Thursday , 6 August 2020
समाचार

सच मुच काेेरोना की वैक्‍सीन या धोखा …

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जैसे-जैसे नए-नए तथ्य सामने आ रहे हैं, वैसे-वैसे साफ़ होता जा रहा है कि कोरोना का पूरा मसला असल में असलियत कम फ़साना ज़्यादा है। जिस अमेरिका में सबसे ज़्यादा हाहाकार वाली स्थिति दिख रही है, उस अमेरिका की ही चौथाई से ज़्यादा आबादी यानी आठ-नौ करोड़ लोग अब कहने लगे हैं कि उन्हें मूर्ख बनाया जा रहा है, कोरोना किसी भी कोण से महामारी क़तई नहीं है। मास्क लगाने के ख़िलाफ़ लोगों ने प्रदर्शन तक किए हैं। डब्ल्यूएचओ को बयान देना पड़ा है कि दुनिया में जो लोग कोरोना को महामारी नहीं मानते, वे ख़तरनाक लोग है, उन्हें रोकना चाहिए, उन पर पाबन्दी लगानी चाहिए। संसार की सेहत सँभालने के नाम पर बनी इस संस्था की फण्डिङ्ग का एक बड़ा हिस्सा फार्मा कम्पनियों की तरफ़ से आता है, ऐसे में ज़ाहिर है कि यह काम भी उनके लिए करेगी ही। आज का हाल यह है कि अगर हम तक सौ मेडिकल रिसर्च या सर्वे पहुँचते हैं, तो उनमें से पचास से साठ प्रायोजित या कम्पनियों का कारोबार बढ़ाने के मक़सद से किए गए होते हैं।

हफ़्ते भर से कई कामों में उलझे रहने के चलते फेसबुक देखने या पोस्ट लिखने की स्थिति में नहीं हूँ, पर मई महीने से अब तक दो सौ से ज़्यादा कोरोना मरीज़ों का बहुत आसानी से इलाज करने के बाद यह कहने से ख़ुद को नहीं रोक पा रहा हूँ कि एक तरफ़ हमारी सरकारें मुस्तैदी दिखाने के चक्कर में परले दर्जे की मूर्खताएँ कर रही है, तो दूसरी तरफ़ मीडिया का एक हिस्सा मूर्खता में तो दूसरा हिस्सा विज्ञापन और टीआरपी की लालच में इस वैश्विक साज़िश का हिस्सा बना हुआ है। आप ज़रा सोचिए कि जब एक अस्पताल एकदम बकवास दावा करता है कि उसने एड्स की दवा देकर तीन कोरोना मरीज़ ठीक कर दिए तो पूरे देश के अख़बार पहले पृष्ठ की ख़बर बनाते हैं और सारे चैनल ब्रेकिङ्ग न्यूज़ चलाते हैं, पर एक व्यक्ति जब बिना दवा के सिर्फ़ प्राकृतिक चिकित्सा के सहारे पाँच हज़ार से ज़्यादा कोरोना मरीज़ों को पूरे प्रमाणों के साथ ठीक करने की बात करता है और प्रेस कानफ्रेंस बुलाता है तो एक भी बड़ा चैनल या अख़बार उस कानफ्रेंस में जाने तक की ज़रूरत नहीं समझता। बात साफ़ है कि कोरोना को महामारी बनाने के लिए ‘डर’ को हथियार बनाया गया है, इसलिए ज़्यादा से ज़्यादा डर फैलाने के लिए दो-चार मौतों की भी बड़ी-बड़ी ख़बर चलाई जाएगी, पर हज़ारों बच रहे हों, तो उसे ख़बर नहीं बनाया जाएगा…या बनाया जाएगा तो कहीं कोने में दबाकर दिखाया जाएगा। मोटा शीर्षक लगाया जाएगा कि—अमेरिका, ब्राजील नहीं बनना तो फिर लॉकडाउन लगे—पर चीन के पड़ोसी वियतनाम, जहाँ कोरोना बहुत पहले पहुँचा, का उदाहरण नहीं दिया जाएगा कि वहाँ अब तक एक भी मौत नहीं हुई। अच्छी-ख़ासी आबादी वाले तमाम देशों में न लॉकडाउन न मास्क, पर वे मज़े में हैं…आख़िर उनकी ख़बरें क्यों नहीं चलतीं? सच्ची बात यही है कि अगर यह बात प्रचारित हो जाय तो कि सन्त समीर जैसा कोई व्यक्ति वेण्टिलेटर तक की स्थिति से भी मरीज़ को उबार लाने की बात कर रहा है, तो महामारी का डर लोगों के मन से चला जाएगा और नई-नई दवाओं और वैक्सीन का धन्धा ख़राब होगा। कई बार कह चुका हूँ और आज फिर कह रहा हूँ कि जो लोग इसे महामारी साबित करने में लगे हैं और बहुत ख़तरनाक कह रहे हैं, वे मुझे कहीं भी ले चलें, मैं सैकड़ों कोरोना मरीज़ों के बीच में रहने को तैयार हूँ। शर्त सिर्फ़ इतनी है कि
फ्लू वायरस (यह फ्लू वायरस ही है) से सङ्क्रमित होने की स्थिति में मैं किसी अस्पताल के बजाय अपनी दवा का इस्तेमाल करूँगा। मैं अपने जानने-पहचानने वाले सभी लोगों से यहाँ तक कहता हूँ कि साफ़-सफ़ाई से ज़रूर रहिए, यह हमारी संस्कृति है और सेहत की समझ भी, पर मास्क और हैण्ड सेनेटाइजर की मूर्खता से बचकर रहिए। सफ़ाई के नाम पर आपके शरीर में नई गन्दगी भरने के उपकरण से ज़्यादा ये और कुछ नहीं हैं।

एक रहस्य यह समझने की कोशिश कीजिए कि जो लोग घरों में हैं, वे पाँच-दस दिन में सर्दी-जुक़ाम-खाँसी से उबर जा रहे हैं, पर अस्पतालों में जाने वालों पर मौत की तलवार लटक रही है। कुछ लोग तर्क यह दे रहे हैं कि अस्पतालों में इसलिए लोग मर रहे हैं, क्योंकि अस्पताल पहुँचने में बहुत देरी कर देते हैं। ऐसे तर्क देने वाले लोग, जनता के अलावा ख़ुद को भी मूर्ख बना रहे हैं। याद रखिए, यह मौसम आम नहीं है, यह कोराना-काल है। ज़रा-सी खराश आई कि ज़बरदस्ती टेस्ट किया जा रहा है और झूठ-मूठ में भी पॉजिटिव दिखे तो कोरेण्टाइन कर दिया जा रहा है। मुसीबत बढ़ने पर आदमी अस्पताल नहीं जा रहा, बल्कि बिना मुसीबत के भी अस्पताल में ठेल दिया जा रहा है और रद्दी अस्पताल हुआ तो अनाप-शनाप दवाएँ देकर मरीज़ की हालत ख़राब करके मरने की नियति तक पहुँचा दे रहा है। बड़े अस्पताल में बैठकर क्रोसीन खाने का शौक़ हो तो दस से अट्ठाईस लाख तक का बिल भी देना पड़ सकता है। डॉक्टर पीपीई किट पहन कर मरीज़ देखने पहुँचे तो उसका किराया दस हज़ार अलग से। एक सूचना यह भी आई है कि कोरोना की आड़ में कुछ अस्पताल मरने वालों के काम के अङ्ग निकाल ले रहे हैं। यह आसान है, क्योंकि कोरोना से मरे हुए को नज़दीक जाकर नाते-रिश्ते वाले भी नहीं देखना चाहते। उन गाँववालों की हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी, जिनकी संवेदना शहर वालों की तुलना में अभी कुछ बची हुई है और उन्होंने लाश पर से अस्पताली कपड़ा हटा दिया और रहस्य उजागर हो गया।

‘कोरोना वॉरियर’ की एक नौटङ्की अलग से चल रही है। साधारण फ्लू का एक प्रकार, फ्लू से ज़रा भी अलग नहीं, पर नया नाम रख दिया ‘कोरोना’, तो आतङ्क फैलाना आसान हो जाता है और कुछ लोग चने की झाड़ पर चढ़ाकर कोरोना वॉरियर बना दिए जाते हैं। दो-चार दिन इनको ‘फ्लू वॉरियर’ कहिए, तो सिर्फ़ इतने से ही काफ़ी हवा निकल जाएगी। दवा अभी तक है नहीं, एक आई भी फेवीफ्लू 103 रुपये टेबलेट, यानी दिन भर की ख़ुराक क़रीब बीस हज़ार रुपये की..पर असर के नाम पर काम चलाऊ भी नहीं। काम की होती तो महीने भर पहले ही मौतों की सङ्ख्या शून्य हो चुकी होती। यह सोचकर भी हैरान मत होइए कि पूरे दिन में कितनी ख़ुराक खानी है।

तमाम बातें हैं। दो-चार तथ्यों पर भी ठीक से बात की जाय तो दस-बीस हज़ार शब्द चाहिए। अचानक याद आया कि फेसबुक तो फिर भी कुछ कम, पर यूट्यूब बहुत गहरे तक इस साज़िश में शामिल है। संयोग ऐसा हुआ कि जब मेरे वीडियो डिलीट होने शुरू हुए और चैनल का प्रमोशन यूट्यूब ने रोक दिया, तो मैंने भी कुछ बातों पर ध्यान देना शुरू किया। प्रमाण के रूप में कुछ ऐसे स्क्रीनशॉट मैंने सुरक्षित रखे हैं, जिनसे यह पता चलता है कि यूट्यूब अपने ज़्यादातर काम गोपनीय क्यों रखता है। जिन चैनलों को उसे हतोत्साहित करना होता है, उनके लिए अजब-अजब तरीक़े इस्तेमाल करता है। इसकी चर्चा फिर कभी करूँगा, फिलहाल तो वैक्सीन के जालबट्टे को समझने में रुचि हो तो चैनल पर जाकर यह वीडियो देख सकते हैं। यूट्यूब की निगाह ज़्यादा दिनों तक टेढ़ी रही तो टेलीग्राम, डेलीमोशन वग़ैरह के तरीक़े से भी जनहित के मुद्दों पर बात करने की योजना बना रहा हूँ।
https://www.youtube.com/santsameer

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