Thursday , 6 August 2020
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घुटन से बचा सकता है मास्क पर इस हर्बल स्प्रे का छिड़काव

उमाशंकर मिश्र

हर्बल डीकन्जेस्टैंट

Twitter handle :@usm_1984

कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए मास्क के उपयोग पर जोर दिया जा रहा है। पुलिस, डॉक्टर, स्वास्थ्यकर्मियों और अन्य आवश्यक सेवाओं से जुड़े कर्मचारियों को लंबे समय मास्क लगाना पड़ रहा है, जिससे उन्हें कई बार सांस लेने में घुटन महसूस होती है। भारतीय वैज्ञानिकों ने एक हर्बल डीकन्जेस्टैंट स्प्रे विकसित किया है, जो इस समस्या से निजात दिलाने में मददगार हो सकता है। यह हर्बल डीकन्जेस्टैंट स्प्रे किसी इन्हैलर की तरह काम करता है, जिसे नेशनल बोटैनिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (एनबीआरआई) के शोधकर्ताओं द्वारा तैयार किया गया है। लखनऊ स्थित एनबीआरआई काउंसिल ऑफ साइंटिफिक ऐंड इंडस्ट्रियल रिसर्च की एक प्रयोगशाला है, जिसे मुख्य रूप से वनस्पतियों पर किए जाने वाले उसके अनुसंधान कार्यों के लिए जाना जाता है। एनबीआरआई के इस हर्बल स्प्रे के शुरुआती नतीजे बेहद शानदार मिले हैं। देर तक मास्क पहनने वाले लोगों को इससे काफी राहत मिल रही है।

एनबीआरआई के मुख्य वैज्ञानिक डॉ शरद श्रीवास्तव ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि “इस हर्बल डीकन्जेस्टैंट स्प्रे को औषधीय और सगंध पौधों से तैयार किया गया है और इसका उपयोग पूरी तरह से सुरक्षित है। जिन पादप तत्वों का उपयोग इस स्प्रे में किया गया है, उनके नाम का खुलासा बौद्धिक संपदा संबंधी कारणों से अभी नहीं किया जा सकता। इसे सिर्फ एक बार मास्क पर स्प्रे करना होता है। स्प्रे करने के बाद मास्क का उपयोग करने पर नासिका और श्वसन तंत्र खुल जाता है और फिर सांस लेने में परेशानी नहीं होती।” इस स्प्रे को आयुष मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के आधार पर तैयार किया गया है। संस्थान की योजना इस इन्हैलर की तकनीक को व्यावसायिक उत्पादन के लिए हस्तांतरित करने की है, ताकि बड़े पैमाने पर इसका उत्पादन किया जा सके और इसे जरूरतमंदों तक पहुँचाया जा सके।

भारतीय पेट्रोलियम संस्थान में स्थापित होगा कोविड-19 परीक्षण केंद्र

उमाशंकर  मिश्र

Twitter handle : @usm_1984

नई दिल्ली, 01 मई (इंडिया साइंस वायर): कोरोना वायरस की भारत में दस्तक के साथ ही वैज्ञानिक तथा औद्योगिक संस्थान (सीएसआईआर) की दो प्रयोगशालाओं में कोविड-19 के परीक्षण केंद्र शुरू किए गए थे, जिनके द्वारा दिए गए प्रशिक्षण के बाद सीएसआईआर की कई प्रयोगशालाओं में कोविड-19 परीक्षण किया जा रहा है। इस सूची में देहरादून स्थित सीएसआईआर-भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (आईआईपी) भी शामिल हो गया है। सीएसआईआर-आईआईपी में भी अब आरटी-पीसीआर आधारित कोविड-19 परीक्षण केंद्र स्थापित किया जा रहा है।

सीएसआईआर-आईआईपी के निदेशक डॉ अंजन रे ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि “कोविड-19 के नमूनों का परीक्षण एक ऐसा अवसर है, जहां हम भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के प्रोटोकॉल और मानक प्रक्रियाओं के अनुरूप पूर्ण प्रतिबद्धता के साथ अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं। यह नई कोविड-19 परीक्षण सुविधा प्रशिक्षित टीम से लैस होगी, जहां समुचित जैव सुरक्षा सावधानियों के साथ प्रतिदिन कम से कम 30 रोगी नमूनों का परीक्षण किया जा सकेगा।”

कोविड-19 के परीक्षण की मुहिम को तेज करने के लिए सीएसआईआर-आईआईपी की जैव रसायन तथा जैव प्रौद्योगिकी विभाग की टीमों को जीव-विज्ञान के क्षेत्र में कार्यरत सीएसआईआर की दूसरी प्रयोगशालाओं का सहयोग मिल रहा है। जिन संस्थानों का सहयोग सीएसआईआर-आईआईपी को मिल रहा है, उनमें इंस्टीट्यूट ऑफ जीनोमिक्स ऐंड इंटिग्रेटिव बायोलॉजी (आईजीआईबी) दिल्ली,  इंस्टीट्यूट ऑफ माइक्रोबियल टेक्नोलॉजी (इम्टेक) चंडीगढ़ और सेंटर फॉर सेलुलर ऐंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी (सीसीएमबी) हैदराबाद शामिल हैं।

मई के पहले पखवाड़े में इस परीक्षण केंद्र को शुरू करने के लिए सीएसआईआर-आईआईपी उत्तराखंड के स्वास्थ्य मंत्रालय और सभी सरकारी अस्पतालों के निरंतर संपर्क में है। यह अत्याधुनिक परीक्षण सुविधा वायरल परीक्षण के लिए राज्य संसाधन केंद्र के रूप में दीर्घकालीन रूप से उपलब्ध होगी, साथ ही यह सीएसआईआर-आईआईपी की योजना में शामिल पर्यावरण जैव प्रौद्योगिकी उत्कृष्टता केंद्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

डॉ अंजन रे ने कहा है कि “यह प्रयास पूरे उत्तराखंड में सीमित सार्वजनिक परीक्षण सुविधाओं की क्षमता को बढ़ा सकता है। इससे देहरादून के मरीजों के नमूनों के परीक्षण के बोझ को साझा करने में मदद मिल सकती है, फिलहाल यह भार एम्स (ऋषिकेश) और दून अस्पताल के परीक्षण केंद्रों पर है। सीएसआईआर-आईआईपी भी सीएसआईआर-आईजीआईबी की तकनीकी देखरेख में नमूनों की जांच के लिए एक तेज माइक्रो आरटी-पीसीआर आधारित विश्लेषण पद्धति को अपनाने की योजना बना रहा है।” रियल टाइम रिवर्स ट्रांसक्रिप्शन पीसीआर (आरटी-पीसीआर) तकनीक विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) से मान्यता प्राप्त निदान के तरीकों में से एक है। शोधकर्ता व्यक्तियों से एकत्र नमूनों से न्यूक्लिक एसिड निकालते हैं और आरटी-पीसीआर के माध्यम से वायरल जीनोम अंशों को बढ़ाया जाता है। स्वैब नमूने आमतौर पर नाक, गले या लार से प्राप्त किए जाते हैं। यदि नमूने में वायरल आरएनए हो तो परीक्षण को पॉजिटिव और वायरल आरएनए न हो परीक्षण नेगेटिव माना जाता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि अधिक परीक्षण से कोविड-19 के प्रकोप की निगरानी में मदद मिल सकती है। कोविड-19 का प्रकोप शुरू होने के साथ ही सीएसआईआर की रणनीति सामुदायिक परीक्षण की रही है, ताकि बीमारी के नए प्रकोपों निगरानी सुनिश्चित की जा सके और इस प्रकार उसे फैलने से रोका जा सके।

(इंडिया साइंस वायर)

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