Monday , 28 September 2020
समाचार

सनातन धर्म ही राष्ट्रीय अस्मिता है – राज्यपाल श्री ओमप्रकाश कोहली

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भारतीय अस्मिता दैनंदिन कार्यों में अभिव्यक्त होना चाहिये – श्री सुरेश सोनी
भंडारण और संचय की प्रवृत्ति उचित नहीं – स्वामी श्री अवधेशानंद गिरि
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भोपाल, 12 नवम्बर। राज्यपाल श्री ओमप्रकाश कोहली ने कहा है कि सनातन धर्म ही राष्ट्रीय अस्मिता है। यह सार्वभौमिक और शाश्वत होती है। इसे आधुनिक संदर्भों में परिभाषित और अभिव्यक्त करना होगा। वे आज यहाँ ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ विचारकों और कर्मशीलों के तीन दिवसीय ‘लोक मंथन’ कार्यक्रम के शुभारंभ सत्र को संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम संस्कृति विभाग, भारत भवन और प्रज्ञा प्रवाह द्वारा आयोजित किया गया।

श्री कोहली ने कहा कि उपनिवेशवादी मानसिकता आज बाजार, उत्पादों, जीवन-शैली और भूमंडलीकरण के रूप में उपस्थित है। इससे निपटने के लिये स्वदेशी आंदोलन की जरूरत है। उन्होंने कहा कि यदि राष्ट्रीय अस्मिता मजबूत है, तो औपनिवेशवादी मानसिकता का कोई भी प्रकार या स्वरूप नुकसान नहीं पहुँचा सकता। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय अस्मिता और सनातन धर्म शाश्वत होने के बावजूद धूमिल पड़ सकते हैं। इसे समय-समय पर साफ करने की जरूरत है।

श्री कोहली ने कहा कि भारत में मुगलों के आक्रमण के बाद भी भारत के लोक ने राष्ट्रीय अस्मिता को बिखरने नहीं दिया लेकिन अंग्रेजी शासन ने इस पर गहरा आधात किया। भक्ति आंदोलन ने भारत की सांस्कृतिक पहचान को बनाये रखा। उन्होंने कहा कि मुगल शासन के बावजूद हिज्री संवत स्वीकार नहीं किया। आज राष्ट्रीय अस्मिता के संरक्षण की जरूरत है। इसे जन-मानस के आचार-विचार में अभिव्यक्त होना चाहिये।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह-सरकार्यवाह श्री सुरेश सोनी ने अपने बीज वक्तव्य ‘राष्ट्र की लोकाभिव्यक्ति” में कहा कि भारत की अस्मिता को दैनंदिन कार्यों और हर विषय में अभिव्यक्त होना चाहिये। उन्होंने कहा कि एक से अनेक होने और फिर अनेक से एक बने रहने की मूल भावना और दर्शन भारतीय जीवन में अभिव्यक्त हुआ है। इसी से औपनिवेशिक दुष्परिणाम से मुक्ति मिलेगी। उन्होंने राष्ट्र और नेशन के अंतर को समझाते हुए बताया कि भारत ने एक राष्ट्र के रूप में दूसरों को ज्ञान और कौशल देकर समृद्ध किया। आज भारतीय अस्मिता के माध्यम से बदलाव की प्रक्रिया का उपकरण अपनाने की जरूरत है। भारत एक है और अखंड है क्योंकि यहाँ की अस्मिताओं में समन्वय रहा है।

जूना अखाड़ा के महामंडलेश्वर स्वामी श्री अवधेशानंद गिरि ने कहा कि विज्ञान ने नींद छीन ली ओर मानसिक चेतना कुंद हुई है। शास्त्रों में कहा गया है कि मन की चिंता करो। भारतीय ऋषियों ने मन की चिंता की, पदार्थ की नहीं। पश्चिम के लिये विश्व एक बाजार है जबकि भारतीय दर्शन और धार्मिक परंपराओं में विश्व को परिवार माना गया है। उन्होंने कहा कि भोग की प्रवृत्तियाँ बढ़ रही हैं। भंडारण और संचय की प्रवृत्ति उचित नहीं है। उन्होंने आर्थिक क्षेत्र में लिये गये हाल के निर्णय के संदर्भ में कहा कि इससे संग्रह की प्रवृत्ति पर रोक लगेगी। यह निर्णय भारत में बड़ा परिवर्तन लाने वाला है। देश का बड़ा रूपांतरण होगा। उन्होंने कहा कि राष्ट्र का नागरिक होने के नाते यह भी याद रखने की जरूरत है कि समाज का भी ऋण है, इसे चुकाना होगा। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में अधिकारों के प्रति जागरूकता आई है लेकिन कर्त्तव्यों के प्रति उदासीनता भी बढ़ी है। उन्होंने कहा कि लोक-मानस को पवित्र रखने का संकल्प लेना होगा। अच्छा और बड़ा दिखने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। अच्छा और बड़ा बनने पर ज्यादा ध्यान देना भी जरूरी है।

मुख्यमंत्री श्री चौहान द्वारा बनाये गये आनंद मंत्रालय के संदर्भ में उन्होंने कहा कि पदार्थ से आनंद नहीं मिलता। जब तक प्रकृति, अपने मूल और निजता में नहीं लौटेंगे, खुशी नहीं मिलेगी। आत्मानुभूति ज्यादा जरूरी है। उन्होंने कहा कि लोक मंथन में शासक, प्रशासक और उपासक को एक मंच पर लाने के लिये श्री चौहान ने राजा हर्षवर्धन और विक्रमादित्य की परंपरा निभायी है। राज्यसभा सदस्य श्री विनय सहस्त्रबुद्धे ने ‘लोक मंथन’ की परिकल्पना और आयोजन की रूपरेखा पर प्रकाश डाला।

              मुख्यमंत्री श्री चौहान ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि राष्ट्रवादी विचार पंरपराओं की श्रंखला में प्रदेश में छह बड़े आयोजन सफलतापूर्वक संपन्न हुए हैं। उन्होंने कहा कि भारत महान राष्ट्र है। जब विकसित देशों में लोग पेड़ों की छाल से तन ढँकते थे तब भारत में रेशम और मलमल बनते थे। नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय थे। जब कई विकसित देशों का अस्तित्व नहीं था तब भारत में वेदों की रचना हो चुकी थी। यहाँ का ज्ञात इतिहास पाँच हजार सालों का है। उन्होंने कहा कि भारत की लोक विरासत अत्यंत विराट और समृद्ध है। इसी भूमि ने विश्व को कई उदात्त नैतिक सिद्धांत दिये हैं। उन्होंने कहा कि लोक मंथन के माध्यम से उपलब्ध हुए अमृत विचारों को राज्य सरकार द्वारा सघन रूप से प्रचारित-प्रसारित किया जायेगा।

राज्यपाल एवं मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने इस अवसर पर चार किताबों का विमोचन किया। संस्कृति राज्य मंत्री श्री सुरेन्द्र पटवा ने अतिथियों को स्मृति-चिन्ह भेंट किये। प्रमुख सचिव संस्कृति श्री मनोज श्रीवास्तव ने आभार व्यक्त किया। विधानसभा अध्यक्ष श्री सीताशरण शर्मा, पूर्व केन्द्रीय मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी, प्रज्ञा प्रवाह के संयोजक श्री सदानंद सप्रे, प्रदेश के जनसम्पर्क, जल संसाधन और संसदीय कार्य मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा एवं बड़ी संख्या में विद्वान एवं शोधकर्ता उपस्थित थे।

“राष्ट्र सर्वोपरि” विचारकों एवं कर्मशीलों के राष्ट्रीय विमर्श लोक-मंथन 2016 का लोकामृत
त्रिदिवसीय लोक-मंथन में ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ के भाव पर देश-काल-स्थिति के संदर्भ में विमर्श में देश-विदेश के विद्वानों, विचारकों और कर्मशीलों की सहभागिता रही। समाज जीवन पर औपनिवेशिकता के कुप्रभाव का गहरा विश्लेषण हुआ। सामूहिक मंथन से निकले नवनीत के आधार पर समस्त लोकहित के लिये राष्ट्र के उन्नयन के लिए हम सब समर्पित, विमर्श का निष्कर्ष रहा। मंथन में यह तथ्य रेखांकित हुआ कि अनेक ज्ञात-अज्ञात कर्मशील औपनिवेशक मानसिकता से स्वयं बाहर आकर औरों को भी इस राष्ट्र और समाज की मूल अस्मिता और स्वभाव का सही अहसास जगाने में दशकों से सक्रिय हैं। ऐसे सराहनीय एवं सम्मानीय लोक प्रयासों के कारण भारत की आत्मा पुनर्जागृत हो रही है। इस राष्ट्रीय पुनर्जागरण की बेला में समाज की अन्यान्य अस्मिताओं का कुछ तत्वों द्वारा अपनी स्वार्थ साधना के लिए दुरूपयोग किया जा रहा है। मंथन में यह उभरकर सामने आया कि इस चुनौती को स्वीकार कर एक राष्ट्र-एक जन का मंत्र जगाते हुए, व्यापक राष्ट्रीय अस्मिता को सुदृढ़ करना एक राष्ट्रीय कर्त्तव्य है। लोक-मंथन विमर्श का यह सुविचारित मत रहा कि समाज जीवन में विभिन्न समानांतर अस्मिताओं का एक महत्वपूर्ण स्थान है। इन सभी अस्मिताओं का समुचित विकास होकर, वे राष्ट्र के समग्र उन्नयन में अपनी महती भूमिका का निर्वहन करें, यह भी अनिवार्य है। अपनी मूल व्यापक राष्ट्रीय पहचान की ओर बढ़ते हुए कला, साहित्य, नाटक, फिल्म, शोध तथा मीडिया के माध्यम से अपनी अभिव्यक्ति को देशज परंपराओं से जोड़ने के भी सराहनीय प्रयास हो रहे हैं। इन प्रयासों का स्वागत करते हुए उन्हें अधिक सशक्त और सर्वस्पर्शी बनाने की आवश्यकता ध्यान में आयी।
लोक-मंथन का लोकामृत
  1. भारत के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक-हर क्षेत्र की नीति और कार्य का उद्देश्य जन-जीवन में राष्ट्रत्व का उन्नयन करना।
  2. भारत की एकात्मता सदैव रूपों में अभिव्यक्त होती है। यही हमारी राष्ट्रीय पुनर्निर्माण की आधारशिला है।
  3. औपनिवेशिकवाद पर आधारित मानसिकता को राष्ट्रीय विचारों से प्रतिस्थापित करने के लिए विभिन्न स्तरों, रूपों एवं आयामों में ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ आधारित विमर्श आयोजित करना।
  4. सामाजिक व्यवस्थाओं, आर्थिक रचनाओं एवं लोकतंत्र के साधनों के देशज विकल्पों का निरंतर अन्वेषण एवं प्रतिपादन।
  5. विश्वविद्यालयों में शिक्षा एवं शोध में औपनिवेशवाद के कारण हो रही हानि का आकलन एवं औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति की प्रक्रिया और उपायों का सम्मिलित किया जाना।
  6. उपनिवेशवाद की प्रवृत्तियों के विपरीत देशज विचार को स्थापित करने वाले साहित्य, कला, रचनाओं, फिल्मों, टेलीविजन कार्यक्रमों एवं सोशल मीडिया पर प्रचलित संवाद इत्यादि को प्रोत्साहित एवं सम्मानित करना।
  7. एकात्मता के विभिन्न स्वरूपों को दर्शाती एवं अस्मिताओं को स्थापित करती लोक- परम्पराओं एवं लोक-कलाओं का केवल संरक्षण ही नहीं, अपितु उनके विकास के लिए सुनियोजित वातावरण बनाना।
  8. समाज की विविध अस्मिताओं में अंतर्निहित राष्ट्रीय एकात्मता को सुदृढ़ करने के लोक प्रयासों का नियोजन।
तीन दिवसीय लोक-मंथन ने पाया कि नित्य नूतन-चिर पुरातन भारतीय संस्कृति की आत्मा है। काल सुसंगत जीवन विकास क्रम की पोषक भारत की सांस्कृतिक परम्परा सदैव आधुनिकता, खुलेपन, नव-नवीन, ज्ञान-विज्ञान तथा नवोन्मेषशालिनी प्रतिभा का स्वागत ही नहीं, समावेश करती रही है। इस गौरवपूर्ण धरोहर को देश-काल-स्थिति के अनुरूप अपने वैयक्तिक, सामाजिक एवं व्यावसायिक जीवन में समृद्ध करते रहने को ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ विचारक और कर्मशील अपना पवित्र कर्त्तव्य मानते हैं।

राष्ट्रीयता और उदारीकरण एक दूसरे के विरोधी नहीं-मुख्यमंत्री श्री चौहान

भारत की राष्ट्रीयता ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की पोषक : डॉ. जोशी
नव-उदारीकरण और भूमंडलीकरण के दौर में राष्ट्रीयता ’’ पर व्याख्यान
मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि भारत की माटी और संस्कृति में उदारीकरण और भूमंडलीकरण है। राष्ट्रीयता और उदारीकरण एक दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि एक ही है। मुख्यमंत्री श्री चौहान आज यहाँ ‘लोक-मंथन’ के दूसरे दिन “नव-उदारीकरण और भूमंडलीकरण के दौर में राष्ट्रीयता’’ विषय पर आयोजित सामूहिक सत्र को संबोधित कर रहे थे।
श्री चौहान ने कहा कि भारत में हजारों वर्ष पहले “वसुधैव कुटुम्बकम्’’ की बात कही गयी है। यह उदारीकरण ही है। भारत में हमेशा विचारों की स्वतंत्रता रही है। पश्चिम में राजतंत्र के बाद स्वतंत्रता और समानता के उद्देश्य को लेकर प्रजातंत्र का जन्म हुआ। औद्योगिक क्रांति के बाद शोषण के विरूद्ध सर्वहारा के लिये साम्यवाद का जन्म हुआ। साम्यवाद और इसके बाद पूँजीवाद में भी मनुष्य का सुख संभव नहीं हो पाया। मनुष्य के लिये शरीर के साथ मन, बुद्धि और आत्मा का सुख भी जरूरी है। भारतीय संस्कृति में धर्म, अर्थ,काम, मोक्ष और पुरूषार्थ के माध्यम से जीवन संचालन की व्यवस्था की गयी है। मनुष्य केवल व्यक्ति नहीं समाज भी है इसलिये समाज के सुख पर भी विचार करना होगा। भारतीय दर्शन का मूल है कि एक ही चेतना सर्वव्याप्त है। प्रकृति का शोषण नहीं बल्कि दोहन करना चाहिये। विश्व को यही सनातन विचार राह दिखा सकता है।
मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने ‘एकात्म मानव-दर्शन’ का विचार दिया, जो भारतीय परंपरा पर आधारित है। उन्होंने कहा कि जीवन में अर्थ का अभाव नहीं होना चाहिए और अर्थ का प्रभाव भी नहीं होना चाहिए। उन्होंने केन्द्र सरकार के निर्णय का जिक्र करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 500 और 1000 के नोट बंद करके अर्थ का प्रभाव समाप्त कर दिया है। इस निर्णय से काला धन, फर्जी मुद्रा और आतंकवाद की फंडिंग समाप्त हो जाएगी।
 पूर्व केन्द्रीय मंत्री एवं भारतीयता के विचारक डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि भारत की राष्ट्रीयता ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की पोषक है जबकि वैश्वीकरण केवल आर्थिक चिंतन है। दोनों में भेद तो है किन्तु समन्वय की जरूरत भी है। पश्चिमी चिंतन में संसार को निर्मित करने वाला संसार के बाहर रहता है, बनाता भी है और सजा भी देता है। मनुष्य को पृथ्वी के उपभोग के लिए भेजता है। पश्चिमी चिंतन में यह माना जाता है कि प्रकृति जड़ है और विचार नहीं कर सकती इसलिए उसका उपभोग करने की स्वतंत्रता है।
       डॉ. जोशी ने कहा कि कहा जा रहा है कि ग्लोबलाईजेशन गरीब और गरीब देशों के लिए नहीं है। इसके मूल में भी पश्चिमी चिंतन है कि चेतन अचेतन का शोषण कर सकता है। भारतीय संस्कृति में अर्थ चिंतन का आधार अर्थायाम है अर्थात संतुलन। जरूरत से ज्यादा भी नहीं और आवश्यकता से कम भी नहीं। पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव हम पर भी हो रहा है। परिवार हमारी मूल संस्था है इसका टूटना विश्व का टूटना है। आज का ग्लोबलाईजेशन व्यष्टि, समष्टि और परमेष्टि में बाधा डालता है। समृद्धि से शांति नहीं मिलती इसका संतुलन भारत से समझना होगा। पश्चिम को केवल बाजार चाहिए। हमें परिवार भी चाहिए बाजार भी चाहिए।
     नीति आयोग के सदस्य डॉ. विवेक देबोराय ने राष्ट्रीयता के परिपेक्ष्य में स्वामी विवेकानंद का उदाहरण देते हुए कहा कि भारत की जनता मोक्ष पर विश्वास करती है। सत् चित् आनंद में विश्वास करती है। यदि मुझे भारत पर गर्व नहीं है तो इसका अर्थ है कि मुझे स्वयं पर भी गर्व नहीं है। ग्लोबलाईजेशन के नाम पर हमारी हजारों वर्ष पुरानी संस्कृति पर खतरा मंडरा रहा है। हम अपनी संस्कृति और परंपरा को भी नहीं जानते। हमारे पैंतीस हजार शास्त्रों में से उन्नीस हजार का अनुवाद भी नहीं हुआ है।

मिली-जुली संस्कृति रही है भारत की

“दलित और वंचित आख्यान में बदलाव” सत्र में वक्तागण

समाज के बौद्धिक वर्ग की जिम्मेदारी है कि वह सामंजस्य स्थापित करने के प्रयास करें। समता वर्ग समाज की स्थापना के लिये आक्रमण के बजाय समाधानकारक चर्चा की जाना चाहिये। दलितों का भी राष्ट्र निर्माण में योगदान रहा है। उनका उल्लेख भी होना चाहिये । भारत की मिली-जुली संस्कृति रही है। पक्ष और विपक्ष हमेशा ही यहाँ विद्यमान रहा है। यह बात दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर डॉ. कौशल पवार ने ‘दलित और वंचित आख्यान में बदलाव (दलित पहचान, दलित साहित्य, दलित मीडिया एवं व्यवसाय, भारतीय दलित आंदोलन एवं पश्चिम का नस्ल भेद) सत्र में व्यक्त किए।
डॉ. पवार ने कहा कि आदिवासी गीतों के आख्यान अभी तक पहचाने नहीं गए हैं, उन पर शोध होना चाहिये। देश में प्राचीन काल में दलित साक्षर थे। महर्षि वाल्मीकी इसके उदाहरण हैं। इसके बाद ऐसा क्या हुआ कि दलित निरक्षर हो गए। उन्हें श्रम आधारित व्यवस्था से जोड़ दिया गया। उन्होंने कहा कि तकनीक से जोड़े जाने के कारण आज उन पेशों में भी सवर्ण जाति के लोग आ रहे हैं, जो पहले दलितों के लिये ही थे।
पूर्व केन्द्रीय मंत्री डॉ. संजय पासवान ने कहा कि व्यक्ति की अस्मिता को जाति के बाद राष्ट्रीय पहचान से जोड़ा जाना चाहिये। आरक्षण बड़ा विवाद का विषय बन रहा है और समाज इस पर चर्चा में दो भाग में विभाजित हो जाता है। इस टकराव को समाप्त करने के लिये चिंतन किया जाना चाहिये।
डॉ. संजीव शर्मा ने कहा कि वर्तमान व्यवस्थाओं में जो विसंगति सामने आ रही है उसका कारण राज्य से बहुत अधिक अपेक्षा होना है। हमने राज्य आधारित प्रशासनिक व्यवस्था को स्वीकार कर सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं के महत्व को नगण्य कर दिया है। हम राज्य से ही अपनी आकांक्षाओं की पूर्ति करना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि हमारी सांस्कृतिक एवं बौद्धिक परम्परा में बहुत कुछ ऐसा है जो गौरव करने लायक है और श्रेष्ठ है, उसे स्वीकार करना चाहिये।
आईएएस अधिकारी श्री मुकेश मेश्राम ने कहा कि वर्तमान व्यवस्था में आंदोलनबाज़ी बहुत हो रही है लेकिन समाधान नहीं मिलता। प्रतिरोध और गतिरोध के बीच विभेद करते हुए समाधान निकालना चाहिये। उन्होंने कहा कि देश में श्रम को शर्म से जोड़ दिया गया है और श्रम करने वालों को निचले दर्जे का माना गया है। वहीं बौद्धिक काम करने वाले को ऊँचा दर्जा दिया गया है। विदेशों में ऐसी स्थिति नहीं है। उन्होंने कहा कि काले धन पर सर्जिकल स्ट्राइक से आने वाले समय में सामाजिक और आर्थिक समरसता पैदा होगी और सरकारी नौकरी का जो आकर्षण है वो समाप्‍त हो जाएगा। उन्होंने कहा कि जातिवादी व्यवस्था से रंगभेद को जोड़े जाने की प्रवृत्ति खतरनाक है। इससे विदेशी संस्थाएँ चंदा देकर संस्थानों को प्रोत्साहित करेंगी और यह भारत की सामाजिक समरस्ता के लिये बहुत खतरनाक होगा। सत्र की अध्यक्षता पण्डवानी गायिका सुश्री तीजन बाई ने की। उन्होंने कहा कि वह परिश्रम और साधना करते हुए यहाँ तक पहुँची हैं।

परम्परा का आधुनिकता से बैर नहीं

“आधुनिकता की अवधारणा और जीवन-शैली” सत्र सम्पन्न

लोक-मंथन के दूसरे दिन समानांतर सत्र के दौरान ‘आधुनिकता की आवधारणा एवं जीवन-शैली” विषय पर डॉ. अनिर्बान गांगुली, अद्वैत काला तथा केन्द्रीय कपड़ा मंत्री श्रीमती स्मृति जुबीन ईरानी ने अपने विचार रखें।

समझना ही आधुनिकता है

केन्द्रीय कपड़ा मंत्री श्रीमती स्मृति ईरानी ने कहा कि आधुनिकता और अधुनिकीकरण में फर्क करना सीखना होगा। उन्होंने कहा कि पाश्चात्य विचारों में शक्ति,सफलता एवं धन संग्रह पर जोर है। वहाँ उपभोग और प्रतिस्पर्धा पर बल दिया जाता है। भारतीय परम्परा के केन्द्र-बिंदु में परिवार, सम्मान और सहयोग है। आधुनिकता का मतलब सभी के विचार-बिंदुओं को समझना है। हमारी भारतीय परम्परा जीवन जीने का तरीका सिखाती है। दूसरी ओर पाश्चात्य विचार जीवन-शैली पर ध्यान देते हैं। आधुनिकता तो हमेशा परम्परा से ही आती है, क्योंकि उसमें समस्याओं का उत्तर देने की क्षमता होती है। हिन्दुस्तान अपनी जीवन-शैली कभी नहीं भूलेगा। उन्होंने कहा कि परम्परा और आधुनिकता जल की धारा की तरह है। इसमें अंतर करना मुश्किल है। यह तो केवल प्रतीकात्मक है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि संस्कार मजबूत होने से संस्कृति भी मजबूत होती है।

सुश्री अद्वैता काला ने कहा कि आधुनिकता की विडंबना है कि आज इसे जीवन-शैली से मिला दिया गया है। आज इसे आप हर आयु में देख सकते हैं। यह छोटा- बड़ा हर प्रकार का है। हर कोई इसे अपने तरीके से परिभाषित करता है और इस पर अपना निर्णय देता है। आधुनिकता को जीवन-शैली से मिला देने पर गंभीर और चिंताजनक परिणाम आए हैं। कोई इस आधुनिकता को बोल-चाल और पहनावे से परिभाषित करता है तो कोई इसमें मूल्य और दर्शन को महत्व देता है। आधुनिकता दर-असल एक पैराडाइम शिफ्ट है जो हमारे दिमाग की प्रगति से जुड़ा है और युग के अनुसार बदलता रहता है। आधुनिकता का क्षेत्र व्यापक है यह तकनीक, कला और शिक्षा हर चीज़ से जुड़ा है। इसने हमें अमानवीय भी बनाया है कुछ-कुछ मशीन की तरह। मैं इसकी आलोचना नहीं कर रही पर हम में से हर किसी को, परम्परा को अस्वीकार करने से पहले यह पूछना चाहिए कि हम इसे क्यों अस्वीकार कर रहे हैं ? परम्परा और अधुनिकता एक सतत् प्रक्रिया है। आधुनिकता और जीवन-शैली के प्रति हमें सही समझ विकसित करनी होगी। इससे हमारे संबंधों की समझ भी विकसित होगी। ऐसा विवेक और प्रेरणा हम कालातीत वेदों से ही प्राप्त कर सकते हैं। यह हमारे स्वास्थ्य और समृद्धि को भी बढ़ाने वाला है। आधुनिकता के छलावे से लड़ना आज एक चुनौती है। इसे आपसी मतभेदों से नहीं वरन् अपनी संस्कृति, मूल्यों और आर्दशों की सही समझ से विकसित करना होगा। हमारे मूल्य तब से लेकर आज तक विकसित ही हो रहे हैं।

 हमारी सभ्यता आधुनिकता से भी संवाद करती है

डॉ. अनिर्बान गांगुली ने कहा कि परम्परा और जीवन-शैली हमारी चितंन प्रक्रिया को प्रभावित करती है। ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली ने हमारे भीतर इच्छा और महत्वाकांक्षा को जगाया। इससे एक पौलिटिकल हैजीमनी बनता है, जिससे परम्परा क्षतिग्रस्त होती है और हमारी विश्व दृष्टि जड़विहीन हो जाती है। आधुनिकता मतलब पाश्चात्यकरण नहीं है। यह बात वर्ष 1965 में ही पं. दीनदयाल उपाध्याय ने कही थी। मैकाले का एक ही मकसद था भारतीयों को उनकी जड़ों से काट देना। अरबिंदो ने भी इस बात पर जोर दिया है कि हम किसी भी बाहरी विचार को अपनी शर्तों पर स्वीकार करें। हमारी आधुनिकता ऐसी होनी चाहिए, जो जीवन-शैली से मेल खाती हो। हमें हर हाल में भारतीयता को सुरक्षित रखना है।

परिवार ही समाज और राष्ट्र का केन्द्र बिन्दु : महिला-बाल विकास मंत्री श्रीमती चिटनिस

महिला शक्ति-भारत तथा पश्चिम में अतीत से वर्तमान तक पाश्चात्य महिला विमर्श एवं परिवार की संकल्पना

लोक-मंथन में ‘महिला-शक्ति-भारत तथा पश्चिम में (अतीत से वर्तमान पाश्चात्य महिला विमर्श एवं परिवार की संकल्पना)” सत्र की अध्यक्षता करते हुए महिला-बाल विकास मंत्री श्रीमती अर्चना चिटनिस ने कहा कि महिला परिवार की धुरी है और परिवार समाज और राष्ट्र का केन्द्र-बिंदु है। श्रीमती चिटनिस ने कहा कि आज सामाजिक-स्तर पर व्याप्त समस्याओं का मूल कारण कहीं न कहीं अपनी सनातनी परम्पराओं से कटना है। श्रीमती चिटनिस ने कहा कि भारतीय महिलाएँ अपने परिवार को छोड़ने की कीमत पर किसी भी तरह की व्यक्तिगत उपलब्धि के बारे में कल्पना भी नहीं करना चाहती।

सुश्री ज़ाकिया सोमन ने कहा कि हमारे देश में सेक्यूलरिज्‍म की जो परिभाषा लंबे समय से चली आ रही है उसमें समस्या है। उसे सुधारने की आवश्यकता है। सुश्री ज़ाकिया ने कहा कि कुरान में मानव सभ्यता के विकास के लिये एक जोड़े को भेजने की बात कही गई है लेकिन इस पर कई तरह की भ्रांतियाँ फैला रखी गई हैं। आज यह सोचने की जरूरत है कि मुस्लिम महिला समाज का नेतृत्व क्यों नहीं कर सकती। नई सोच समझ कर युवाओं को मुस्लिम समाज का लीडर क्यों नहीं बनाया जा सकता। उन्होंने बताया कि कुरान के सिद्धांत जस्टिस, काइंडनेस, कम्पेशन और विज्डम के आधार पर भारतीय महिलाओं को भी बराबरी का हक़ मिलना चाहिये।

सुश्री ज़ाकिया सोमन ने बताया कि वह भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन के माध्यम से पिछले दस साल से मुसलमान महिलाओं को बराबरी का हक़ दिलाने के लिये संघर्ष कर रही हैं। उनका संगठन पन्द्रह राज्य में काम कर रहा है। वर्ष 2014 में उन्होंने मुस्लिम फैमिली लॉ का ड्राफ्ट तैयार कर प्रस्तुत किया है। सुश्री ज़ाकिया ने बताया कि देश का साठ से सत्तर फीसदी मुसलमान तीन तलाक पर रोक चाहता है। उन्‍होंने मुस्लिम फैमिली एक्ट बनाने की मांग उठाते हुए कहा कि तीन तलाक, हलाला और बहुविवाह का प्रावधान खत्म होना चाहिये और इसे दंडात्मक बनाया जाना चाहिये।

सुश्री नयना सहस्त्रबुद्धे ने कहा कि भारतीय सनातन परम्परा में शक्ति अपने आप में स्त्री का प्रतीक है। मौजूदा दौर में हम अपनी परम्पराओं से कटते चले गए जिसके फलस्वरूप आदर्श और व्यवहार में अंतर साफ दिखाई देता है, इसे कम करना ज़रूरी है। उन्होंने कहा कि वैदिक काल में स्त्रियों का स्थान सर्वोपरि था लेकिन बाद के काल में महिलाओं की स्थिति काफी दयनीय हो गई। लेकिन यह मान लेना कि महिला मुक्ति का आंदोलन पश्चिम की देन है सही नहीं है। हमारे देश में भी अलग-अलग कालखण्डों में महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिये काम किये गये।

सुश्री सहस्त्रबुद्धे ने कहा कि धर्म-सत्ता या राज-सत्ता जब भी महिला पर हावी हो जाती है तो उसका जीवन मुश्किलों से भर जाता है। पश्चिम में जहाँ एकलवाद पर ज़ोर दिया गया वहीं भारतीय संस्कृति सामूहिकता पर आधारित है। उन्होंने कहा कि न्याय, नैतिकता और आध्यात्मिकता का विचार देश में ज़ोर पकड़ रहा है। ऐसी अनुकूल परिस्थितियों में भारतीय स्त्रीवाद के विचार को आगे बढ़ाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि भारतीय परिवार की परिकल्पना बहुत व्यापक है। यह न केवल स्त्री या पुरूष बल्कि पूरे परिवार और समाज को साथ लेकर आगे बढ़ने की बात कहती है।

सुश्री प्रज्ञा तिवारी ने कहा कि भारत का समाज बहुरंगी है, जबकि पश्चिम में फैमिनिज्म की सोच बिलकुल अलग है। हमारे देश में लोकतंत्र की स्थापना के साथ ही महिलाओं को मताधिकार मिल गया वहीं पश्चिमी देशों में वोट देने का हक़ पाने के लिये महिलाओं को लंबा संघर्ष करना पड़ा। उन्‍होंने भारतीय महिलाओं की बेहतरी के लिये बनाई जाने वाली नीतियों की चर्चा करते हुए कहा कि हमारे देश के सामाजिक, सांस्कृतिक ढाँचे को समझे बिना बनाई जाने वाली नीतियाँ कभी भी महिलाओं के लिये लाभकारी साबित नहीं हो सकती। सामाजिक संस्कृति के ताने-बाने को तोड़ने के प्रयासों की आलोचना करते हुए देश के विचारकों एवं कर्मशील विद्वानों ने ‘लोक-मंथन” के मंचों से आह्वान किया है कि हमें अपनी प्राचीन संस्कृति, संस्कार, रहन-सहन एवं राष्ट्रीय परंपराओं को और सुद्दढ़ करते हुए आगे बढ़ना होगा। विकास का अर्थ यह कतई नहीं है कि हम अपने मूल संस्कारों को भूल जाएं और पश्चिमी परिवेश को अपना लें। हम आगे तो बढ़ें परन्तु अपनी प्राचीन धरोहरों को लेकर मन में हीन भावना भी नहीं आने दें।

राष्ट्र के विविध पक्षों को समाहित करते हुए तीन दिनी इस राष्ट्रीय विमर्श में एक स्वर में पश्चिमी आब’ओ-हवा को नहीं अपनाने पर जोर दिया गया।

बौद्धिक सत्रों में औपनिवेशिक मानसिकता पर अनेक वक्ताओं ने तथ्यों के साथ भारत का पक्ष रखा और कहा कि भारत की नींव और भारत का इतिहास प्राचीन, समृद्ध और ऐतिहासिक है। पश्चिमी देश आज अपने अस्वित्व से लड़ रहे हैं। कई देश टूट चुके हैं, कुछ बिखर चुके हैं। इन हालातों में हमें अपनी प्राचीन संस्कृति की ओर निहारना होगा, जो आज भी अडिग है। भारत की प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति का दुनिया में कोई मुकाबला नहीं।

पश्चिमी आधुनिकता का मॉडल हमारे किसी काम का नहीं

“राष्ट्रीयता- आधुनिकता का विरोध नहीं” सत्र का निष्कर्ष

लोक-मंथन में राष्ट्र सर्वोपरि थीम पर चल रहे वैचारिक सत्रों की श्रंखला में ‘राष्ट्रीयता- आधुनिकता का विरोध नहीं” विषय पर चर्चा आरंभ करते हुए श्री हिन्दोल सोन गुप्ता ने कहा कि भारत में जन्में व्यक्ति को पुरातन से ही संस्कार और संस्कृति मिलती है। वह जीवन पर्यन्त उसी संस्कृति का निर्वहन करता है। हमारा संस्कार आधुनिक है और उसे हम निरंतर अपने जीवन में आत्मसात् कर रहे हैं। हमारा भारत अखंड है जिसमें अलग-अलग जाति, धर्म, रंग, वेश-भूषा, बोली, संगीत दिखाई देते हैं। फिर भी वह एक अखंड मंडलाकार आकृति में समाहित है। यह सच है कि पश्चिमी संस्कृति में विविधता न होकर एक मत, एक चमड़ी, एक वेश-भूषा, एक बोली को बढ़ावा मिलता है। यह हम पर भी थोपने के प्रयास हुए हैं जो अभी तक असफल ही कहे जा सकते हैं।

चर्चा में भाग लेते हुए श्री बलदेवभाई शर्मा ने आधुनिकता को लेकर ग्वालियर का कंघा प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा कि हम छोटी-छोटी बातों से हीन भावना से ग्रसित हो जाते हैं। जबकि आधुनिकता रहन-सहन का विचार नहीं हो सकती। पहनावा और अन्य रहन-सहन के तरीके बदलते रहते हैं जबकि आधुनिकता एक विचार दृष्टि है। वह जीवन का मूल तत्व है, जो जीवन का निर्धारण करती है। भारत का राष्ट्रवाद गौरवशाली रहा है। हमें राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद में से राष्ट्रीयता का चयन करना चाहिए और आधुनिकता को लेकर किसी भी तरह की ग्रंथी (हीन भावना) से बाहर निकलना होगा, तभी हमारा समाज सुदृढ़ हो सकेगा।

सत्र में डॉ. श्यामसुन्दर दुबे ने गाँव की वैभवशाली परंपराओं, संस्कृतियों, गीत-संगीत को सार्वभौमिक बताते हुए कहा कि पहले गाँव के आँगन में बैठकर लोकगीत गाए जाते थे जिन्हें नई पीढ़ी भी सुनती थी। आज रेडियो, टेलीविजन और नए मीडिया ने लोगों की दूरियाँ बड़ा दी हैं। इस कारण हमारी जो मूल संस्कृति थी, वह पीछे छूट गई है। खेती को हम सबसे श्रेष्ठ मानते थे, आज कोई खेती करना नहीं चाहता। किसानों के बच्चों में भी हीन भावना बैठ गई है। वह भी किसी अधिकारी, उद्योगपति और राजनेता की तरह बाजार में रहना पसंद कर रहे हैं, गाँव से पलायन हो रहा है, जबकि हमारी संस्कृति और आधुनिकता गाँव में बसती है।

सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो. गिरीशचंद्र त्रिपाठी ने कहा कि हमें पश्चिम की नकल को छोड़ना होगा। भारत की मिट्टी लोक की मिट्टी है। हमारे यहाँ गीत-संगीत, खेती-किसानी और अनेक उद्यम वर्षों से आधुनिकता को बढ़ावा दे रहे हैं। हमारे यहाँ राष्ट्रीयता में संकीर्णता को कोई स्थान नहीं है। हमारा राष्ट्रवाद आधुनिकता का विरोधी नहीं है। परंतु हमे नकल और हीन भावना से बचना होगा। पश्चिमी दृष्टि ने हमें आधुनिकता का जो मॉडल दिया है, वह हमारे किसी काम का नहीं है।

“राष्ट्रीय अस्मिता एवं अन्य पहचानों का समायोजन सत्र में विमर्श सम्पन्न

श्री मिलिंद कांबले, प्रो. अशोक मोडक और श्री तारेक फतेह हुए शामिल

राष्ट्रीय विमर्श ‘लोक-मंथन’ के दूसरे दिन दलित इंडियन चैंबर आफ कामर्स एंड इंडस्ट्री के प्रमुख श्री मिलिंद कांबले ने ‘राष्ट्रीय अस्मिता और अन्य पहचानों का समायोजन’ विषय पर नैमिषारण्य सभागृह में हुए विमर्श में कहा कि दलित अब मांगने वाला नहीं देने वाला बन रहा है। हमारे संगठन का ध्येय सवा लाख नए उद्यमी खड़े करने का है। इसके लिए हमें समूचे समाज का सहयोग चाहिए।

श्री कांबले ने कहा कि डा. बाबा साहेब आंबेडकर ने विषमता के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी। भारत ही नहीं पूरी दुनिया में इस तरह के संघर्ष हुए हैं। साउथ अफ्रीका और अमरीका में हुए संघर्षों ने अश्वेतों को नया रास्ता दिखाया। मार्टिन लूथर किंग, नेलसन मंडेला जैसे नायक हमें रास्ता दिखाते हैं। श्री कांबले के अनुसार हर समुदाय की अपनी विशेषताएँ और सपने होते हैं। भारत के संदर्भ में हमने खुद को साबित किया है। भारत के विकास में दलित और आदिवासी समुदाय ने बहुत योगदान दिया है।

श्री कांबले का कहना था कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने दलितों की समस्याओं को सही संदर्भ में पहचाना है और वे उनके आर्थिक उन्नयन के लिए नई-नई योजनाओं के क्रियान्वयन पर ध्यान दे रहे हैं। देश में आज लगभग 19 करोड़ दलित और आदिवासी नौजवान हैं, जो 18 से 35 वर्ष की आयु के हैं। इस युवा पीढ़ी के सपने और आकांक्षाएँ बहुत अलग हैं। उन्होंने कहा कि दलित समाज के बौद्धिक इसे नहीं समझ पा रहे हैं, जबकि युवाओं को पता है समन्वय से ही विकास संभव है। श्री कांबले ने बाबा साहेब आंबेडकर को एक आर्थिक विचारक बताते हुए कहा कि उन्होंने हमें आर्थिक सशक्तीकरण का रास्ता दिखाया। बाबा साहेब का कहना था कि हर दस साल में करेंसी बदल दी जाए। मोदीजी ने उनके विचारों का आदर करते हुए 500 और 1000 के नोट बदलने का फैसला लिया है। उनका कहना था कि उनका संगठन एक सेल्फ रिस्पेक्ट मूवमेंट है, जो दलितों और आदिवासी समाज से नायक तलाश रहा है। बाबा साहेब ने समाज में आरक्षण से अपना स्थान नहीं बनाया बल्कि उन्होंने अपने समाज के लिए आरक्षण की व्यवस्था की। हम उनकी प्रेरणा से अब नौकरी मांगने वाले नहीं बल्कि देने वाले बन रहे हैं।

सत्र के अध्यक्ष विचारक और राजनीति विज्ञानी प्रो. अशोक मोडक ने कहा कि इस विमर्श सत्र में तारेक फतेह का भाषण सुनकर उन्हें पूर्व राष्ट्रपति डा. कलाम की याद आ गयी। डा. कलाम कहते थे मैं रामेश्वरम् का हूँ और मेरा पूरा परिवार राम को अपना पूर्वज मानता है। उन्होंने कहा कि एक तरफ ऐसे विचारक हैं जिन्हें भारत की परंपरा पर गर्व है तो दूसरी ओर ऐसे विचारक भी हैं जो देश तोड़कों को नायक के रूप में स्थापित कर रहे हैं। डा. मोडक ने कहा हमें किसी विचार और पंथ को स्वीकार करने में संकट नहीं है। हमारी संस्कृति ही समावेशी है। हम किसी पर कोई शर्त नहीं थोपते। हम सिर्फ यही चाहते हैं कि यहाँ पर रहने वाला हर नागरिक कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक इस देश की माटी के प्रति प्रतिबद्ध रहे। भारतीयता पर श्रद्धा ही एकात्मता का निर्माण करेगी। उन्होंने कहा कि भारत को नेतृत्व की भूमिका में लाने की शर्त है कि हम हमारी संस्कृति और सभ्यता का सम्मान करें।

श्री तारेक फतेह ने कहा कि पहला सवाल यह कि हम कौन है। हम में से हर एक की आँख, अंगूठा निशान अलग-अलग है। यही दुनिया में वजूद की कीमत है। इसके इर्द-गिर्द ही समाज बनता है। ये दरिया, ये पहाड़, ये जमीन और उसमें रहने वाली हमारी सभ्यता हमने नहीं बनाई, हमें विरासत में मिली है।

श्री फतेह ने कहा कि हमें हमारे दोस्त और दुश्मन की पहचान होना चाहिए। जब तक आप इसे नहीं समझोगे पठानकोट होते रहेंगे। अपनी कमजोरियों को भी जानिए। स्वीडन हो या कनाडा या अन्य पश्चिमी देश वहाँ गरीब-अमीर का भेद नहीं होता। आप ड्रायवर के साथ बैठकर तो देखिए। आप मर्सिडीज़ में पीछे घटिया सीट पर फक्र के साथ बैठते हैं और वह शहंशाह की तरह आगे बैठकर गाड़ी चलाता है। आप उसके साथ नहीं बैठते। इस कमजोरी को दूर करना पहले जरूरी है। जब जर्मनी में रहने वाला जर्मन, रूस में रहने वाला रसियन, चीन में रहने वाला चीनी, जपान में रहने वाला जापानी तो हिन्दुस्थान में रहने वाला हिन्दू नहीं तो क्या? यह हिन्दुस्थान ही है जिसने ईरान से आए पारसी, फारस से आए दाउदी बोहरा, फिलिस्तीन से आये यहूदी, सबको अपने में समेटा। आप समझ लें कि जब तक पाकिस्तान मौजूद है अमन नसीब नहीं होगा। बलूचों की मदद के लिए खड़े हुए हैं प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी। बगैर दुश्मनी किए यह साफ समझ लें कि अपनी पहचान पर हमला करने वाले की इज्जत नहीं करना।

पूर्वोत्तर राज्य तीर्थ स्थान है

“पूर्वोत्तर-वर्तमान परिदृश्य एवं संभावनाएँ सत्र में वक्तागण

भारत के इतिहास, वर्तमान और भविष्य में पूर्वोत्तर राज्यों की महत्वपूर्ण भूमिका के मद्देनजर लोक-मंथन के दूसरे दिन के दूसरे समानान्तर सत्र में पूर्वोत्तर राज्यों पर केन्द्रित विशेष सत्र का आयोजन किया गया| सुश्री सुजाता नायक की अध्यक्षता में इस सत्र में मुख्य वक्ता के रूप में डॉ. नानी गोपाल महंता, श्री रूपम बरुआ, डॉ. अनन्या बरुआ और श्री मलिंग गोम्बू उपस्थित थे| ‘पूर्वोत्तर – वर्तमान परिदृश्य और संभावनाएँ विषय पर केन्द्रित यह विमर्श विधान सभा भवन के अनुसंधान कक्ष में सम्पन्न हुआ|

सत्र में अपने अनुभवों और कार्यों के आधार पर उपस्थित सभी विचारकों और शोधार्थियों ने उपस्थित श्रोताओं से पूर्वोत्तर राज्यों की समस्याओं पर चर्चा की। साथ ही इस बात पर भी ज़ोर दिया कि पूर्व स्थित सभी राज्यों की संस्कृति में उतना ही भारत बसता है जितना किसी और राज्य में| श्री रूपम बरुआ और डॉ. नानी गोपाल महंता ने अपने वक्तव्य में पूर्वोत्तर राज्यों के ऐतिहासिक देशभक्तों का ज़िक्र करते हुए इस बात पर दुख व्यक्त किया कि इन क्रांतिकारियों और योद्धाओं का नाम भारत के इतिहास में कहीं भी दर्ज नहीं किया गया| डॉ. महंता ने विशेष रूप से कहा कि पूर्वी राज्यों और बाकी भारत के संबंध सिर्फ मानचित्र पर नहीं है बल्कि यह संबंध सभ्यता का है|

डॉ. अनन्या बरूआ के वक्तव्य का मूल इस बात पर केन्द्रित रहा कि पूर्वोत्तर राज्य के बाहर आकर पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं को भेद-भाव का सामना करना पड़ता है| इसके साथ ही उन्होंने भारतीय कलाओं में शंकर देव के योगदान पर भी बात की| श्री मलिंग गोम्बू ने पूर्वी राज्यों में लोगों की समस्याओं पर बात की| उन्होंने बताया कि पूर्वी राज्य सांस्कृतिक रूप से भारत का अभिन्न हिस्सा हैं। फिर भी आज इन राज्य में रहने वाले लोगों की सांस्कृतिक स्थिति खराब हो रही है| यह दुख की बात है कि इन राज्यों के पास तेल और चाय जैसी प्राकृतिक सम्पदा है लेकिन इसका उचित श्रेय उन्हें नहीं दिया जाता|

सत्र के समापन में अध्यक्षीय भाषण में सुश्री सुजाता नायक ने पूर्वोत्तर राज्यों के अपने अनुभव साझा किए| सुश्री सुजाता विवेकानंद संस्था में कई वर्षो से अपनी सेवाएँ दे रही हैं और पूर्वी राज्यों में उन्होंने विशेष रूप से काम किया है| सुश्री सुजाता ने इन राज्यों की अनेक परंपरागत रीतियों और उनके महत्व के बारे में बताया| उन्होंने कहा कि पूर्वोत्तर राज्य भारत के पूर्व में स्थित हैं जिसे मोक्ष की दिशा कहते हैं। इन राज्यों को सुंदर कहना काफी नहीं है बल्कि ये तीर्थ-स्थान है|

सामाजिक मूल्य ही सनातन धर्म

“राष्ट्रीयता में संस्कृति, लोक परंपरा और उपासना पद्धति” सत्र का निष्कर्ष
धर्म की वास्तविक अवधारणा पर हुआ चिन्तन

राष्ट्रवाद चैतन्य लोक की सनातन नींव है। सनातन पुरूष राष्ट्रवादी होते हुए भी विश्ववादी है। वह अपनी भूमि पर खड़े होकर राष्ट्रवाद की सीमाओं का विस्तार करता है। माता और बच्चे का पवित्र संबंध राष्ट्रवाद है। वहीं राष्ट्र का संस्कृति से कोई संबंध नहीं। अमेरिका में रहने वाला व्यक्ति राष्ट्रवादी हो सकता है, भारत का व्यक्ति यदि राष्ट्र के प्रति चैतन्य न हो तो वह राष्ट्रवादी नहीं। यह विचार लोक-मंथन के दूसरे दिन परिचर्चा सत्र ‘राष्ट्रीयता में संस्कृति, लोक परंपरा और उपासना पद्धति’ में उभर कर आए।

पचास से अधिक पुस्तकें लिख चुके और वागीश्वरी, माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार प्राप्त श्री श्रीराम परिहार ने कहा कि मनुष्य की उत्पत्ति के संबंध में डार्विनवाद की अवधारणा से अलग भारत की अवधारणा है। भारत में मनुष्य प्रकृति के लिए सहचर, सहभागी, निसर्ग सहयात्री है, वहीं पश्चिम में मनुष्य का प्रकृति से भोक्ता का रिश्ता है। भारतीय धारणा में मनुष्य प्रकृति का पुत्र बनकर उपासना करता है और भूमि को माता के रूप में स्वीकार करता है। ‘वीर भोग्या वसुंधरा’ कहा गया, यह पूरी तरह गलत है। भूमि भोग्या नहीं। माता भोग्या कैसे हो सकती है। श्री परिहार ने महिमामंडित की गई गलत अवधारणाओं को तोड़ते हुए कहा कि प्रकृति के अंदर जो चैतन्य ज्योति है उसी का साक्षात्कार सही मायने में धर्म है। यही चैतन्यता मनुष्य के भीतर उल्लास का रूपांतरण होकर राष्ट्रवाद के चैतन्य लोक की सनातन नींव रखती है।

डॉ. डमरूधर पटनायक ने हिन्दुत्व और संस्कृति पर प्रकाश डाला

कर्नाटक के जाने-माने साहित्यकार और अध्येता डा. जी.बी. हरीश ने कहा कि आज किसी भी विश्वविद्यालय में तंत्र शास्त्र को नहीं पढाया जा रहा। उन्होंने कहा कि बिना जाने और समझे तंत्र शास्त्र को अश्लील मान लिया गया, जबकि तंत्र शास्त्र में राष्ट्रवाद भरा पड़ा है। उन्होंने कहा कि हमारी पूरी की पूरी समस्या यह है कि हम दर्शन शास्त्र को भूल गए हैं जबकि ज्ञान की अमृत धारा वहीं से बहती है। उन्होंने कहा कि भारत में दर्शन शास्त्र का पुनरूत्थान होना आवश्यक है।

रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, जबलपुर से आए डी.लिट उपाधि प्राप्त प्रोफेसर कृष्णकांत चतुर्वेदी ने सत्र की अध्यक्षता करते हुए पूर्व वक्ताओं की बात पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि कोई भी विचार तब तक स्वीकार्य नहीं होता, जब तक कि आत्मा उसे स्वीकार नहीं कर लेती। उन्होंने संस्कृति, लोक परंपरा, उपासना पद्धति को राष्ट्रवाद से जोड़ते हुए कहा कि राष्ट्र के संबंध में अवरोधी का मतलब किसी भी संस्कृति का विरोध नहीं है, परंतु लोगों ने इसके अर्थ अपनी-अपनी तरह से लगा लिए। उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रवाद किसी सीमा और संस्कृति में नहीं बँधा। धर्म और उपासना का संबंध बताते हुए उन्होंने कहा कि धर्म का उपासना के साथ साक्षात संबंध न होकर परोक्ष संबंध है। धर्म सामाजिक मूल्य और व्यवहार है, मूल्यों की सतत परंपरा को धर्म के रूप में स्वीकार किया गया है। उन्होंने कहा कि लोक-मंथन का आयोजन कठिन है, लेकिन हमने काल के महान प्रवाह में अपनी नाव दौड़ाई है। सत्र के अंत में विद्वान वक्ताओं ने प्रतिभागियों की जिज्ञासाओं का भी समाधान किया।

अब समय आ गया है जब हम जम्मू-कश्मीर पर अलग से डिस्कोर्स तैयार करें

“जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख का वर्तमान परिदृश्य और आगामी दिशा” सत्र में हुआ विमर्श

 

यह भारत का समय है। पूर्व में दो समय हमारे थे, दो पाकिस्तान के। वह भी हम भूल गए लेकिन अब 2016 में भारत का समय है। अब जम्मू-कश्मीर के लिए अलग से डिस्कोर्स तैयार करना होगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह संपर्क प्रमुख श्री अरुण कुमार ने लोक-मंथन विमर्श में ‘जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख का वर्तमान परिदृश्य और आगामी दिशा” सत्र में यह बात कही।

श्री अरुण कुमार ने कहा कि जम्मू-कश्मीर को हमें अब 2016 की स्थितियों को सामने रखकर देखना होगा। वर्तमान में अलगाववादी शक्तियाँ हाशिए पर हैं और राष्ट्रवादी शक्तियाँ मजबूत हो रही हैं। केन्द्र में मजबूत निर्णायक और निर्णय पर अमल कराने वाली सरकार है। हमें जम्मू-कश्मीर में भारत को ले जाना होगा तभी हम सभी समस्या से पूरी तरह निपट सकते हैं। श्री अरुण कुमार ने कहा कि विश्व-पटल पर भी सारे देश जम्मू-कश्मीर को लेकर भारत के पक्ष में हैं, जिसका पूरा लाभ उठाने का यह उचित समय है। श्री अरुण कुमार ने कहा कि जम्मू-कश्मीर की जनता ने सैन्य बलों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया, जिसके चलते जम्मू-कश्मीर की सेना ने भारत का सिर हमेशा ऊँचा रखा है। श्री अरुण कुमार ने लद्दाख के डेमचोक के 80 परिवारों की देशभक्ति का जिक्र करते हुए कहा कि चीन ने इन परिवारों को एल.ओ.सी. पर पक्के मकान, मोबाईल, सड़क जैसी सुविधाओं का लालच भी दिया लेकिन इन देशभक्त परिवारों ने चीन के लालच को ठुकरा दिया।

पूना से आए इंटरनेशनल लॉ काउन्सिल के सदस्य श्री अनिरुद्ध राजपूत ने कहा कि यूएनओ में जम्मू-कश्मीर को लेकर कोई भी प्रकरण विचाराधीन नहीं है। जम्मू-कश्मीर में जो भी घटित होता है वह मीडिया और राजनैतिक संगठनों द्वारा बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया जाता है। जम्मू-कश्मीर को लेकर संविधान के आर्टिकल 3, सेक्शन 37, में स्पष्ट है कि विलीनीकरण का संशोधन नहीं हो सकता है। इसके बावजूद अभी भी इस विषय पर चर्चा हो रही है क्योंकि पश्चिम का षड़यंत्र अभी तक चल रहा है, जिसका हमने जवाब नहीं दिया। हम बौद्धिक संघर्ष के चक्कर में जम्मू-कश्मीर को लेकर रक्षात्मक हो गए जबकि हमें आक्रामक होने की जरुरत थी।

दिल्ली से आए से.नि.ले.ज.सैयद अता हसनैन ने कहा कि हमने कश्मीर में सेना के साथ पाकिस्तान से हर लड़ाई जीती है लेकिन मनोवैज्ञानिक तौर पर हम हमेशा हारे हैं। पिछले 70 साल में पाकिस्तान ने हर तरह के हमले किए हैं जिसमें सेना ने दस हजार आतंकवादियों को मार गिराया। अब लगभग तीन सौ आतंकवादी बचे हैं। बावजूद इसके कश्मीर में हालत खराब हैं। इन हालातों से निपटने के लिए स्मार्टनेस की लड़ाई लड़नी होगी।

मशहूर लेखिका डॉ. क्षमा कौल ने कहा कि जम्मू-कश्मीर की स्थिति को बहुत बारीकी से समझने की आवश्यकता है। पूर्व की सरकारों ने कोई चिंता नहीं की। वर्तमान में केन्द्र में मजबूत सरकार को जम्मू- कश्मीर की चिंता करनी चाहिए।

सत्र का संचालन जम्मू-कश्मीर अध्ययन केन्द्र के संयोजक डॉ. राघवेन्द्र शर्मा ने किया। मंथन में श्रोताओं की जिज्ञासा का समाधान श्री अरुण कुमार ने किया।

“राष्ट्रीय अस्मिता बनाम जाति, भाषा, पंथ, क्षेत्र तथा वर्ग जैसी पहचान सत्र सम्पन्न

भोपाल : रविवार, नवम्बर 13, 2016, 21:55 IST

 

सत्र के प्रारम्भ में डॉ चिंतामणि मालवीय ने बताया कि देश में विरोधी विचार रखने वालों को कभी प्रताड़ित नहीं किया गया। यहाँ किसी सुकरात को ज़हर नहीं दिया गया जैसा कि कॉपरनिकस, गेलीलियों के साथ बाकी जगह हुआ। चार्वाक ने घोर निन्दा करी वेद आदि शास्त्रों की उसके बाद भी उनको दंडित नहीं किया गया। बल्कि उन्हें ऋषि कहा गया। हमारे यहाँ एक ही घर में वैद, रामायण, जैन और सिक्ख धर्म को मानने वाले रह सकते हैं, जबकि मुसलमानों में शियाओं, कुर्द-अहमदिया को मुसलमान मानने से इंकार कर दिया गया। यही कारण है कि भारत में इतनी सारी भाषाएँ और पंथ अस्तित्व में हैं और फल-फूल रहे हैं। सब एक-दूसरे को चुनौती देने वाले नहीं बने। आज माओवादी, ईसाई प्रचारक, जेहादी देश की इस एकता और सुरक्षा को खतरे में डालने में लगे हुए हैं। बोडो, उल्फा, मराठी, बोरो और पाटीदार आन्दोलन, इन सबको इसी संदर्भ में देखने की आवश्यकता है।

श्री मालवीय ने कहा कि एक ध्यान देने वाली बात यह है कि जम्मू-कश्मीर के आतंक की समस्या को उपरोक्त समस्या से इस रूप में अलग देखना चाहिये कि वहाँ अ-राष्ट्रीय ईसाई प्रचारक आदि यह भरोसा दिलाने में लगे हैं कि एस.सी., एस.टी, ओबीसी इस देश के मूल नागरिक हैं बाकी सब बाहर से आए हैं। उन्होंने कहा कि बाबा साहब अंबेडकर अपनी पुस्तक ‘हू आर सुद्राज़” में लिखते हैं कि आर्य भारत में बाहर से नहीं आए हैं। वेदों में जितनी बार भी आर्य शब्द का उपयोग किया गया है वह गुणवाचक होते हुए जाति-वाचक नहीं है।

डॉ. मालवीय ने कहा कि आज ईसाइ पंथ प्रचारक यह स्थापित करने में लगे हुए हैं कि एस.टी लोग प्रकृति पूजक हैं इसलिये उनका अलग धर्म है। चर्चों द्वारा दी जाने वाली सुविधाएँ मतांत्रित ईसाइयों को तो दी जाती हैं और हिन्दू दलितों को इससे वंचित रखते हुए सरकार से माँग की जाती हैं उनके हक़ की। उन्होंने कहा कि जिहाद को पूँजीवाद के विरूद्ध लड़ाई बताकर समर्थन दिया जा रहा है।

सत्र का समापन करते हुए अध्यक्षीय उदबोधन में श्री रमेश पतंगे ने कहा कि बाबा साहब अंबेडकर के मूल चिंतन में राष्ट्र चिंतन समाहित है। उनके नाम से चलने वाले संगठन ठीक इसके विरूद्ध काम कर रहे हैं। वे बोला करते थे कि एक दिन मुसलमानों को भी लगेगा कि वे भारत में पुन: मिल जाएँ। वो कहा करते थे कि स्वतंत्र, समता, बन्धुत्व मैंने फ्रांस की क्रान्ति से नहीं समझे। यह मैंने गौतम बुद्ध से समझा है। राज-काज की भाषा हिंदी होना चाहिये क्योंकि यही पूरे राष्ट्र को बाँध सकती है। बौद्ध धर्म की दीक्षा लेते समय उन्होंने कहा कि मैंने गाँधी जी को वचन दिया था कि हिन्दू धर्म को छोड़ते वक्त मैं यह ध्यान रखूंगा कि देश और हिन्दू धर्म को कम-से-कम नुक़सान हो, इसलिये मैंने बौद्ध धर्म स्वीकार किया।

देश में राजनीतिक दल बनाना एनजीओ बनाने से ज्यादा आसान : सांसद श्री सहस्रबुद्धे

“लोकतंत्र में लोक का स्थान और भूमिका- सहभागिता और विकेंन्द्रीकरण सत्र” सम्पन्न

तीन-दिवसीय लोक-मंथन के दूसरे दिन समानांतर सत्र में ‘लोकतंत्र में लोक का स्थान और भूमिका-सहभागिता और विकेन्द्रीकरण” विषय पर सबसे पहले श्री शंकर शरण ने विचार व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि लोक-मंथन का शुभारंभ करते हुए स्वामी अवधेशानंद जी ने कहा था कि हिन्दी के कई शब्दों का अंग्रेजी में अनुवाद हो ही नहीं सकता। लेकिन जिस दिशा में देश जा रहा है, उससे तो लगता है कि हमारी कई भाषाएँ विलुप्त ही हो जायेंगी। इसके बाद क्या भारत, भारत रहेगा? एक जर्मन दार्शनिक का कथन है कि भाषा कोई निर्जीव औजार नहीं है। अगर आप अपनी भाषा छोड़कर दूसरी का उपयोग करेंगे तो वह भाषा अपनी सभ्यता के अनुसार स्वयं आपको निर्देशित करने लगेगी।

उन्होंने कहा कि राज्यपाल श्री ओ.पी. कोहली ने नए स्वदेशी आन्दोलन की आवश्यकता जताई थी। पर पुराना स्वदेशी क्या था? वह आध्यात्मिक वैचारिक आन्दोलन था। सौ साल पहले वन्दे-मातरम के प्रयोग से देश के नेताओं ने देश को जगाया था। आज भी देश उसी से जागता है। इसमें कोई ऐसी चीज है, जो देश को एक कर देती है। किसी विदेशी भाषा द्वारा वह भाव नहीं जगाया जा सकता। श्री शरण ने कहा कि दुर्भाग्य से विदेशी भाषा को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिसके चलते देश की नब्बे प्रतिशत आबादी दरकिनार हो रही है। भाषा का एक-एक शब्द संग्रहालय होता है, उसके अनुवाद का प्रयत्न बेमानी है। उसका मनमाना इस्तेमाल संभव नहीं। भाषा में संस्कृति का निवास होता है। भाषा छूटी संस्कृति छूटी। दुनिया के दर्जनों देश अन्य भाषाओं के साहित्य को अपनी भाषा में ले आते हैं। हमारे यहाँ, साधन, सामर्थ्य, प्रतिभा किसी चीज की कमी नहीं, फिर क्या कारण है कि हम वैसा नहीं कर पाते।

मंथन में राज्यसभा सदस्य और चिंतक श्री विनय सहस्त्रबुद्धे ने अपने विचार रखते हुए कहा कि राजनीति में लोकतंत्र, लोकतंत्र में लोक की चर्चा अपरिहार्य है। हमारे देश का संविधान बनाते समय चुनाव पद्धति को लेकर बहुत संक्षिप्त चर्चा हुई और वेस्टर्न सिस्टम को ज्यूं का त्यूं स्वीकार किया गया। राजनैतिक दल लोक से कैसे जुड़ें, इस पर तो कोई चर्चा ही नहीं हुई। जयप्रकाश जी ने दलविहीन लोकतंत्र की बात की, किन्तु अंततः यही माना गया कि राजनैतिक दल के बिना लोकतंत्र की कल्पना संभव नहीं है।

श्री सहस्रबुद्धे ने कहा कि राजनैतिक दल संचालन के नियम अन्य देशों में हैं, पर हमारे यहाँ नहीं। चुनाव आयोग की वेव साईट पर 1600 से अधिक राजनैतिक दल हैं। दल बनाना एनजीओ बनाने से भी अधिक आसान है। इनमें से महज 50 दल राजनीति कर रहे हैं, उनमें भी 6 के अलावा सब परिवार आधारित दल हैं। तंत्र ऐसा है जिसमें स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का अभाव है। आप 25 प्रतिशत मत लेकर भी जीत सकते हैं, क्योंकि अन्य को उससे भी कम वोट मिले हैं। सच कहा जाए तो सबसे अधिक लोकप्रिय के स्थान पर सबसे कम अलोकप्रिय का चुनाव होता है। ऐसे में लोकमत परिष्कार के स्थान पर लोकरंजन या लोक अनुनय परस्त राजनीति चल रही है। वेंकटचलैया आयोग की रिपोर्ट पर वर्षों से कुछ नहीं हुआ। नतीजतन देश की जनता चुनाव सुधारों से वंचित है। राजनीति के चुनावीकरण, विकास का प्रशासनीकरण के कारण केवल सिनेसिज्म बढ़ रहा है। ऐसे में व्यापक राजनैतिक और चुनाव सुधार आवश्यक हैं।

चर्चा में भाग लेते हुए श्री राकेश मिश्रा ने कहा कि डेमोक्रेसी का अनुवाद लोकतंत्र करना ही गलत है। डेमोस ग्रीस भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है अपरिष्कृत। अरिस्टोटल ने डेमोक्रेसी की इसी आधार पर परिभाषा की पुअर मेन शो। किन्तु हमारे यहाँ तो गरीब भी सुसंस्कारित, सभ्य और समझदार था। सत्रहवीं सदी में वहाँ डेमोस मॉस बनकर प्रभावी हो गया। फेक्ट्री रिवोल्यूशन के बाद चर्च टूटे, सभ्यता बिखर गई, हर व्यक्ति अकेला हो गया, व्यक्तिवाद आया। सेल्फ सस्टेनेबल व्यक्ति केन्द्रित लोकतंत्र। यह दोषपूर्ण धारा थी, जिसका उद्गम ही विखंडन था। हमारे यहाँ तो संबंधों की विराट श्रंखला है। महर्षि अरविंद ने कहा कि आप अपनी सभ्यता के प्रकाश में आज को नहीं देख रहे, आधुनिकता के माध्यम से अपनी संस्कृति को देख रहे हैं। लोक और आलोक प्रकाश के प्रतीक हैं । प्रकाश श्रेष्ठ जीवन मूल्यों का। जन-जन में मूल्यों का प्रकाश। नेतृत्व राष्ट्रीय मूल्यों का प्रतिमान होना चाहिए । क्या वर्तमान पंचायतें पुरानी भारतीय पंचायतों के अनुरूप हैं?

मंथन में सहभागिता करते हुए श्री अशोक भगत ने कहा कि सन् 1972 में लोकतंत्र की 25वीं वर्षगाँठ पर प्रो. रघुवीर सिंह ने कहा था कि डेमोक्रेसी मोबोक्रेसी हो गई है। बिनोबा जी ने कहा कि मुगलों के काल में शहर गुलाम थे, अंग्रेजों के काल में गाँव भी गुलाम हो गए। रेवेन्यू लॉ बनाकर टैक्स लादा गया। जमीन के नीचे की चीज हमारी, यह नीति बनी। श्री भगत ने कहा कि गाँव को आजादी दिए बिना, अपने पैरों पर खड़े किये बिना, प्रजातंत्र सफल नहीं। हिन्दू संस्कृति की मुख्य धारा गाँवों में है। एस सी, एस टी को एक समान मानना गलत है। उन्होंने कहा कि लोक सभा न विधान सभा, सबसे बड़ी ग्राम सभा।

मंथन को आगे बढ़ाते हुए डॉ. बी.बी. कुमार ने कहा कि समस्याओं को समझकर दूर करने की पहल होना चाहिए। इतिहास की गलतियों की चर्चा होती है, किन्तु समाधान की नहीं। विभेद पैदा करने वाली शिक्षा दी जा रही है । विचारों की जड़ता और कृतित्व की जड़ता को देखकर निराशा होती है। उल्लेख मिलता है कि हमारे यहाँ 33 हजार स्टेट थीं, किन्तु कोई द्वैत नहीं था। आज भी सब जातियों के डाटा एकत्रित करेंगे तो एकता के सूत्र दिखेंगे।

भारत की प्रकृति नौकरी की नहीं, रोजगार की है
“स्वदेशी अर्थ-व्यवस्था, औद्योगीकरण तथा धारणक्षम विकास” सत्र में वक्तागण
भारत के ज्ञानी ऋषि-मुनि जीवन के हर पहलू से संबन्धित क्षेत्र के विषय में अनेक ज्ञान सूत्र दे चुके हैं| ज़रूरत इस बात की है कि हम उन सूत्रों को समझे और उन पर काम करें| हमारी अर्थ-व्यवस्था, तंत्र-व्यवस्था, धारण-क्षमता आदि अंग्रेज़ों के शासन के बाद गड़बड़ा गई क्योंकि उन्होंने ज्ञान को डिग्री में बाँध दिया और हर काम को नौकरी की तरह देखा। यह बात अटल बिहारी वाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. मोहनलाल छीपा ने ‘स्वदेशी अर्थ-व्यवस्था, औद्योगीकरण तथा धारणक्षम विकास’ पर केन्द्रित सत्र की अध्यक्षता करते हुए कही। लोक-मंथन के दूसरे दिन केवल ज्ञान कक्ष में इस विषय पर पहला समानान्तर सत्र हुआ। मुख्य वक्ता के रूप में आईआईटी मुंबई के प्रो. वरद बापट, तमिलनाडु से मैनेजमेंट के प्रो. पी कनगसभापति और बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस से प्रो. एन.एन. शर्मा उपस्थित थे|
सत्र की शुरुआत में प्रो. बापट ने अर्थ-व्यवस्था की दो मुख्य धाराओं – पूँजीवाद और समाजवाद के बारे में अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि शोषण मुक्त समाज बनाते-बनाते दरअसल मानवीय मूल्य और धर्म मुक्त समाज बनाया जाने लगा, जो आखिरकार घातक सिद्ध हुआ| उन्होंने अपनी प्रस्तुति में साझा किया कि भारतीय संस्कृति में पारिवारिक स्तर पर जिस तरह से अर्थ-व्यवस्था संतुलित की जाती रही है, उस पर पूँजीवादी और समझवादी अर्थ-व्यवस्था का गहरा प्रभाव पड़ा है| भारत में बचत की दर आज भी 30 प्रतिशत है, जो किसी भी अन्य देश से अधिक है। उन्होंने कहा कि भारत के सांस्कृतिक मूल्यों में अर्थ-व्यवस्था हमेशा मजबूत रही और रहेगी क्योंकि ये हमारी जीवन शैली से जुड़ी हुई है| उदाहरण के तौर पर भारत में लोग सोना खरीदने को निवेश मानते हैं और वो संपत्ति के रूप में कई पीढ़ियों के पास रहता है। दूसरी और पाश्चात्य देशों में सोना खरीदना पेट्रोल इस्तेमाल की तरह उपभोग की दृष्टि से देखा जाता है|
प्रो. पी. कनगसभापति ने कहा कि हिंदुस्तान की अर्थ-व्यवस्था को मजबूत बनाए रखने का एक बड़ा श्रेय महिलाओं को जाता है| इस देश में हर घर में सोने पर निवेश से लेकर बचत करने तक की परंपरा महिलाओं में विरासत के रूप में रही है| प्रो. कनगसभापति ने अर्थ-व्यवस्था के साथ-साथ औद्योगीकरण और धारणक्षम विकास के अनेक उदाहरण प्रस्तुत किए और इन सभी में गाँवों में कार्य कर रहे छोटे-छोटे समुदायों का भी ज़िक्र किया। उन्होंने अपने वक्तव्य में हिंदुस्तान के कई लघु औद्योगिक समूहों के उदाहरण प्रस्तुत किए|
अंतिम वक्ता प्रो. एन.एन. शर्मा ने धारणक्षम विकास और औद्योगीकरण को पूर्ण रूप से स्वदेशी बताया। उन्होंने कहा कि पूँजीवादी या समाजवादी तंत्र पूरे विश्व की अर्थ-व्यवस्था का मॉडल नहीं हो सकता। हर देश की अपनी संस्कृति होती है जो उस देश की हर व्यवस्था के साथ तालमेल बनाती है| भारत की संस्कृति अपने आप में इतनी मजबूत है जिसके आधार पर सभी तंत्र बेहतर काम कर सकते हैं। यदि इस संस्कृति के साथ अन्य तंत्र को लागू किया जाएगा तो वह काम नहीं करेगा। सभी समस्याओं के समाधान के लिए उन्होंने एक उपाय बताते हुए कहा कि भारत में अर्थ-व्यवस्था का सबसे बेहतर मॉडल होगा जब धर्म की दृष्टि से अर्थ का उपयोग किया जाएगा, यानी अर्थ का न अभाव हो और न ही प्रभाव हो|
बाह्य संबंधों से आंतरिक विकास पर केन्द्रित है अब विदेश नीति
“भारत की भू-राजनीति और वर्तमान वैश्विक परिद्दश्य” सत्र का निष्कर्ष
पिछले ढाई वर्ष में भारत की विदेश नीति में आमूल-चूल परिवर्तन हुआ है। नई सरकार के आने के बाद इस बात को केन्द्रित करके विदेश नीति बनाई जा रही है कि किस तरह से बाह्य संबंधों के आधार पर आतंरिक विकास को बढ़ाया जा सके। यह पहली बार हो रहा है कि देश में भू-राजनैतिक, भू-रणनीतिक, भू-आर्थिक विषयों के साथ भू-संस्कृति को केन्द्र में रखकर विदेश नीति बनाई जा रही है। इसके सुपरिणाम भी सामने आये हैं। विश्व के लगभग सभी देश भारत से संबंध बनाने को इच्छुक है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की विदेश यात्राएँ इस दिशा में एक सुनियोजित प्रयास है। आने वाले 15 दिसम्बर तक विश्व में ऐसा कोई देश नहीं होगा जहाँ पिछले ढाई साल में भारत के प्रतिनिधि नहीं पहुँचे हों।
यह विचार लोक-मंथन के दूसरे दिन ‘भारत की भू-राजनीति एवं वर्तमान वैश्विक परिदृश्य’ विषय पर समानांतर सत्र में वक्ताओं ने व्यक्त किए।
सत्र की अध्यक्षता करते हुए आर.आई.एस. के महानिदेशक श्री सचिन चतुर्वेदी ने कहा कि पिछले 70 वर्ष में हमारे देश में विदेश नीति पर इतना जोर कभी नहीं रहा, जो आज है। अब इसे भू-आर्थिकी से जोड़कर देश के लिए संसाधन पैदा करने का प्रयास किया जा रहा है। प्रधानमंत्री की विदेश यात्राएँ इस दिशा में दूरगामी परिणाम देगी। भारत ने पाकिस्तान के विरोध के बाद सार्क के स्थान पर बांग्लादेश,बर्मा और नेपाल को लेकर नया संगठन बना दिया है, जिसमें चारों देश के बीच सड़क परिवहन को लेकर कानून शिथिल किये गये हैं और अब बिजली के व्यापार की दिशा में प्रयास किये जा रहे हैं।
इसके साथ भारत ने पश्चिम एशिया के देशों में अपने संबंधों में भी बढ़ोतरी की है और नये व्यापारिक संबंध स्थापित किये हैं। चीन अन्य देशों से हमारे संबंधों को लेकर नये तरीके से रणनीति तैयार कर रहा है। उसने कूटनीति के साथ ‘चेक’ नीति को भी आगे बढ़ाया है। वह छोटे देशों को भारी सहायता दे रहा है।
भारत ने भी अब इस पर अपना ध्यान केन्द्रित किया है। आज हम 4.5 बिलियन डालर की सहायता दे रहे हैं। उन्होंने मेक इन इंडिया अभियान को लेकर कहा कि यह विदेश नीति का भी हिस्सा है। राज्य सरकारें और उद्योग घराने सहयोग करेंगे।
आर्गेनाइजर के संपादक श्री प्रफुल्ल केतकर ने कहा कि भारत की विदेश नीति की सफलता इस बात से जाहिर होती है कि अंतर्राष्ट्रीय कानून आयोग में श्री अनिल राजपूत की नियुक्ति को 160 देशों ने समर्थन दिया। भारत की भू-राजनीति संस्कृति को साथ लेने के कारण महत्वपूर्ण हो गई है। अंग्रेजों ने भी भारत की भौगोलिक स्थिति केन्द्र में होने के कारण ही विश्व में राज किया था। उन्होंने कहा कि नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयों के जलने के बाद ही भारत और चीन के संबंध खराब हुए थे।
स्तभंकार श्री तूफैल अहमद ने कहा कि भारत ने सैन्य दृष्टिकोण से पाकिस्तान से हुए युद्धों को जीत तो लिया लेकिन उनका कोई रणनीतिक लाभ नहीं मिला। उसका कारण तत्कालीन नेताओं की बौद्धिक निर्णय क्षमता था। जिसमें वह मिलेट्री सक्सेस को कूटनीतिक सफलता में नहीं बदल पाये। यू.पी.ए.सरकार ने अमेरिका के दबाव में पाकिस्तान को पीओके में ‘फ्री हेन्ड’ दिये जाने का भी निर्णय कर लिया था। उन्होंने कहा कि अमेरिका के अगले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निर्णय के पहले भारत को पाकिस्तान को आतंकवादी देश घोषित करना चाहिए।
राजनीति विज्ञान के पूर्व प्राध्यापक डॉ.ज्ञानवर्धन पाठक ने कहा कि आचार्य चाणक्य पहले भू-राजनीति विज्ञान के आचार्य थे, जिन्होंने विदेश नीति और भू-राजनीति के सूत्र दिये । पं. जवाहरलाल नेहरू की विदेश नीति को लेकर उन्होंने कहा कि नेहरू ने जो कहा, उसे वह अमल में नहीं लाये। भारत ने पिछले 2 साल में 250 बिलियन डालर के समझौते किये, जो रक्षा सौदे से जुड़े हैं। चर्चा के दौरान प्रश्न-उत्तर भी हुए।

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