Thursday , 25 November 2021
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सहेजें जल ताकि सुरक्षित रहे कल

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शीतला प्रसाद

रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून,

                                                    पानी गए न ऊबरे मोती, मानुषचून….                                                

“रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून” रहीम दास जी जल के महत्व को समझाते हुए यह पंक्ति आज से 450 साल पहले कह गए थे। लेकिन क्या आज का मनुष्य इन पंक्तियों के महत्व को समझता है या समझने की जरा सी कोशिश भी कर रहा है? शायद नहीं! नहीं इसलिए, क्योंकि अगर मनुष्य जल के महत्व को समझता तो जल का इस कदर दोहन, बर्बादी ना कर रहा होता। मैं भारत के संदर्भ में बात कर रहा हूं। भारत, जो आबादी की दृष्टि से दुनिया के 17 फीसदी लोगों को अपने में समाए है जबकि कुल जल संसाधनों का महज 4 फीसदी ही जल उसके पास उपलब्ध है।

“जल ही जीवन है” हम बचपन से सुनते आ रहे हैं। यह भी पता है कि धरती की सतह 70 फीसदी पानी से पटी हुई है। लेकिन क्या यह आपको पता है कि दुनिया में पीने के लिए मीठा पानी सिर्फ 3 फीसदी है। और ये इतना सुलभ नहीं है…  इसमें से भी विश्व की नदियों में प्रतिवर्ष बहने वाले 41,000 घन किमीजल में से 14,000 घन किमी का ही उपयोग किया जा सकता है। इस 14,000 घन किमी जल में भी 5,000 घन किमी जल ऐसे स्थानों से गुजरता है, जहां आबादी नहीं है और यदि है भी तो उपयोग करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इस प्रकार केवल 9,000 घन किमी जल का ही उपयोग पूरे विश्व की आबादी करती है।

दुनिया में 100 करोड़ अधिक लोगों को पीने का साफ़ पानी उपलब्ध नहीं है. जबकि 270 करोड़ लोगों को साल में एक महीने पीने का पानी नहीं मिलता- साल 2014 में दुनिया के 500 बड़े शहरों में हुई एक जांच में पाया गया है कि एक अनुमान के अनुसार हर 4 में से 1 नगरपालिका ‘पानी की कमी’ की समस्या का सामना कर रही है. संयुक्त राष्ट्र समर्थित विशेषज्ञों के आकलन के अनुसार साल 2030 तक वैश्विक स्तर पर पीने के पानी की मांग सप्लाई से 40 फ़ीसदी अधिक हो जाएगी.

स्रोतसंयुक्त राष्ट्र

आइए जानते हैं आंकड़े क्या कहते हैं, आप यह आंकड़े देख कर चौंक जरूर जाएंगे…

जल की उपलब्धता प्रति व्यक्ति, प्रतिवर्ष- साल 1951 में 36 करोड़ आबादी पर प्रति व्यक्ति 51.77 लाख लीटर प्रतिवर्ष जल उपलब्ध था। जो 2011 में 121 करोड़ की आबादी पर 15.45 लाख लीटर प्रति वर्ष रह गया। 2050 में तो यह और कम होकर एक अनुमान के अनुसार 164 करोड़ आबादी पर 11.40 लाख लीटर प्रति वर्ष रह जाएगा।

अगर विश्व के अन्य देशों की बात करें तो- नार्वे में प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष जल उपलब्धता  86 लाख लीटर, अमेरिका में 50 लाख लीटर तथा आस्ट्रेलिया में 32 लाख लीटर है। चीन में प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष जल उपलब्धता करीब 20 लाख लीटर है।

प्रति व्यक्ति भूमिगत जल की उपलब्धता- 2001 के आंकड़ों को देखें, तो आज की तस्वीर काफी गंभीर है। देश में प्रति व्यक्ति भूमिगत जल की उपलब्धि 5,120 लीटर हो गई है। 1951 में यह उपलब्धता 14,180 लीटर थी। 1951 की उपलब्धता का अब यह 35 फीसद ही रह गई है। 1991 में यह आधे पर पहुंच गई थी। अनुमान के मुताबिक 2025 तक प्रति व्यक्ति के लिए प्रति दिन के हिसाब से 1951 की तुलना में केवल 25 फीसद भूमिगत जल ही शेष बचेगा। केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) के आंकड़ों के मुताबिक साल 2050 तक यह उपलब्धता घटकर केवल 22 फीसद ही बचेगी।

देश के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों की 85 फीसद से ज्यादा घरेलू जरूरतों के लिए भूमिगत जल ही एकमात्र स्रोत है। शहरी इलाकों में 50 फीसद पानी की जरूरत भूमिगत जल से पूरी होती है। देश में होने वाली कुल कृषि में 50फीसद सिंचाई का माध्यम भी भूमिगत जल ही है। जमीन के अंदर का यह जल तेजी से घटता जा रहा है।’

स्रोतकेंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय और केंद्रीय भूजल बोर्ड

भारत में औसत वार्षिक जल उपलब्धता-

केंद्रीय जल आयोग ने देश में औसत वार्षिक जल उपलब्धता- आयोग ने 1869 अरब घन मीटर (billion cubic meters) का आंकलन किया है। लेकिन इसके बावजूद भौगोलिक स्थितियों, जल विज्ञान तथा अन्य समस्याओं के चलते उपयोग करने योग्य अनुमानित जल लगभग 1123 बीसीएम आंका गया है जिसमें 690 बीसीएम सतही जल और 433 बीसीमए भूमिगत जल शामिल है।

राष्ट्रीय एकीकृत जल संसाधन विकास आयोग ने अपनी 1999 की रिपोर्ट में यह अनुमान लगाया था कि वर्ष 2025 और 2050 तक विभिन्न प्रयोजनों के लिए जल की कुल आवश्यकता क्रमश: 843 बीसीएम और 1180 बीसीएम होगी। उन्होंने बताया कि बढ़ती आबादी को देखते हुए भारत में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता वर्ष दर वर्ष घटती जा रही है।

स्रोत- वॉटर एण्ड रिलेटेड स्टैटिस्टिक्स, अप्रैल 2015, सेन्ट्रल वॉटर कमीशन,पीआरएस।
भारत में जल संसाधनों से संबंधित आंकड़े
मानदंड इकाई (अरब क्यूबिक मीटर /वर्ष)
वार्षिक जल उपलब्धता 1,869
उपयोग योग्य जल 1,123
सतही जल 690
भूजल 433

 

2030 तक देश के कई शहरों में खत्म हो जाएगा ‘जल’

  • चेन्नई में जल संकट से मची त्राहि-त्राहि
  • तमिलनाडु के बड़े जलाशयों में औसत से 40 फीसदी कम पानी
  • महाराष्ट्र के चार बड़े जलाशयों में महज 2 फीसदी पानी बचा
  • जलवायु परिवर्तन का असर मानसून की दिशा और दशा पर
  • कर्नाटक के 4 बड़े जलाशयों में 1 से 2 फीसदी पानी बचा है
  • जल संकट पर नीति आयोग की रिपोर्ट देश के लिए खतरे का अलार्म
  • दुनिया के 400 करोड़ लोगों के जीवन में पानी का संकट
  • 400 करोड़ लोगों में से 100 करोड़ भारतीय हैं

जल का अधिकार, जल के प्रति कर्तव्य के बिना व्यर्थ है

पानी सीमित मात्रा में उपलब्ध विकल्पहीन संसाधन है। यह जीवन समाज व अर्थव्यवस्था का आधार है और अपने में कई मूल्यों और लाभों को समेटे हुए है।दुर्भाग्य है कि नियोजक और अधिसंख्य लोग यह नहीं समझ पा रहे है।पानी जनजीवन, अर्थव्यवस्था, पर्यावरण व समाज के लिए कितना आवश्यक है।

वर्तमान में पानी की किल्लत देश में गहराती जा रही है अब स्थिति ऐसी हो गई है कि देश में पानी की उपलब्धता 1400 घन मीटर प्रति व्ष से भी कम हो गई है, जो वैश्विक जल किल्लत के करीब है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में साफ पेयजल को मौलिक अधिकार माना गया है। इसके बावजूद भारत में वर्षों से गरीबों को स्वच्छ पेयजल से दूर रखा गया है। ऐसी स्थिति में लोगों और बड़े नागरिक संगठनों को यह समझने की आवश्यकता है कि भले ही स्वच्छ पेयजल उनका मौलिक अधिकार है। और साथ ही सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि स्वच्छ जल की जरूरत एक विशाल जिम्मेदारी है और इसमें सभी लोगों की सक्रिय सहभागिता बहुत जरूरी है।

अक्सर हम अधिकारों की बात करतें है लेकिन जब जिम्मेदारी निभाने की बात आती है तो हम मुंह चुराने लगते हैं। आखिर आप कब तलक ऐसा करोगे एक ना एक दिन स्थिति गंभीर होने ही वाली है, ऐसे में अगर हम समय रहते चेंते नहीं तो स्थिति और भी गंभीर हो सकती है। यदि समय रहते सक्रियता दिखाई  जाए तो शायद हम परिणाम बदल सकतें है। राह चलते अगर हम कहीं जल या पर्यावरण की बर्बादी देखें तो उसे रोकने का प्रयास तो करना ही चाहिए लेकिन इसकी शुरुआत सबसे पहले आप अपने घर की ड्योढ़ी से और भी अच्छा होगा।

और आपका उठाया गया यह कदम शायद सभी में तब्दील हो जाए। हालांकि प्राय: ऐसा देखा भी जा रहा है। देश के विभिन्न स्थानों पर अपेक्षित परिणाम भी निकल कर सामने आ रहे है। कई सारे सामाजिक संगठन और लोगों द्वारा उनके व्यक्तिगत प्रयासों से सकारात्मक कदम उठाए जा रहें है। इस समय जब आप पानी की जरूरत को अपना मौलिक अधिकार मानतें है तो इसके संरक्षण का दायित्व भी हमारा मौलिक दायित्व बनकर लोगों के सामने आ जाए ऐसी सोच आज प्रत्येक भारतीय की होनी चाहिए।

लेखक भारतीय जन संचार संस्थान के विद्यार्थी हैं  और जल अभियांत्रिकी के अध्येता भी l 

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