Friday , 28 January 2022
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मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव 2018 : खंडित होती राजनीतिक धारणाएं !

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डा. अनिल सौमित्र

28 नवम्बर को मतदान के बाद अनेक बातों पर पूर्ण विराम नहीं, लेकिन विराम लग गया l मतदान के पूर्व राजनीतिक दल संघर्ष और परिश्रम में व्यस्त थे, तो बाद में सावधानी और सतर्कता में तल्लीन l मध्यप्रदेश के इस चुनाव ने भारत के लोकतंत्र को और अधिक मजबूत किया l इसका प्रमाण निरंतर बढ़ता मतदान है l मध्यप्रदेश की जनता ने एक नागरिक और मतदाता के रूप में अपने परिपक्व होने का प्रमाण दिया है l लगातार बढ़ता हुआ मतदान, शांतिपूर्ण चुनावी व्यवहार और मतदान की गोपनीयता को अक्षुण्ण बनाए रखना निश्चित ही उल्लेखनीय और प्रशंसनीय है l राजनीतिक दल, खुफिया एजेंसी, सर्वेक्षण एजेंसी और तमाम तरह के अन्वेषक अगर मतदाताओं के व्यवहार को भांप नहीं पा रहे, कोई स्पष्ट अनुमान नहीं लगा पा रहे और तुक्के को तीरंदाजी समझ रहे हैं तो इसे मतदाताओं के सशक्तिकरण और अनुमानकर्ता पत्रकार, सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता और सर्वे एजेंसियों की जमीनी पकड़ कमजोर हुआ माना जाना चाहिए l

मध्यप्रदेश के गत कुछ दशकों के चुनावी इतिहास पर गौर करें तो कई रोचक तथ्य दिखाई देते –
हैं l वर्ष 2018 के चुनाव में जहां मतदान प्रतिशत 75.05 प्रतिशत रहा, वहीं वर्ष 2013 में 72.13 प्रतिशत, वर्ष 2008 में 69.28 प्रतिशत, वर्ष 2003 67.25 प्रतिशत, वर्ष 1998 में 60.22 प्रतिशत, वर्ष 1993 में 60.52 प्रतिशत, वर्ष 1990 में 54.19 प्रतिशत और वर्ष 1985 में 49.85 प्रतिशत l मतदान प्रतिशत पर करने से स्पष्ट है कि सिर्फ वर्ष 1998 में मतदान 0.3 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई थी l तब काफी कम मतों के अंतर से कांग्रेस की सरकार गठित हुई थी l यहाँ एक और रोचक आंकड़ा  उल्लेखनीय है l वर्ष 1998 में जहां मतदान में कमी होती दिखाई देती है, वहीं वर्ष 2003 के चुनाव में 7.03 प्रतिशत मतदान की वृद्धि हुई l मतदान में यह वृद्धि न तो अनायास थी और न आकस्मिक l यह मतदान कांग्रेस के कुशासन और मिस्टर बंटाढार के खिलाफ तथा भाजपा की तेजतर्रार व आक्रामक नेत्री साध्वी उमाश्री भारती और भाजपा-संघ कार्यकर्ताओं के सघन परिश्रम के कारण लामबंद हुई थी l  इसका परिणाम हुआ कि गत कई चुनावों में जहां भाजपा और कांग्रेस के बीच मतों का सूक्ष्म अंतर था,  इस चुनाव में यह अंतर 10.89 हो गया l यह मध्यप्रदेश की राजनीति में क्रांतिकारी परिवर्तन था l

गौरतलब है कि पूर्व के चुनावों में कांग्रेस और भाजपा के बीच कांटे की टक्कर रही है l यह सच है कि बसपा, सपा, और गोगपा जैसी पार्टियां मतों की सेंधमारी कर भाजपा-कांग्रेस का खेल बिगाड़ने की कोशिश करती रहीं l 1980 के बाद (भाजपा के गठन) के चुनावी आंकड़ों को देखने से पता चलता है कि शुरुआती दौर में कांग्रेस को कमजोर चुनौती मिलती रही l लेकिन धीरे-धीरे कांग्रेस की चुनौती उसके लिए घातक बनती गई l 1980 में हुए विधानसभा चुनाव में अविभाजित मध्यप्रदेश में कांग्रेस को 47.51 प्रतिशत, जबकि भाजपा को 30.34 प्रतिशत मत मिले थे l तब कांग्रेस ने दो तिहाई बहुमत से सरकार बनाई थी l इस चुनाव में अन्य दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों को 22.15 प्रतिशत मत प्राप्त हुआ था l इसी प्रकार वर्ष 1985 में हुए चुनाव में कांग्रेस प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की असामयिक मृत्यु की सहानुभूति पर सवार थी l इस सहानुभूति के कारण कांग्रेस की झोली में 48.57 प्रतिशत मत आये l इस बार भाजपा मतों में और कमी आ गई और उसे कांग्रेस से 19.10 प्रतिशत कम वोट मिले l  वर्ष 1990 के बाद मध्यप्रदेश के राजनीतिक समीकरण में बदलाव शुरू हो गया l इस साल कांग्रेस को भ्रष्टाचार के कारण जनता का गुस्सा झेलना पडा l  कांग्रेस 33.49 प्रतिशत मतों पर सिमट गई l 39.12 प्रतिशत मतों के साथ भाजपा ने कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर दिया l निर्दलीय समेत अन्य दलों को इस चुनाव में 26.39 प्रतिशत मत मिले थे l

6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में विवादित ढांचा ढहाये जाने के बाद तीनों राज्यों – उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और राजस्थान की भाजपा सरकारों को कांग्रेस ने बर्खास्त कर दिया था l वर्ष 1993 में हुए चुनाव में भाजपा अपने पक्ष में जनता की सहानुभूति को मतदान में बदलने में असफल रही l भाजपा को कांग्रेस से 2 प्रतिशत कम मत मिले l इसी प्रकार वर्ष 1998 में हुए चुनाव में भाजपा मात्र 1.25 प्रतिशत मतों से सत्ता से वंचित रह गई थी l इस चुनाव में कांग्रेस को 40.79 प्रतिशत, जबकि भाजपा को 38.82 प्रतिशत मत मिले थे l इस साल भी निर्दलीय एवं अन्य को 20.39 प्रतिशत मत मिले थे l वर्ष 2003 में भाजपा ने साध्वी उमाश्री भारती के नेतृत्व में कांग्रेस और दिग्विजय सिंह के कुशासन और बिजली, पानी और सड़क की दुर्दशा को मुद्दा बनाकर चुनाव में  42.61 प्रतिशत मत और 173 विधायकों के साथ सरकार में आई l कांग्रेस को 31.61 प्रतिशत मत और 38 विधायकों से संतोष करना पडा l  वर्ष 2008 में सुश्री उमाश्री भारती भाजपा से अलग भाजश के साथ चुनाव में थीं l भाजपा को मतों का नुकसान हुआ, लेकिन वह 143 विधायकों के साथ सरकार में आ गई l भाजश के कारण भाजपा को लगभग 5 प्रतिशत मतों का नुकसान हुआ था l

इस विधानसभा चुनाव का विश्लेषण करते हुए उपर्युक्त आंकड़ों और तथ्यों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता l  इस चुनाव के कुछ और तथ्यों पर गौर करना जरूरी है l इस बात पर राजनीतिक विश्लेषक सहमत हैं कि वर्ष 2003 की तरह इस बार सत्ता विरोधी लहर नहीं है l  हाँ, इस बात से स्पष्ट इंकार भी नहीं है कि 15 वर्षों के बाद सरकार और जनप्रतिनिधियों के खिलाफ लोगों में असंतोष है l  भाजपा और कांग्रेस दोनों ओर से कार्यकर्ताओं की उपेक्षा की आवाजें उठती रही हैं l  कांग्रेस ही नहीं भाजपा के कार्यकर्ता भी राजनीतिक गतिविधियों में प्रोफेशनल्स और एजेंसियों के बढ़ते हस्तक्षेप को बड़ी चुनौती के रूप में देख रहे हैं l भाजपा के सत्ता में होने के कारण यहाँ  से कार्यकर्ताओं के उपेक्षा की ऊँची आवाजें सुनाई देती हैं l हालांकि भारत की राजनीतिक व्यवस्था में इस बात की काफ़ी गुंजाइश है कि नीतियों, योजनाओं और कार्यक्रमों के साथ ही सरकार के संचालन में राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाए l इस दिशा में अभी काफी प्रयास किये जाने की गुंजाइश है l  बौद्धिक और अकादमिक क्षेत्रों में इस धारणा को खंडित करने की भी जरूरत है कि एक निर्वाचित सरकार किसी दल विशेष की ही होती है l वास्तविकता तो यही है कि निर्वाचित सरकार पूरे देश या प्रदेश की होती है l सरकार की नीतियाँ, योजनाएं और कार्यक्रम उनके लिए भी होती हैं जिन्होंने सत्ताधारी दल को वोट नहीं दिया हो l

उपरोक्त आंकड़ों और तथ्यों का लब्बोलुआब यही है कि मध्यप्रदेश में बढ़ता हुआ मतदान असामान्य नहीं है l  वर्ष 1998 के बाद से प्रत्येक चुनाव में मतदान प्रतिशत में  लगातार वृद्धि हो रही है l  जानकारों के अनुसार मतदान में यह वृद्धि सुशासन के साथ ही निर्वाचन आयोग और सभी राजनीतिक संगठनों के प्रयासों का प्रतिफल है l  इस चुनाव ने एक और धारणा को खंडित किया है कि सत्ता विरोध की बजाये सत्ता समर्थन में भी मतदान वृद्धि हो सकती है l इस हफ्ते मध्यप्रदेश में सरकार का गठन हो जाएगा l पक्ष-विपक्ष सहित सभी राजनीतिक दलों को इस चुनौती को स्वीकार करने में गुरेज नहीं करना चाहिए कि राजनीति को सत्ताभिमुख से लोकाभिमुख कैसे बनाया जाए l सुशासन सत्ताधारी दल के साथ-साथ विपक्ष की जिम्मेदारी भी बने l  मध्यप्रदेश में निरंतर बढ़ता हुआ मतदान समृद्ध लोकतंत्र का सन्देश देता है l समृद्ध लोकतंत्र से समृद्ध और विकसित मध्यप्रदेश की संभावना बलवती होती है l

(लेखक भाजपा मीडिया संपर्क विभाग के प्रदेश संयोजक हैं )

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