉरिडोर चीन के काशगर प्रांत को पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट से जोड़ता है। इसकी लागत 46 अरब डॉलर (करीब 3.50 लाख करोड़ रुपए) है। इसमें भी करीब 80% खर्च अकेले चीन कर रहा है। नतीजा-पाकिस्तान धीरे-धीरे चीन का कर्जदार बनता जा रहा है। आईएमएफ के मुताबिक, 2022 तक पाकिस्तान को चीन को 6.7 अरब डॉलर चुकाने हैं।

श्रीलंका—
श्रीलंका के राष्ट्रपति महेंद्रा राजपक्षे के कार्यकाल (2005-15) में श्रीलंका की भारत से दूरी बढ़ी और श्रीलंका की चीन से नजदीकियां बढ़ीं। राजपक्षे के कार्यकाल में ही श्रीलंका ने चीन की मदद से हम्बनटोटा बंदरगाह प्रोजेक्ट पर काम शुरू हुआ। इस प्रकल्प के लिए 2007 से 2014 के बीच श्रीलंकाई सरकार ने चीन से 1.26 अरब डॉलर का कर्ज लिया। ये कर्ज एक बार में नहीं बल्कि 5 बार में लिया गया। हम्बनटोटा बंदरगाह पहले से ही चीन-श्रीलंका मिलकर बना रहे थे। इसे चीन की सबसे बड़ी सरकारी कंपनी हार्बर इंजीनियरिंग ने बनाया है। जबकि, इसमें 85% पैसा चीन के एक्जिम बैंक ने लगाया था। लगातार ऋण लेने के परिणामस्वरूप श्रीलंका पर विदेशी कर्ज बढ़ता गया औऱ कर्ज बढ़ने की वजह से श्रीलंका को दिसंबर 2017 में हम्बनटोटा बंदरगाह चीन की मर्चेंट पोर्ट होल्डिंग्स लिमिटेड कंपनी को 99 साल के लिए लीज पर देना पड़ा। बंदरगाह के साथ ही श्रीलंका को 15 हजार एकड़ जमीन भी उसे सौंपनी पड़ी। ये जमीन भारत से 150 किमी दूर ही है। इस पूरे घटनाक्रम को एक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है कि कैसे चीन पहले छोटे देश को इन्फ्रास्ट्रक्चर के नाम पर कर्ज देता है। उसे अपना कर्जदार बनाता है और फिर बाद में उसकी संपत्ति को कब्जा लेता है।
चीन ने श्रीलंका पर अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए नए कर्ज का प्रस्ताव दिया है। चीन के एक बड़े बैंक ने 30 करोड़ डॉलर (करीब 2,100 करोड़ रुपये) का लोन देने की पेशकश की है। इस लोन को एक अरब डॉलर तक बढ़ाया जा सकता है।

नेपाल–
नेपाल चीन के परकल्पों का समर्थन कर रहा है। अक्टूबर 2019 में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग दो दिन के दौरे पर जब नेपाल गए थे। वह 23 साल बाद पहला मौका था, जब चीन के किसी राष्ट्रपति ने नेपाल का दौरा किया। इस दौरे में जिनपिंग ने नेपाल को इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के लिए 56 अरब नेपाली रुपए (35 अरब रुपए) की मदद देने का ऐलान किया था। पाकिस्तान, नेपाल और श्रीलंका की तरह बांग्लादेश भी चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव प्रोजेक्ट का हिस्सा है। जनवरी 2019 तक चीन और बांग्लादेश के बीच 10 अरब डॉलर का कारोबार हो रहा था। ऐसा अनुमान है कि 2021 तक दोनों देशों के बीच 18 अरब डॉलर का कारोबार होने लगेगा। बांग्लादेश का चीन के प्रोजेक्ट का हिस्सा बनना इसलिए भी चिंता का कारण है क्योंकि ये कोलकाता के बेहद करीब से गुजरेगा।

मालदीप—
चीन हिन्द महासागर में अपना प्रभाव बढ़ाने एवं चीन वैश्विक व्यापार और अधोसंरचना योजना के लिए ऋण देकर मालदीप में तेज़ी से अपना विस्तार कर रहा है। 1200 द्वीपों वाला 90 हज़ार वर्ग किलोमीटर का यह देश समुद्री जहाजों का महत्वपूर्ण मार्ग है। भारत और चीन दोनों चाहते हैं कि उनकी नौसैनिक रणनीति के दायरे में यह इलाक़ा रहे। मालदीप के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन ने चीन की आर्थिक मदद से मालदीव में निर्माण कार्य शुरू किया। यामीन ने चीन से कई परियोजनाओं के लिए समझौते किए हैं, जिनमें राजधानी माले में एक एयरपोर्ट भी शामिल है। यामीन के कार्यकाल में चीन ने मालदीव में भारी निवेश किया है। सेंटर फोर ग्लोबल डिवेलपमेंट के अनुसार इसमें 83 करोड़ डॉलर का एयरपोर्ट भी शामिल है। इसके साथ ही 2 किलोमीटर का एक ब्रिज़ भी है जो एयरपोर्ट द्वीप को राजधानी माले से जोड़ेगा। चीन मालदीव में 25 मंजिला अपार्टमेंट और हॉस्पिटल भी बना रहा है। साउथ चाइन मॉर्निंग पोस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार 2019 में तीन लाख 6 हज़ार चीनी पर्यटक मालदीव गए। मालदीव में आने वाले कुल पर्यटकों का यह 21 फ़ीसदी है। परन्तु अगस्त 2029 में जब चीनी नौसैनिक जहाज माले पहुंचे तो भारत की चिंता और बढ़ गई थी। एशियाई सुरक्षा पर काम कर रही ‘थिंक टैंक सिक्यॉरिटी रिस्क ऑफ़ एशिया’ के अनुसार मालदीव की तरफ़ से भारत को हेलिकॉप्टर ले जाने के लिए कहना भारत की सैन्य और राजनयिक नीतियों के लिए आघात है।

बांग्लादेश—
दक्षिण एशिया में बांग्लादेश, पाकिस्तान के बाद चीनी निवेश पाने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश है। चीन के इस निवेश को लेकर सब लोग बहुत आशावान हो, ऐसा भी नहीं है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि चीन के पैसे पर बढ़ती निर्भरता ढाका को बीजिंग के आगे कमजोर कर सकती है। चीन और बांग्लादेश ने बांग्लादेश-चीन-भारत-म्यांमार (BCIM) के मध्य एक इकोनॉमिक कॉरिडोर परियोजना में चीन द्वारा तीव्रता लाने की इच्छा भी जाहिर की है। BCIM परियोजना का मकसद चारों देश के बीच आर्थिक संबंधों को विस्तार देना है। इन चारों देशों में कुल आबादी 3 अरब के करीब है।
चीन द्वारा भारत के करीबी माने जाने वाले बांग्लादेश को बिजली क्षेत्र के लिए तकरीबन 1.7 अरब डॉलर का कर्ज देने दिया है। इस समझौते समेत चीन और बांग्लादेश के बीच अरबों डॉलरों के कई समझौते हुए हैं। चीन और बांग्लादेश के मध्य परस्पर संबंध 2016 से रणनीतिक साझेदारियों में बदल गए औऱ चीन द्वारा बांग्लादेश में किए जाने वाले निवेश में काफी बढ़ोत्तरी देखी गई है। दोनों देशों के बीच बेल्ट और रोड इनीशिएटिव (BRI) के तहत 21.5 अरब डॉलर के ऊर्जा और बुनियादी ढांचों से जुड़ी परियोजनाओं पर सहमति हुई। ब्रिटेन के स्टैंडर्ड चार्टड बैंक का अनुमान है कि अब तक बांग्लादेश में बीआरआई से जुड़ा तकरीबन 38 अरब डॉलर का निवेश हुआ है।
यूनाइटेड नेशंस कॉन्फ्रेंस ऑन ट्रेड एंड डेवलपमेंट के अनुसार 2018 में बांग्लादेश में रिकॉर्ड विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) दर्ज किया गया। लगभग 3.8 अरब डॉलर बतौर FDI आए जो साल 2017 की तुलना में 68 फीसदी अधिक था। कुल एफडीआई में एक तिहाई हिस्सा चीन का था, जिसने करीब एक अरब डॉलर का निवेश किया। बांग्लादेश अब साल 2022 तक 24 हजार मेगावाट बिजली उत्पादन के अपने महत्वाकांक्षी ऊर्जा लक्ष्यों को पूरा करने के लिए चीन पर निर्भर हो रहा है। मौजूदा समय में बांग्लादेश महज 17 हजार मेगावाट का उत्पादन कर रहा है। इसके अलावा पद्मा नदी पर रोड-रेल प्रोजेक्ट के तहत बना पद्मा पुल भी चीन की इंजीनियरिंग कंपनी ने तैयार किया है। वहीं चीन का एक्सिम बैंक भी पुल के साथ रेल लिंक निर्माण के लिए 3 अरब डॉलर की राशि मुहैया करने को तैयार है। चीन के बांग्लादेश में अतिरिक्त निवेश का स्वागत हो रहा है क्योंकि ये पैसे का नया स्रोत है। क्योंकि बांग्लादेश जैसी उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के लिए पैसे के पारंपरिक स्रोत पर्याप्त नहीं है। चीन के बांग्लादेश में निवेश के करण इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धी माहौल बना है। ये जापान और भारत जैसे देशों को आगे आकर निवेश करने के लिए प्रोत्साहन देगा। वहीं बांग्लादेश ने साल 2030 तक 100 स्पेशल इकोनॉमिक जोन (विशेष आर्थिक क्षेत्र) बनाने की घोषणा की है। चीनी कंपनियों ने इसमें भी निवेश की इच्छा जताई है।

भूटान पर चीन की नजर :::
भूटान एक ऐसा देश है जिससे चीन का राजनीतिक संबंध नहीं के बराबर है। लेकिन जब से भारतीय में चीनी राजदूत लुओ झाउहु जून 2019 थिम्पू के दौरे पर हैं। चीन और भूटान के बीच बढ़ते राजनीतिक संबंध भारत के लिए परेशानी खड़े कर सकते हैं, वहीं थिम्पू की नई सरकार चीन के साथ रिश्ते को सुधारने में लगी है जिससे भूटान की अर्थव्यवस्था को बल मिल सके। यद्पि भूटान अपना 98 % निर्यात भारत को करता है और करीब 90 % सामान भी भारत से ही आयात करता है। भारतीय सेना भूटान की शाही सेना को प्रशिक्षण देती रही है। ये बातें भी चीन को कहीं न कहीं परेशान करती रही हैं। भूटान एक ऐसा पड़ोसी देश है जो बेल्ट एंड रोड इनिशटिव (BRI) में शामिल नहीं है।BRI चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना है और यह यूरोप, एशिया के साथ अफ्रीका के भी कुछ हिस्से से होकर गुजरेगी। इसका एक हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से होकर गुजर रहा है जिसपर भारत ने ऐतराज जताया है।

अफ्रीकी देशों को दिया कर्ज :::
कर्ज देने के लिए चीन की पहली पसंद अफ्रीकी देश हैं। इसका कारण है कि ज्यादातर अफ्रीकी देश गरीब और छोटे हैं और विकासशील भी। अक्टूबर 2018 में आई एक स्टडी बताती है कि हाल के कुछ सालों में अफ्रीकी देशों ने चीन से ज्यादा कर्ज लिया है। 2010 में अफ्रीकी देशों पर चीन का 10 अरब डॉलर (आज के हिसाब से 75 हजार करोड़ रुपए) का कर्ज था। जो 2016 में बढ़कर 30 अरब डॉलर (2.25 लाख करोड़ रुपए) हो गया। अफ्रीकी देश जिबुती, दुनिया का इकलौता कम आय वाला ऐसा देश है, जिस पर चीन का सबसे ज्यादा कर्ज है। जिबुती पर अपनी जीडीपी का 80% से ज्यादा विदेशी कर्ज है। इसमें भी जितना कर्ज जिबुती पर है, उसमें से 77% से ज्यादा कर्ज अकेला चीन का है। हालांकि, कर्ज कितना है? इसके आंकड़े मौजूद नहीं है। चीन सिर्फ कर्ज ही नहीं देता अपितु इन्वेस्टमेंट भी कर रहा है। जून 2019 में यूएन कॉन्फ्रेंस ऑन ट्रेड एंड डेवलपमेंट -UNCTAD– की रिपोर्ट के अनुसार 2018 में दुनियाभर के देशों ने 1.3 ट्रिलियन डॉलर (आज के हिसाब से 97.50 लाख करोड़ रुपए) का इन्वेस्टमेंट किया था। ये आंकड़ा 2017 की तुलना में 13% कम था। दुनिया के कई देशों ने 2018 में अपना पूंजीनिवेश घटा दिया था। इसके उलट दूसरे देशों में चीन का इन्वेस्टमेंट 4% तक बढ़ा था। चीन ने 2017 में 134 अरब डॉलर का पूंजी निवेश किया था और 2018 में 139 अरब डॉलर का। जबकि, अमेरिका का पूंजी निवेश घटकर 252 अरब डॉलर हो गया था।
कोरोना महामारी के बीच चीन के खिलाफ यूरोप और अमेरिका में ही नहीं अब अफ्रीकी देशों में भी आवाज बुलंद होने लगी है। समाचार एजेंसी एएनआई की रिपोर्ट में कहा गया है कि सभी अफ्रीकी देश अब चीन की ओर से मुहैया कराए गए फंडों और उसके निवेशों के फायदे और नुकसान का बारीकी से आकलन कर रहे हैं। महामारी से जूझ रहे स्थानीय लोग पूरे अफ्रीका में चीन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। लोगों की मांग है कि चीन के साथ सभी आर्थिक संबंधों को पूरी तरह से खत्म किया जाए क्योंकि चीनी फंड बेहद महंगे साबित हो रहे हैं। इन घटनाओं ने चीन और अफ्रीकी देशों के कारोबारी रिश्तों पर गहरा आघात किया है। अफ्रीकी देशों के साथ व्यापार और कारोबारी रिश्तों को बनाने में चीन को दशों का समय लग गया था। आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि साल 2019 में चीन और अफ्रीकी देशों के बीच 208 अरब डॉलर का कारोबार हुआ था। धीरे-धीरे चीन अफ्रीकी देशों में कई इंफ्रास्ट्रक्चर परियोंजनाएं शुरू करने लगा था। इसे लेकर अमेरिका ने अफ्रीकी देशों को आगाह भी किया था और इसको चाइनीज डे‍बिट ट्रैप डिप्लोमेसी (Chinese debt trap diplomacy) करार दिया था।

भारत पर भी चीन का कर्ज?
वित्त मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, दिसंबर 2019 तक भारत पर 40 लाख 18 हजार 389 करोड़ रुपए का विदेशी कर्ज है। यद्धपि किस देश का कितना कर्ज है? इसके आंकड़े अप्राप्त हैं। परन्तु दवाओं के कच्चे माल के लिए भारत की चीन पर निर्भरता है। भारत प्रति वर्ष 65% से ज्यादा माल चीन से खरीदताा है। भारत-चीन के बीच अप्रैल 2019 से फरवरी 2020 के बीच 5.50 लाख करोड़ रुपए का कारोबार, चीन से 4.40 लाख करोड़ का सामान खरीदा। थिंक टैंक गेटवेहाउस के अनुसार यूनिकॉर्न क्लब में शामिल 30 में से 18 स्टार्टअप में चीनी कंपनियों की हिस्सेदारी है। फिक्की की रिपोर्ट के मुताबिक 45% इलेक्ट्रॉनिक आइटम और 27% ऑटो पार्ट्स भी चीन से आते हैं।
मिनिस्ट्री ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री आंकड़े इंगित करते हैं कि अप्रैल 2019 से लेकर फरवरी 2020 के बीच भारत-चीन के बीच 5 लाख 50 हजार करोड़ रुपए का कारोबार हुआ। इसमें से भारत ने तो सिर्फ 1.09 लाख करोड़ का सामान चीन को बेचा, जबकि इससे चार गुना अर्थात् 4.40 लाख करोड़ रुपए का सामान चीन से खरीदा। अमेरिका के बाद चीन हमारा दूसरा सबसे बड़ा कारोबारी देश है। चीन व्यापारिक एवं निवेश की दृष्टि से भारत में अपनी जड़ें जमा चुका है। इससे एकदम उभरना, छुटकारा पाना कठिन तो है परन्तु दुष्कर नहीं। धीरे-धीरे भारत आत्म निर्भरता और स्वदेशी की दिशा में उन्नत होगा तभी चीन के प्रभाव से छुटकारा संभव होगा। क्योंकि (1) जरूरी दवाइयों के लिए 65% से ज्यादा कच्चा माल चीन से आता है।
रासायनिक मंत्री डीवी सदानंद गौड़ा ने संसद में बताया कि भारत जरूरी दवाइयों को बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल के लिए चीन पर निर्भर है। 2016-17 से लेकर 2018-19 तक दवाइयों के लिए जितना कच्चा माल दूसरे देशों से भारत ने खरीदा था, उसमें से 65% चीन से आया था। 2018-19 में भारत ने कुल 3.56 अरब डॉलर यानी 26 हजार 700 करोड़ रुपए का कच्चा माल खरीदा था। इसमें से 2.40 अरब डॉलर अर्थात् 18 हजार करोड़ रुपए का माल चीन से आया था।

(2) चीन ने भारत में विगत 6 वर्षों में 13 हजार करोड़ रुपए निवेश किए हैंं। मिनिस्ट्री ऑफ कॉमर्स के तहत आने वाले डिपार्टमेंट फॉर प्रमोशन ऑफ इंडस्ट्री एंड इंटरनल ट्रेड के आंकड़ों के आधार पर भारत में FDI के माध्यम से सबसे ज्यादा निवेश सिंगापुर से आता है। सिंगापुर ने पिछले तीन साल में 2.94 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का निवेश किया है। जबकि, भारत में सबसे ज्यादा निवेश करने वाले देशों में चीन 18वें नंबर पर है। चीन ने 2019-20 में 1 हजार 157 करोड़ रुपए इन्वेस्ट किए। वहीं, 2014-15 से लेकर 2019-20 के बीच 6 सालों में चीन से 12 हजार 916 करोड़ रुपए का निवेश आया।
(3) स्टार्टअप में भी चीनी कंपनियों की हिस्सेदारी : चीन का FDI भले ही कम हो, लेकिन वहां की कई कंपनियों की हिस्सेदारी भारत के स्टार्टअप्स में है। थिंक टैंक गेटवे हाउस की रिपोर्ट के अनुसार यूनिकॉर्न क्लब में शामिल भारत के 30 में से 18 स्टार्टअप में चीन का पैसा लगा है। यूनिकॉर्न क्लब (Unicorns Startup) में वो startups होते हैंं जिनका Market Value 1 बिलियन डॉलर से अधिक होता है। OLA की OLA Electronic यूनिकॉर्न स्टार्टअप की लिस्ट में शामिल हैंं। इस लिस्ट में Tomato, Singh, Policy Bazar, Paytm Mall, Fresh Work, BYJU’s आदि भी हैंं। चीनी कंपनियों के भारतीय स्टार्टअप में इन्वेस्ट करने की तीन वजह हैं। पहली- देश की कोई बड़ी कंपनी या ग्रुप स्टार्टअप में इन्वेस्ट नहीं करते। दूसरा- जब कोई स्टार्टअप घाटे में जाता है, तो चीनी कंपनियां उसमें हिस्सेदारी खरीद लेती हैं और उसे सपोर्ट करती हैं। तीसरा- भारत का बड़ा मार्केट। गेटवे हाउस के मुताबिक, चीन की सबसे बड़ी ई-कॉमर्स कंपनी अलीबाबा, टिकटॉक बनाने वाली बाइटडांस और टेक कंपनी टेन्सेंट ही भारत के 92 स्टार्टअप को फंडिंग करती हैं। इनमें पेटीएम, फ्लिपकार्ट, बायजू, ओला और ओयो जैसे स्टार्टअप भी शामिल हैं।
(4) देश के टॉप-5 स्मार्टफोन ब्रांड में 4 चीन के रिसर्च फर्म काउंटर प्वाइंट की रिपोर्ट के मुताबिक, 2020 की पहली तिमाही यानी जनवरी से मार्च के बीच भारतीय स्मार्टफोन मार्केट में चीनी कंपनियों की हिस्सेदारी 70% से भी ज्यादा है। भारत का स्मार्टफोन मार्केट करीब 2 लाख करोड़ रुपए का है। देश के टॉप-5 स्मार्टफोन ब्रांड में से 4 चीन के हैं। सबसे ज्यादा 30% मार्केट शेयर श्याओमी का है। दूसरे नंबर पर 17% मार्केट शेयर के साथ वीवो है। टॉप-5 में सिर्फ सैमसंग ही है, जो दक्षिण कोरियाई कंपनी है। सैमसंग का मार्केट शेयर भारत में 16% है।
(5) ऐप मार्केट में भी 40% हिस्सा चीनी ऐप्स का लगा है। भारतीय मार्केट में न सिर्फ चीनी कंपनियों के स्मार्टफोन, बल्कि चीनी ऐप्स भी काफी पॉपुलर हैं। एक अनुमान के मुताबिक, भारतीय ऐप मार्केट में 40% तक हिस्सा सिर्फ चाइनीज ऐप्स का है। चीन की कंपनियां सस्ते स्मार्टफोन भारत में लॉन्च करती हैं और भारतीयों को यही पसंद आते हैं। मार्केट रिसर्च फर्म टेकआर्क के मुताबिक, दिसंबर 2019 तक भारत में 50 करोड़ से ज्यादा लोग स्मार्टफोन इस्तेमाल कर रहे थे। ज्यादा स्मार्टफोन तो ज्यादा ऐप्स भी डाउनलोड। टिकटॉक, जिसको कई बार बैन करने की मांग उठती रही है, उसे 12 करोड़ से ज्यादा भारतीय चलाते हैं। कैमस्कैनर ऐप के भी भारत में 10 करोड़ से ज्यादा यूजर हैं।
(6) कपड़ों, टीवी में भी चाइनीज माल चीन पर हमारी डिपेंडेंसी के कई उदाहरण हैं। इसी साल फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री की एक रिपोर्ट आई थी, उसके मुताबिक हमारी गाड़ियों में लगने वाले 27% ऑटो पार्ट्स चीन से आते हैं।
(7) भारत में 45% इलेक्ट्रॉनिक आइटम्स चीन से आते हैं। जबकि, टीवी, रेफ्रिजरेटर, वॉशिंग मशीन और एसी बनाने में यूज होने वाले 70% कंपोनेंट भी चीन से ही आते हैं। इतना ही नहीं, हर साल देश में करीब साढ़े तीन हजार करोड़ रुपए का सिंथेटिक धागा, ढाई हजार करोड़ रुपए का सिंथेटिक कपड़ा और करीब एक हजार करोड़ रुपए के बटन, जिपर, हैंगर और निडिल जैसे छोटे सामान भी हम चीन से खरीदते हैं।

विश्व के सर्वाधिक कर्जदार देश :::
देशों के बीच कर्ज के लेन-देन के सभी नियम वर्ल्ड बैंक द्वारा बनाए गए हैं। जिनके अनुसार कोई देश कर्ज अगर लेता है तो उसे ब्याज दरों के हिसाब से उसे वापिस भी लौटाना पड़ता है। यह प्रक्रिया पूरी तरह से एक साधारण बैंक लोन की ही तरह है, जिसमें अगर कोई व्यक्ति पैसे ले तो उसे ब्याज के साथ-साथ मूल एक बताए गए समय लौटाना होता है। आज विश्व मे ज्यादा कर्ज है उनमें (1) जापान- जापान विश्व का सबसे शक्तिशाली और आधुनिक देश माना जाता है लेकिन क्या आपको पता है ‍कि यह आधुनिक देश बहुत बड़े कर्जे में डूबा हुआ है। जापान पर कुल ८.८ लाख करोड़ डॉलर का कर्ज है। अगर इसका अंदाजा लगाया जाए तो जापान अपनी जीडीपी से करीब २६४ गुना ज्यादा कर्ज में डूबा हुआ है। (2) ग्रीस– ग्रीस पर कुल ३५,२७० करोड़ डॉलर का कर्ज है यानी अपनी जीडीपी से १७३ फीसदी ज्यादा। एक पल को जापान के अपना कर्जा चुकाने के आसार फिर भी नजर आते हैं लेकिन ग्रीस के लिए यह उम्मीद काफी कम है। (3) इटली–इटली पर अपनी जीडीपी से १३४ गुना ज्यादा कर्ज है, जिसका मतलब है की ईटली को वर्ल्ड बैंक को लगभग २.४१ करोड़ रुपए चुकाने होंगे। (4) जमैका–जमैका एक अरबी देश होने के बावजूद भी जमैका काफी ज्यादा कर्जे में डूबा हुआ है।बता दे की यह देश कैरेबियन देशों में सबसे ज्यादा कर्जदार देश है जिस पर करीब २ लाख करोड़ डॉलर का कर्ज है। जमैका विश्व का सबसे धीमी गति से ग्रोथ करने वाला विकासशील देश है। (5) लेबनान–लेबनान एक ऐसा देश है जिस पर कर्जा कम होने की बजाय बढ़ता ही चला जा रहा है। लेबनान पर ६९०० करोड़ डॉलर का कर्ज है जो की उसकी जीडीपी से करीब 132 फीसदी ज्यादा है। विश्व में कई और ऐसे देश हैं जो अपने आप से कई गुना ज्यादा कर्जे में डूबे हुए हैं। इन देशों को अपनी जीडीपी से 100 गुना ज्यादा कर्जा चुकाना है। जिसे अगर उन्होंने नहीं भरा तो शायद उनकी निलामी तक कर दी जाए।
लेखक अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलपति हैं

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