Monday , 26 October 2020
समाचार

गांवों का शोषण अपने आप में एक संगठित हिंसा है

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अभिषेक शर्मा

आज जिस प्रकार वैश्विक समाज धनी और वंचितो, शहरी और ग्रामीणों, कुशल और अकुशल के हितों के टकराव के दोराहे पर खड़ा है और सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक समस्याओं का कारण बन रहा है, ऐसे में गांधीवादी दर्शन का एक पक्ष ऐसा भी है जो हमें इन समस्याओं के समाधान दे सकता है। आइये आज गांधी जयन्ती पर गांधीवादी दर्शन के इसी पक्ष को समझते है।

गांधी राजनैतिक स्वतन्त्रता के साथ ही आर्थिक स्वतन्त्रता हासिल करने पर बल देते थे। इसका अर्थ है देश में सभी महिला पुरूषों के पास पर्याप्त मात्रा में जीवन यापन करने के साधन हो जैसे भोजन, कपड़ा, घर आदि। गांधी के अनुसार यह तभी संभव है जब काम करने वालों और मेहनत करने वालों को संसाधनों से वंचित न रहने दिया जाय। इसके लिये गांधी जी ने ट्रस्टीशिप का सिद्धान्त दिया जिसके अन्तर्गत गांधी जी का कहना है कि जिन लोगों के पास आवश्यकता से अधिक संसाधान है वे अपनी आवश्यकता बढ़ाने की बजाय अपने संसाधनों को ऐसे लोगों के साथ साझा करें जो कार्य करने के इच्छुक है पर संसाधनों से वंचित है। इस प्रकार समाज संसाधनों के स्वामित्व की खातिर होने वाले टकराव से बचेगा और सभी के विकास की दशायें जन्म लेंगी।

’’गांधी मानते है कि सच्चा भारत उसके 7 लाख गांवों में बसता है। यदि भारतीय सभ्यता को एक स्थायी विश्व व्यवस्था के निर्माण में अपना पूरा-पूरा योगदान करना है तो गांवों में बसने वाली इस विशाल जनसंख्या को फिर से जीना सिखाना होगा।’’ गांधी के अनुसार गांव बहुत लम्बे समय से शिक्षित लोगों की उपेक्षा का शिकार हैं। गांव के जो लोग शिक्षित हो जाते है वे शहरों में बस जाते हैं और गांव की चिंता छोड़ देते हैं। उन्हें लगता है कि गावों में रहकर या गांव में कार्य करके वे पिछड़ जायेंगे। गांधी कहते है कि जिस प्रकार एक स्वस्थ डॉक्टर खतरनाक रोगों से घबराकर भागता नहीं है बल्कि उन्हें ठीक करने की कोषिश करता है। वैसे ही शिक्षित लोग गांव की अर्थव्यवस्था सुधारने का प्रयास करें।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिये गांधी कहते है कि जो आर्थिक कार्य गांव में संभव है उन्हें गांव में ही कराया जाय और वो कार्य बढ़े उद्योगों को स्थानांतरित न किये जाये यह ग्रामीण महिला पुरूशों की आर्थिक उन्नति के लिये आवश्यक है। ’’हमें दो में से एक चीज चुननी होगी – गांवों का भारत जो उतने ही प्राचीन हैं जिनता की स्वयं भारत है या शहरों का भारत जो विदेशी आधिपत्य की देन है। आज प्रभुत्व शहरों का है, जो गांवों को इस तरह चूस रहे हैं कि वे खंडहर हुए जा रहे हंै। गांवों का शोषण अपने आप में एक संगठित हिंसा है।’’

गांधी सबसे गरीब आदमी को आर्थिक चिंतन के केन्द्र में लाते हुए नीति निर्धारकों से अपील करते है कि अपनी नीतियों को एक कसौटी पर अवश्य तोलों कि ’’तुम्हारे निर्णय सबसे गरीब आदमी के लिये कितने उपयोगी हैं, क्या वह उसके जीवन में कुछ सुधार ला सकेंगे? क्या वे उन करोड़ों लोगों को स्वराज दे सकेंगे कि जिनके पेट भूखे हैं?’’ साथ ही गांधी का मत था कि प्रत्येक सक्षम व्यक्ति चाहे पुरूष हो या महिला उसे आर्थिक गतिविधियों में भाग लेना चाहिये जिससे परिवार का बोझ किसी एक के कंधों पर न आये और सत्यनिश्ठा से आजीविका अर्जित की जा सके। इसी कारण भारतीय व्यवस्था की वर्तमान समस्याओं को दूर करने के लिये और आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करने के लिये पुनः गांधीवाद की तरफ देखा जा रहा है।

        लेखक सिविल एकेडमी (आई0ए0एस/पी0सीएस0) मेरठ के चैयरमेन  हैं.

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