Thursday , 1 October 2020
समाचार

सभ्यता संवाद पत्रिका का हुआ ई-लोकार्पण, भारतीय संचार परंपरा पर हुई चर्चा

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भारत की सभ्यता संवाद की रही है: प्रो.कुलदीप चन्द्र अग्निहोत्री, कुलपति केन्द्रीय विश्वविद्याल, हिमाचल प्रदेश
भारतीय संचार की परंपरा लोकमंगलाकारी रही हैः संजय द्विवेदी, महानिदेशक जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली

नई दिल्ली
ज जब संचार माध्यमों के चाल-चरित्र को लेकर लगातार विमर्ष किया जा रहा है, ऐसे में भारत की मीडिया कैसी है? किस तरह की होनी चाहिए? संचार की भारतीय अवधारणाएं क्या हैं? इन विषयों के समेटे हुए सभ्यता अध्ययन केन्द्र की त्रैमासिक शोध पत्रिका सभ्यता संवाद के ‘सभ्यतागत संघर्ष और संचार की भारतीय अवधारणा’पर केंद्रित अंका का ई-लोकार्पण हिमाचल प्रदेश केन्द्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. कुलदीप अग्निहोत्री,आरएसएस के सह-प्रचार प्रमुख नरेंद्र ठाकुर, भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी, आरएसएस के सह-प्रचार प्रमुख नरेंद्र ठाकुर, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजकुमार भाटिया, वरिष्ठ पत्रकार उमेश चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार अनिल सौमित्र, हंसराज कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय की प्राचार्या डॉ. रमा सहित देश भर के संचार प्रेमियों की उपस्थिति में हुआ।
इस अवसर पर बोलते हुए वक्ताओं ने कहा कि भारत की संचार-परंपरा लोकमंगलकारी रही है एवं भारतीय सभ्यता ऐसे वक्त में भी संवाद की बात करती है, जब संघर्ष अवश्यंभावी दिख रहा हो। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे केंद्रीय विश्वविद्यालय हिमाचल प्रदेश के कुलपति कुलदीप चंद अग्निहोत्री ने भारत की संवाद का परंपरा को एक उत्कृष्ट उदाहरण देते हुए कहा कि जब महाभारत में कुरुक्षेत्र के मैदान में सेनाएं डटी थीं तो अर्जुन के मन में कई प्रश्न आए और कृष्ण ने उनका उत्तर दिया। यही भारत की संवाद परंपरा है कि कठिन समय में भी वह लोकमंगल के विषय पर बात करती है। सभ्यताओं के संघर्ष को लेकर उन्होंने कहा कि भारत संवाद की सभ्यता है और उसका टकराव ऐसी सभ्यताओं से होता रहा है, जहां संवाद की न्यूनतम संभावनाएं हैं। मीडिया में भी जब ऐसी सभ्यता हावी होती है तो संवाद के पक्ष बदल जाते हैं और नकारात्मक नैरेटिव हावी हो जाता है।
भारतीय जनसंचान संस्थान के महानिदेशक संजय द्विवेदी ने कहा कि मीडिया में नकारात्मक पक्षों की चर्चा अधिक होने और मूल्यों से भटकने की वजह यही है कि उसने भारत के लोकमंगल के उद्देश्य को त्याग दिया है। भारत की संवाद परंपरा लोकमंगल की बात करती है। उन्होंने कहा कि सिर्फ मीडिया ही नहीं पूरा भारतीय समाज ही अपने मानको को भूल-सा गया है। ऑनलाइन गोष्ठी के दौरान संजय द्विवेदी ने कहा कि महर्षि नारद से लेकर गोस्वामी तुलसीदास तक ने लोकमंगल को ही संवाद का मुख्य उद्देश्य माना है। उन्होंने कहा कि पश्चिम की संचार मानक यह है कि कोई नकारात्मक बात है, तभी समाचार बनेगा। भारत की बात करेंगे तो हमारे यहां लोकमंगल शब्द मिलेगा। दीनदयाल का दर्शन हो या फिर लोहिया जी का समाजवादी सिद्धांत दोनों ही लोकमंगल की बात करते हैं।

मीडिया में नकात्मक समाचारों की प्रमुखता को लेकर आरएसएस के सह-प्रचार प्रमुख नरेंद्र ठाकुर ने कहा कि मीडिया में विदेशी मूल्यों के नकारात्मक नैरेटिव हावी होने के चलते वह भारतीय मूल्यों से बचता दिखता है। उन्होंने कहा कि भारतीय जीवन पद्धति को समाज के सामने लाने की आवश्यकता है। भारत का योग, आयुर्वेद को आज दुनिया मानने लगी है। उन्होंने कहा कि कोरोना काल में भारत से निर्यात होने वाले मसालों में पिछले साल जून के मुकाबले इस वर्ष 34 फीसद की वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा कि झूठ का विमर्ष खड़ा करने वालों के खिलाफ हमें सत्य का विमर्ष खड़ा करना चाहिए, जब हम सत्य एवं तथ्य के साथ लोगों के बीच में सूचना लेकर जाएंगे तो समाज में उसकी स्वीकारोक्ति स्वयंमेव होगी। कोरोना काल में मजदूरों के पलायन पर नकात्मक समाचारों की भरमार को लेकर कहा कि लाखों लोग जब इधर से उधर होंगे तो कुछ समस्याएं आएंगी।
कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए पत्रिका के अतिथि संपादक डॉ. जयप्रकाश सिंह ने कहा कि भारत में पूरी दुनिया से अलग संचार की एक विशिष्ट परंपरा,अवधारणा रही है। आज के दौर में सभ्यताओं के संघर्ष में सूचना और संवाद का महत्व बढ़ गया है। उन्होंने कहा कि आज जब सभ्यताओं का संघर्ष काफी तीव्र हो रहा है तो उसमें मुख्य बिंदु सूचना ही होगी। इसलिए इस पत्रिका में सूचना और संचार की परंपरा की भारतीय अवधारणा की बात की गई है। वहीं पत्रिका के संपादक रवि शंकर ने कहा, ‘हमारे मन में बहुधा यह प्रश्न आता है कि हिंदी और अंग्रेजी के अखबारों में अंतर क्यों हैं। अंग्रेजी अखबारों के संपादकीय और शीर्षकों को देखें और फिर हिंदी या फिर अन्य क्षेत्रीय भाषाओं पर नजर डालें तो आप बड़ा अंतर पाएंगे। यह भिन्नता हिंदी और अंग्रेजी के चैनलों में भी दिखती है।’ उन्होंने 2002 के गुजरात दंगों का उदाहरण देते हुए कहा कि इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के दौरान हिंदी और अंग्रेजी के मीडिया की कवरेज में बड़ा अंतर था। इसके अलावा यदि हम गाय, संस्कृति, आर्य विमर्श और जाति विमर्श की ही बात करें तो यह अंतर दिखता है। आइटी विशेषज्ञ संदीप पांडेय ने पत्रिका के लोकापर्ण सत्र का संचालन किया जबकि पूरे कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ संचारकर्मी ऋतेश पाठक ने किया।

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