Thursday , 6 August 2020
समाचार

संघ को जानें संघ की भाषा में

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डॉ विकास दवे
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में यूं तो अनेक भ्रांतियां समाज में नित्य प्रति फैलाई जाती रहती हैं कई बार यह भ्रांतियां सायास  फैलाई जाती हैं और कई बार वर्षों से उसके बारे में बनाए जा रहे विपरीत वातावरण के प्रभाव स्वरूप स्वतः  ही लोग अपने मानस पर तैयार कर लेते हैं ।कई बार अनेक बुद्धिजीवी, पत्रकार और साहित्यकार मित्रों से बातचीत में यह ध्यान में आता है कि भारतीय समाज के प्रबुद्ध और पढ़े-लिखे वर्ग में भी संघ को लेकर अनेक भ्रांतियां बनी हुई रहती हैं। जबकि इन समूह के लोगों के लिए संघ के बारे में जानना कोई बड़ा दुरूह कार्य नहीं है। ये सब चाहें तो सहज रूप से संघ के किसी भी छोटे बड़े कार्यकर्ता से बातचीत करके अथवा संघ के कार्यक्रमों में सीधे जाकर उनके संवादों, व्याख्यान को सुनकर और संघ के कार्यकर्ताओं द्वारा प्रचुर मात्रा में लिखे गए साहित्य को पढ़कर संघ के बारे में अपनी निष्पक्ष और स्पष्ट धारणा बना सकते हैं किंतु दुर्भाग्य से इस समय संपूर्ण समाज लिखने पढ़ने से बहुत दूर होता जा रहा है।
लिखने के नाम पर हाथ के दो अंगूठे 8 इंच की मोबाइल स्क्रीन पर तैरते रहते हैं और पढ़ने के नाम पर व्हाट्सएप, फेसबुक,इंस्टाग्राम तथा ट्विटर द्वारा फैलाई गई अप्रामाणिक सामग्री से ही अपना स्वाध्याय कार्य पूरा समझ लेते हैं । इन परिस्थितियों में कई बार अधकचरे ज्ञान को अपना संपूर्ण  ज्ञान मानकर लोग संघ के बारे में बड़े स्पष्ट रूप से अपनी धारणाओं को समाज में परोसते रहते हैं। मेरे ऐसे सभी बुद्धिजीवी मित्रों को मैं सदैव एक ही सलाह देता हूं कि वे यदि संघ की विचारधारा और संघ की कार्यशैली को समझना चाहते हैं तो उसका एक बड़ा आसान साहित्यिक तरीका भी है और वह तरीका यह कि वे संघ की कार्यशैली में प्रचलित मुहावरों और शब्द युग्मों को एक बार ठीक से समझ लें तो भी इन मुहावरों से संघ को समझा जा सकता है। मुझे लगता है इतने बड़े और इतने पुराने संगठन को समझने का इससे सहज सरल कोई उपाय नहीं हो सकता। आप कहेंगे मुहावरों को समझकर संगठन को समझना यह कैसे संभव है? तो आइए कुछ नमूना रूप में उदाहरण सहित समझाने का प्रयास करता हूं। संघ में दैनंदिन कार्य शैली में कुछ मुहावरे से प्रचलित हैं।
सबसे पहले संघ में एक प्रचलित वाक्य विन्यास है “संघ व्यक्ति निर्माण की कार्यशाला है” । अब हम इस वाक्य विन्यास को समझने का प्रयास करें। हमने यूं तो अनेक फैक्ट्री आंखों से देखी होगी लेकिन क्या कोई ऐसी कार्यशाला भी हो सकती है जहां व्यक्तियों का निर्माण होता हो? और यदि है तो वे कार्यशाला कैसी है? वहां कौन से यंत्र उपयोग में लाए जाते हैं? संघ में व्यक्ति निर्माण की इस कार्यशाला को नाम दिया गया है “शाखा”।
 मेरे अनेक वामपंथी मित्र मजाक में इस शाखा शब्द को  स्वयंसेवकों के लिए शाखामृग यानी बंदर शब्द से भी जोड़ते हैं। वे मजाक उड़ाते हुए कहते हैं कि पेड़ों की शाखाओं पर उछलते कूदते वानर भी संघ के स्वयंसेवकों के समान ही हैं। मुझे कई बार तरस आता है ऐसे लोगों की बुद्धि पर। मैं उनको केवल इतना ही कहना चाहता हूं कि वे एक बार संघ की शाखाओं से निकले हुए व्यक्तित्वों का आकलन भर कर लें तो उन्हें समझ में आ जाएगा कि पेड़ों की शाखाओं और संघ की शाखाओं में क्या अंतर है? अटल जी और मोदी जी तो केवल राजनीतिक क्षेत्र में होने के कारण सर्व परिचित हैं पर ऐसे लाखों करोड़ों कार्यकर्ता संघ की तिजोरी में हैं।
 मैं बात कर रहा था संघ की शाखाओं की जहां व्यक्ति का निर्माण होता है। यदि आप संघ की शाखा में एक-दो दिन भी जाएंगे तो आप को ध्यान में आता है कि वहां पर उम्र, जाति, पंथ और अन्य सभी प्रकार के भेदभाव को दूर रख कर प्रत्येक समूह का व्यक्ति इतना सहज सरल ढंग से एक साथ मिलकर 1 घंटे की शाखा के सभी उपक्रम करता है कि वह यह भूल ही जाता है कि वह किसी समूह विशेष का सदस्य भी है बल्कि प्रत्येक व्यक्ति अपने आपको केवल और केवल इस भारत माता का पुत्र मानने लगता है। ऐसा क्या होता है शाखा पद्धति में?  बड़े छोटे सब मिलकर खेल खेलते हैं, कुछ गीत गाते हैं, योग व्यायाम करके अपने शरीर को पुष्ट करते हैं, सूर्य नमस्कार लगाते हैं और कबड्डी खेलते हैं। लोगों को लगता होगा 80-85 वर्ष के बुजुर्ग और मात्र 8-10 वर्ष का बालक एक साथ कबड्डी खेल कर क्या संस्कार प्राप्त करते होंगे? तो आप सब को स्मरण करा दूँ कि एक पत्रकार ने जब परम पूजनीय गुरुजी श्री माधव राव सदाशिव राव गोलवलकर जी से पूछा था कि संघ के स्वयंसेवक राष्ट्र सेवा और समाज सेवा के लिए अपने प्राणों तक की आहुति देने को तैयार रहते हैं यह सब कैसे हो पाता है? गुरुजी ने सहास्य कहा था -“शाखा में कबड्डी खेल कर।”
 उन पत्रकार को आश्चर्य हुआ , तब गुरुजी ने समझाया संघ स्थान पर कबड्डी खेल कर संघ के स्वयंसेवक कबड्डी के खेल की ही तरह विरोधी पक्ष के पाले में घुसने मरने और पुनर्जीवित होने की कला जानते हैं और इसीलिए उनके मन से मृत्यु का भय सदैव के लिए चला जाता है। यही भाव उनके दैनंदिन जीवन में भी उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाता है। यह तो हुई व्यक्ति निर्माण की कार्यशाला की एक छोटी सी बानगी।
 संघ में एक दूसरा मुहावरा प्रचलित है -“संघ कुछ भी नहीं करेगा स्वयंसेवक सब कुछ करेगा”। इसका अर्थ क्या हुआ? इसका अर्थ है भारतीय समाज में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य इतने विविध प्रकार के चलते हैं कि भारतीय समाज तो छोड़िए स्वयं संघ के स्वयंसेवक को भी पता नहीं लगता कि संघ के कार्य कितने प्रकार के हैं? एक बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्री बाला साहब देवरस इंदौर पधारे थे । एक पत्रकार वार्ता में एक बड़े पत्र समूह के मालिक ने उनसे प्रश्न किया था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कितने अनुषांगिक संगठन इस समय भारतीय समाज में कार्यरत हैं ? बाला साहब देवरस ने मुस्कुराते हुए कहा था -“मैं सच बोलूं , आपको सच ही सुनना अच्छा लगेगा ना?” उन्होंने आश्चर्य से कहा -“हाँ  हमारी अपेक्षा आपसे तो यही है कि आप सत्य कहें।”
 बाला साहब देवरस ने हंसकर कहा -“मुझे भी नहीं पता आप मेरी बात पर विश्वास करेंगे या नहीं करेंगे किंतु सच यही है कि मैं जिस समय आपके प्रश्न का उत्तर दे रहा हूं उसी समय संपूर्ण भारत में संघ के विचार से प्रभावित कोई कार्यकर्ता संघ के एक नए प्रकल्प को जन्म दे रहा है। इसलिए संघ के विचार से अनुप्राणित कितने अनुषांगिक संगठन कार्य कर रहे हैं और कितने इस समय में जन्म ले रहे हैं यह हम लोगों के लिए बताना लगभग असंभव सा ही होता है।”
 संभवतः इस उदाहरण से हम समझ सकें कि संघ के इस वाक्य का अर्थ क्या है?संघ कुछ नहीं करता किंतु संघ का विचार अपने कार्यकर्ताओं को इतना परिपक्व रूप से तैयार कर देता है कि संघ का प्रत्येक स्वयंसेवक राष्ट्र और समाज की आवश्यकता के अनुसार नए संगठन तैयार करना नए कार्य क्षेत्र तैयार करना नई चुनौतियों को स्वीकारना और उन चुनौतियों का समाधान प्रकल्प के रूप में समाज को प्रदान कर देना यह सब संघ के कार्यकर्ता सहज रूप से प्रतिदिन करते रहते हैं। इन्हीं में से संघ के अनेक संगठन तैयार हुए ।शिक्षा के क्षेत्र में काम करने की आवश्यकता होने पर विद्या भारती जैसा अखिल भारतीय स्तर का संगठन तैयार हुआ जो आज संपूर्ण विश्व में सर्वाधिक मात्रा में बिना किसी शासकीय सहयोग के विद्यालय चला रहा है। लाखों की संख्या में शिक्षक और करोड़ों की संख्या में विद्यार्थी देने वाला यह संगठन विश्व का सबसे बड़ा शैक्षिक संगठन बना तो यह संघ के कार्यकर्ताओं के कारण ही संभव हो पाया। विद्यार्थियों के क्षेत्र में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद , मजदूरों के क्षेत्र में भारतीय मजदूर संघ,  किसानों के क्षेत्र में भारतीय किसान संघ, विज्ञान के क्षेत्र में विज्ञान भारती, भाषा के क्षेत्र में संस्कृत भारती, सेवा के क्षेत्र में सेवा भारती सहित 200 के लगभग बड़े  और हजारों स्वतंत्र छोटे प्रकल्प आज संघ  और भारतीय समाज की बड़ी पूंजी है। इसलिए संघ का यह शब्द युग्म हमें ठीक से समझ आ जाना चाहिए।
 संघ में एक और मुहावरा प्रचलित है और वह मुहावरा संघ के अनुशासन पक्ष से जुड़ा हुआ है। यह मुहावरा है- “जहां अपेक्षित वहां उपस्थित”। कई बार बाहर के लोगों को यह शब्द युग्म आसानी से समझ नहीं आता किंतु संघ के प्रामाणिक स्वयंसेवक के लिए जब भी संगठन की ओर से कोई सूचना प्राप्त होती है वहां पर उपस्थित होना संघ का स्वयंसेवक अपनी सर्वाधिक सर्वोच्च प्राथमिकता मानता है। इस संदर्भ में एक उदाहरण देना  पर्याप्त होगा।  उज्जैन में  एक दिन  संघ के स्वयंसेवकों के पास  रात्रि 2:00 बजे  फोन पर सूचना पहुंचती है  कि आपको आधे घंटे में  शिप्रा नदी के किनारे स्थित चक्रतीर्थ श्मशान घाट पर उपस्थित होना है ।  आश्चर्यजनक रूप से  आधे घंटे बाद  98 कार्यकर्ता  श्मशान घाट पर उपस्थित थे। सभी को पंक्ति में बैठाया गया सूचना देने वाले व्यक्ति ने अपने अधिकारी को कहा  98 व्यक्ति उपस्थित हैं, जो दो व्यक्ति नहीं आ पाए उनके बारे में सूचना प्राप्त है कि वह क्यों नहीं आए? प्रथम व्यक्ति इस समय राजस्थान में हैं इसलिए नहीं आ पाए और दूसरे कार्यकर्ता अपनी माताजी की अस्वस्थता के कारण से अस्पताल में हैं और उनकी सेवा सुश्रुषा कर रहे हैं।  सभी कार्यकर्ताओं को एक गीत गाने के बाद पुनः अपने घर जाने के लिए कह दिया गया।  न तो किसी कार्यकर्ता ने किसी से यह पूछा कि उन्हें बुलाया क्यों गया था अथवा इस प्रकार अचानक नींद में से उठाकर मध्यरात्रि में बुलाने का क्या अर्थ था?  किंतु इन कार्यकर्ताओं की प्रामाणिकता ही वास्तव में संघ के इस विराट महासागर की शक्ति है।  यही अनुशासन  संघ में  उस शब्द युग्म को जन्म देता है जिसमें कहा जाता है -“जहां अपेक्षित वहां उपस्थित”।
  संघ में एक और शब्द प्रचलित है -“एक चालकानुवर्तीत्व”।  शब्द थोड़ा कठिन है, संस्कृत का है किंतु एक उदाहरण से यह सहज रूप से आपको समझ में आ जाएगा। आप सबको स्मरण करा दूँ कि जिस समय भारत पड़ोसी देश से युद्ध की स्थिति में था तब तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने संघ के द्वितीय सरसंघचालक परम पूजनीय गोलवलकर जी से आग्रह किया था कि इस समय सेना और पुलिस पूरी तरीके से युद्ध की व्यवस्थाओं में जुटी हुई है ऐसे में संपूर्ण दिल्ली शहर के यातायात को व्यवस्थित रखना हमारे लिए एक बड़ी चुनौती हो सकता है। क्या संघ के स्वयंसेवक यातायात को संभालने में सक्षम होंगे?
गुरुजी ने तुरंत कहा क्यों नहीं , आप जब से कहें तब से दिल्ली का यातायात हमारी जवाबदारी होगी। इंदिरा जी ने उनसे पूछा आपको पता है इसके लिए लगभग 5000 से अधिक कार्यकर्ताओं की आवश्यकता होगी? इतने कार्यकर्ताओं को घर तक सूचना देना और उन्हें बुलाना यह कितने लंबे समय में संभव हो पाएगा?
 गुरुजी ने कहा-” 1 घंटे में ।”
इंदिरा जी के लिए आश्चर्य का विषय था। इतना बड़ा महानगर और वह युग भी ऐसा था जब टेलीफोन और मोबाइल जैसे साधनों की सुविधा भी नहीं थी किंतु आश्चर्यजनक रूप से 1 घंटे में पूर्ण गणवेश में 5000 कार्यकर्ता संपूर्ण दिल्ली की यातायात व्यवस्था को संभालने के लिए प्रत्येक चौराहे पर खड़े नजर आए। यह संभव इसी कारण हुआ कि संघ का सूचना तंत्र व्यक्ति केंद्रित होता है। यहां ‘गटनायक’ जैसे शब्द प्रचलित हैं। जो सामान्य समाज को समझ में नहीं आते। गटनायक का अर्थ होता है 10 कार्यकर्ताओं पर एक नेतृत्व कर्ता, ऐसे अनेक गटनायक मिलकर एक शाखा टोली तैयार होती है। यह सभी शाखा टोली के कार्यकर्ता एक मुख्य शिक्षक के कहे अनुसार कार्यों को संपादित करते हैं। ऐसी अनेक शाखाओं के मुख्य शिक्षक और शाखा कार्यवाह एक नगर की टोली के साथ सहयोगी के रूप में काम करते हैं। यह नगर सामान्यतया 1 जिले का हिस्सा होते हैं, ऐसे अनेक जिले मिलकर एक महानगर अथवा एक विभाग का निर्माण करते हैं। ऐसे अनेक विभागों की टोलियां मिलकर एक प्रांत का हिस्सा होती हैं और अनेक प्रांत मिलकर एक क्षेत्र का निर्माण करते हैं। ऐसे 11 क्षेत्र संपूर्ण भारत में कार्यरत हैं और इस प्रकार यह 11 क्षेत्र अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सहयोगी के रूप में काम करते हैं। अखिल भारतीय स्तर पर संपूर्ण संगठन कार्य सरकार्यवाह जी अर्थात संघ के महासचिव स्तर के एक कार्यकर्ता के नेतृत्व में प्रायोगिक रूप से संपन्न होते हैं।  इतने बड़े संगठन का प्रत्येक निर्णय परम पूजनीय सरसंघचालक जी की सहमति के बाद ही संपन्न होता है। इस आलेख को पढ़ने वाले अनेक पाठकों के लिए यह आश्चर्य का विषय हो सकता है कि संघ का यह शब्द युग्म एक चालकानुवर्तीत्व अर्थात एक ही चालक के अनुवर्तन से चलने वाला कार्य किस तरह आकर लेता है?
यदि सरसंघचालक जी कोई संदेश भारत के प्रत्येक स्वयंसेवक तक पहुंचाना चाहे तो यह संदेश मात्र कुछ घंटों में ही प्रत्येक कार्यकर्ता तक पहुंचने में सक्षम होता है। इस प्रकार संघ के कार्य को समझना उसकी भाषा शैली को समझ लेने से ही संभव हो सकता है। यह इतना कठिन कार्य भी नहीं है किंतु दुर्भाग्य से संघ को गाली देने वाले लोग कभी संघ के इन शब्द युग्म और मुहावरों को समझने का प्रयास नहीं करते हैं क्योंकि इन्हें समझने के लिए संघ की कार्यशैली का हिस्सा बनना होता है और यदि एक बार संघ के कार्यकर्ताओं से किसी व्यक्ति की मित्रता हुई तो उसके बाद वह व्यक्ति संघ के इस मित्रता के दायरे से कभी बाहर नहीं जा पाता। यही कारण है कि संघ में यह कहा जाता है कि “मैं स्वयंसेवक था” ऐसा कहना संभव ही नहीं है। क्योंकि हम जीवन में यदि एक बार संघ के स्वयंसेवक बने तो उसके बाद हम संघ के दैनंदिन कार्य से जुड़े रहें या ना रहें किंतु स्वयंसेवक हम मृत्यु पर्यंत बने रहते हैं।
विश्व के सबसे बड़े सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन में आश्चर्यजनक रूप से न कोई फार्म भरा जाता है और ना कोई आइडेंटी कार्ड दिया जाता है किंतु संघ के संस्कारों को व्यक्ति अपने जीवन में जब उतार लेता है तो वह व्यक्ति उसकी भाषा उसके आचरण और उसके व्यवहार से ही समाज में अपनी पहचान बनाने लगता है। संघ में ऐसे कार्यकर्ताओं के लिए एक शब्द युग्म प्रयोग किया जाता है और वह शब्द युग्म होता है -“देव दुर्लभ कार्यकर्ता”। वास्तव में देवताओं को भी जैसे अनन्य सहयोगी सुलभ नहीं हो पाते वैसे सहज सहयोगी कार्यकर्ता संघ के प्रत्येक कार्यकर्ता को प्राप्त होते हैं । इन कार्यकर्ताओं के अनेक गुण होते हैं किंतु देव दुर्लभ कार्यकर्ता शब्द को ठीक से समझना है तो केवल इस रूप में समझ ले कि ऐसा कार्यकर्ता संघ कार्य को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता मानता है। उसके लिए फिर संघ कार्य से बढ़कर कोई दूसरा स्वार्थ, लोभ, मोह हो ही नहीं सकता। यहां तक की अपने घर परिवार का त्याग करके अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्र के लिए होम कर देने वाले कार्यकर्ताओं की एक विराट श्रंखला भी इसी भाव में से तैयार होती है। ऐसे देव दुर्लभ कार्यकर्ताओं के लिए हजारों उदाहरण दिए जा सकते हैं किंतु केवल एक उदाहरण देना पर्याप्त होगा।
एक कार्यकर्ता को भोपाल से सरसंघचालक जी द्वारा एक सूचना दे कर भेजा गया। उन कार्यकर्ता को कहा गया कि यह सूचना तुरंत टिमरनी में संघ के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता तक पहुंचानी है। वे कार्यकर्ता टिकट लेकर ट्रेन में बैठ गए लेकिन जैसे ही ट्रेन हरदा स्टेशन को पार करने लगी तब साथ के सहयात्री ने उनको बताया कि यह ट्रेन यहां पर रूकती नहीं। उनके लिए सूचना अपने अधिकारी तक तुरंत पहुंचाना इतना अनिवार्य कार्य उस समय था कि उन कार्यकर्ता ने दरवाजे पर पहुंच कर चलती हुई ट्रेन में से छलांग लगा दी। स्वाभाविक रूप से ट्रेन से छलांग लगाने के कारण से घायल भी हुए किंतु अपने घावों की चिंता किए बगैर पैदल पैदल ही वहां से अपने इंगित कार्य को संपन्न करने के लिए चले गए। वरिष्ठ कार्यकर्ता को वह संदेश दिया। बाद में उनका उपचार भी संभव हुआ और वे अनेक वर्षों तक संघ कार्य भी करते रहे। संभवतः सामान्य व्यक्ति को यह पागलपन लग सकता है किंतु स्वाभाविक रूप से संगठन कार्य के प्रति अपना सर्वस्व समर्पित कर देने के इसी भाव को प्रत्येक स्वयंसेवक में उत्पन्न करना यह कार्य वही शाखा करती है जिस शाखा की मजाक तथाकथित विरोधी लोग उड़ाते रहते हैं। वैसे तो संघ की कार्यशैली और उसके मुहावरों तथा शब्द युग्म पर इससे कहीं विस्तृत चर्चा हो सकती है किंतु विस्तार भय से अभी इस आलेख को यहीं समाप्त करता हूं। अगली बार फिर कुछ नए मुहावरों और शब्द युग्म के साथ आप सब के साथ अपने विचार साझा करूँगा ताकि प्रत्येक संघ विरोधी अथवा तटस्थ बंधु भगिनी संघ को ठीक प्रकार से समझ सकें।

One comment

  1. Nice article

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